RatRating Zero To Hero Book In Hindi Pdf Free / ज़ीरो टू हीरो बुक फ्री डाउनलोड

Zero To Hero Book in Hindi Pdf Free / ज़ीरो टू हीरो बुक फ्री डाउनलोड

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Zero To Hero Book in Hindi Pdf ज़ीरो टू हीरो बुक फ्री डाउनलोड 

 

 

 

 

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2- उठो, जागो। 

 

 

 

दिव्यज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

विनम्र साधु पुरुष की सम दृष्टि – कृष्ण कहते है – जो व्यक्ति विनम्र होता है और जिसके भीतर साधुभाव विद्यमान रहता है वह अपने वास्तविक ज्ञान के कारण, एक विद्वान तथा विनीत ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा चांडाल को समान दृष्टि (समभाव) से ही देखता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावना भावित व्यक्ति योनि या जाति में भेद नहीं मानता है। सामाजिक दृष्टि से ब्राह्मण और चांडाल भिन्न-भिन्न हो सकते है। अथवा योनि के अनुसार कुत्ता, गाय, हाथी भिन्न हो सकते है किन्तु विद्वान योगी की दृष्टि में यह शरीरगत भेद अर्थ हीन रहते है।

 

 

 

परमात्मा के रूप में भगवान चांडाल तथा ब्राह्मण दोनों में उपस्थित रहते है। यद्यपि इन दोनों के शरीर भिन्न होते है। शरीर तो प्रकृति के गुणों द्वारा उत्पन्न हुए है। किन्तु शरीर के भीतर आत्मा तथा परमात्मा समान आध्यात्मिक गुण वाले है। परमेश्वर परमात्मा रूप में हर एक  हृदय में स्थित है। परम् सत्य का ऐसा ज्ञान (यथार्थ) वास्तविक ज्ञान है।

 

 

 

जहां तक विभिन्न जातियों में शरीर का संबंध है। आत्मा तथा परमात्मा की यह समानता मात्रात्मक दृष्टि से समान नहीं बनाती क्योंकि व्यष्टि आत्मा किसी विशेष शरीर में उपस्थित होता है। किन्तु परमात्मा की उपस्थिति प्रत्येक शरीर में होती है।

 

 

 

आत्मा तथा परमात्मा के लक्षण समान होते है क्योंकि दोनों चेतन, शाश्वत तथा आनंदमय है किन्तु अंतर इतना सा ही है कि आत्मा शरीर की सीमा के भीतर सचेतन रहता है। जबकि परमात्मा सभी में सचेतन रहता है। परमात्मा बिना किसी भेद भाव के सभी शरीरो में विद्यमान रहता है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति को इसका पूर्ण ज्ञान होता है। इसका कारण परमेश्वर से उसका संबंध है। वह सचमुच विद्वान तथा समदर्शी होता है।

 

 

 

 

19- एकत्व तथा समता में स्थित (मन) – जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित है उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बंधनो को पहले ही जीत लिया है वह ब्रह्म के समान ही निर्दोष होते है और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जैसा कि ऊपर कहा गया है मानसिक समता आत्मसाक्षात्कार का लक्षण है। जिन्होंने ऐसी अवस्था प्राप्त कर लिया है उन्हें भौतिक बंधनो पर विशेषतया जन्म तथा मृत्यु पर विजय प्राप्त किए हुए मानना चाहिए। भगवान निर्दोष है क्योंकि वह आसक्ति अथवा घृणा से रहित है। जब तक मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानता है वह बद्धजीव माना जाता है। किन्तु ज्यों ही वह आत्मसाक्षात्कार द्वारा समचित्त हो जाता है। वह बद्धजीवन से मुक्त हो जाता है। दूसरे शब्दों में उसे पुनः इस भौतिक जगत में जन्म नहीं लेना पड़ता है अपितु वह मृत्यु के बाद आध्यात्मिक लोक में प्रस्थान करता है।

 

 

 

 

इसी प्रकार जीव आसक्ति या घृणा से रहित हो जाता है तब उसकी स्थिति निर्दोष हो जाती है और वह बैकुंठ जाने का अधिकारी हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों को पहले से ही मुक्त मानना चाहिए। उनके लक्षण आगे बताये जाएंगे। 

 

 

 

 

20- मोहरहित स्थिर बुद्धि – श्री कृष्ण कहते है – जो व्यक्ति प्रिय वस्तु मिलने पर हर्षित नहीं होता है अप्रिय  मिलने पर विचलित नहीं होता है जो स्थिर बुद्धि है और मोहरहित है, तथा भगवदविद्या को जानने वाला है। वह पहले से ही ब्रह्म में स्थिर रहता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर स्वरुप सिद्ध व्यक्ति के लक्षण का उल्लेख किया गया है। पहला लक्षण यह है कि उसमे शरीर और आत्मतत्व के तादात्म्य का भ्रम नहीं रहता है। मन की यह स्थिरता आत्मबुद्धि या स्थिर बुद्धि कहलाती है। अतः वह न तो स्थूल शरीर को आत्मा मानकर मोहग्रसित नहीं होता है और शरीर को न तो स्थायी मानकर आत्मा के अस्तित्व को नकारता है।

 

 

 

अतः उसे भली भांति ज्ञात रहता है मैं यह शरीर नहीं हूँ अपितु भगवान का एक अंश हूँ। तह उसे कुछ प्राप्त होने पर न तो वह प्रसन्न होता है और वह कुछ हानि होने पर शोक भी नहीं होता है। इस ज्ञान के कारण वह परम् सत्य अर्थात ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान के ज्ञान को भली भांति जान लेता है। इस प्रकार वह अपने स्वरूप को जानता है और परब्रह्म से हर बात में तदाकार होने के लिए कभी प्रयास नहीं करता है। इसे ब्रह्म साक्षात्कार या आत्म साक्षात्कार कहते है और ऐसी स्थिर बुद्धि ही कृष्ण भावनामृत कहलाती है।

 

 

 

 

 

21- आनन्दानुभूत – कृष्ण कहते है – जो पुरुष मुक्त हो चुका है ऐसा मुक्त पुरुष भौतिक इन्द्रिय सुख की तरफ कदापि आकृष्ट नहीं होता है। अपितु सदैव समधिस्ठ रहकर (कृष्ण में लीन रहना) अपने अंतर में आनंद का अनुभव करता है। इस प्रकार स्वरुप सिद्ध पुरुष परब्रह्म में एकाग्रचित्त होने के कारण असीम सुख को प्राप्त करता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावनामृत के महान भक्त यामुनाचार्य ने कहा है -“जब से मैं कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगकर उसमे नित्य नवीन आनंद का अनुभव करने लगा हूँ। तब से जब भी काम सुख के बारे में सोचता हूँ तो इस विचार पर ही थूकता हूँ और मेरे होठ अरुचि से सिमट जाते है।” ब्रह्म योगी या कृष्ण भावना भावित व्यक्ति भगवान की प्रेमाभक्ति में इतना लीन रहता है कि इन्द्रिय सुख में उसकी तनिक भी रूचि नहीं रह जाती है।

 

 

 

आत्म साक्षात्कार और काम-सुख का पथ सदा ही अलग रहता है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति जीवन मुक्त होने के कारण किसी प्रकार के इन्द्रिय सुख द्वारा आकर्षित नहीं होता है। लेकिन भौतिकता की दृष्टि में काम सुख ही सर्वोपरि आनंद है। सारा संसार ही उसके वशीभूत है और भौतिकता वादी लोग तो इस प्रोत्साहन के बिना कोई भी कार्य नहीं कर सकते। किन्तु कृष्ण भावनामृत में लीन पुरुष काम सुख के बिना ही अपना सम्पूर्ण कार्य उत्साह के साथ ही सम्पन्न करता है। यही आत्मसाक्षात्कार की कसौटी है।

 

 

 

 

 

22- दुख का कारण (भौतिक इन्द्रिय सुख) – श्री कृष्ण कहते है – बुद्धिमान व्यक्ति दुख के कारण में भाग नहीं लेता है जो कि भौतिक इन्द्रियों के संसर्ग से उत्पन्न होते है। हे कुंती पुत्र ! ऐसे भोगो का आदि और अंत होता है। अतः चतुर व्यक्ति उसमे आनंद नहीं लेता उससे दूर ही रहता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भागवत में (5. 5. 1) भी कहा गया है – हे पुत्रो इस मनुष्य योनि में इन्द्रिय सुख के लिए अधिक श्रम करना व्यर्थ है ऐसा सुख तो सूकरो को भी प्राप्य है। इसकी अपेक्षा तुम्हे इस जीवन में तप करना चाहिए जिससे तुम्हारा जीवन पवित्र हो जाए और तुम असीम दिव्य सुख प्राप्त कर सको।

 

 

 

भौतिक इन्द्रिय सुख उन इन्द्रियों के स्पर्श से उद्भूत है जो नाशवान है क्योंकि शरीर तो स्वयं ही नाशवान होता है। मुक्तात्मा किसी नाशवान वस्तु में रूचि नहीं रखता है। दिव्य आनंद के सुखो से भली भांति अवगत वह क्यों कर भला मिथ्या सुख के लिए सहमत होगा ? पदम पुराण में कहा गया है – “योगी जन परम सत्य में रमण करते हुए अंततः दिव्य सुख प्राप्त करते है इसलिए परम् सत्य को भी राम कहा जाता है।”

 

 

 

अतः जो यथार्थ योगी या दिव्य ज्ञानी है वह इन्द्रिय विषयक सुख की तरफ आकर्षित नहीं होते है क्योंकि वह निरंतर ही भव रोग का कारण होता है। जो भौतिक सुख की प्राप्ति में जितना आसक्त होता है उसे उतने ही अधिक भौतिक दुखो की प्राप्ति होती है।

 

 

 

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