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You Can Win Books Pdf In Hindi / जीत आपकी किताब pdf download

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मित्रो आज इस पोस्ट में हम आपको शिव खेरा जी की लिखी कविता You Can Win Books Pdf In Hindi देने जा रहे है, आप You Can Win in Hindi Pdf यहां से Download कर सकते है।

 

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You Can Win Books Pdf Hindi 

 

 

 

 

 

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You Can Win Books Pdf In Hindi
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शिव खेरा जी द्वारा लिखित यह किताब आपके जीवन को पूरी तरह से बदल सकती है। यह बहुत ही सकारात्मक किताब है, जो आपके जीवन पर पूरी तरह से प्रभाव छोड़ती है। आप ऊपर की लिंक You Can Win Pdf Free Download कर सकते है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

एक बने ठने मुर्ख को तब तक पहचान नहीं सकते जब तक वह बोलता नहीं है किन्तु बोलते ही उसका यथार्थ रूप प्रकट हो जाता है। कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति का सर्वप्रमुख लक्षण यह है कि वह सदा केवल कृष्ण तथा उन्ही से सम्बद्ध विषयो के बारे में ही बोलता है वह व्यर्थ की बातो में समय नहीं गवाता है।

 

 

 

जिस प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति के उसकी विशिष्ठ स्थिति के अनुसार कुछ लक्षण होते है उसी प्रकार से कृष्ण भावनाभावित पुरुष का भी विशिष्ठ स्वभाव होता है। – यथा उसका बोलना, चलना सोचना आदि।

 

 

 

 

जिस प्रकार धनी पुरुष के कुछ लक्षण होते है जिनसे पता चलता है कि वह धनवान है। जिस प्रकार रोगी अपने रोगयुक्त लक्षणों से रुग्ण जाना जाता है या विद्वान की पहचान उसके विद्वता पूर्ण गुणों से होती है।

 

 

 

 

उसी तरह कृष्ण की दिव्य चेतना से युक्त व्यक्ति अपने विशिष्ठ लक्षणों से पहचाना जाता है। इन लक्षणों को भगवद्गीता से जाना जा सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति किस तरह से बोलता है क्योंकि वाणी ही किसी मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण गुण होता है फिर तो अन्य लक्षण स्वतः ही प्रकट हो जाते है जिनका उल्लेख आगे किया गया है।

 

 

 

 

 

55- मनोधर्म से उत्पन्न कामनाओ का परित्याग – श्री भगवान ने कहा – हे पार्थ ! जब मनुष्य मनोधर्म से उत्पन्न होने वाली इन्द्रिय तृप्ति की समस्त कामनाओ का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में संतोष प्राप्त करता है तो वह बिल्कुल दिव्या चेतना को प्राप्त (स्थित प्रज्ञ) कहा जाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यदि कोई मनुष्य कृष्णभावनामृत में लगा हो तो उसकी सारी विषय वासनाए स्वतः बिना किसी प्रयास के ही दब जाती है।

 

 

 

 

अतः मनुष्य को चाहिए कि वह बिना किसी झिझक के कृष्णभावनामृत को स्वीकार करे क्योंकि इस भक्ति के द्वारा ही दिव्या चेतना प्राप्त हो सकती है।

 

 

 

 

अत्यधिक उन्नत जीवात्मा (महात्मा) अपने आपको परमेश्वर का दास मानकर आत्म तुष्ट रहता है। भौतिकता से उत्पन्न एक भी विषय वासना ऐसे आध्यात्मिक पुरुष के पास कदापि नहीं फटकती है। वह अपने को निरन्तर ही भगवान का सेवक मानते हुए सहज रूप में सदैव प्रसन्न रहता है।

 

 

 

 

 

श्री भागवत में पुष्टि हुई है कि जो मनुष्य पूर्णतया कृष्ण भावनाभावित या भगवद्भक्त होता है उसके अंदर महर्षियो के समान गुण विद्यमान रहते है।

 

 

 

 

किन्तु जो व्यक्ति आध्यात्म में स्थित नहीं होता है उसमे एक भी योग्यता नहीं होती है क्योंकि वह अपने मनोधर्म पर ही आश्रित रहता है। फलतः यहां ठीक ही कहा गया है कि व्यक्ति को मनोधर्म द्वारा कल्पित विषय वासनाओ  परित्याग करना होगा। कृतिम साधन से इन्हे रोका नहीं जा सकता है अतः मनुष्य के लिए कृष्ण भावनामृत आवश्यक है।

 

 

 

 

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