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You Can Sell in Hindi Pdf / बेचना सीखो और सफल बनो Pdf

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

वीरभद्र बड़े प्रबल और भयंकर दिखाई देते थे। उनका रथ बहुत ही विशाल था। उसमे दस हजार सिंह जाते जाते थे जो प्रयत्नपूर्वक उस रथ को खींचते थे। उसी प्रकार बहुत से प्रबल सिंह, श्रदुल, मगर, मत्स्य और सहस्रो  हाथी उस रथ के पार्श्वभाग की रक्षा करते थे।

 

 

 

काली, कत्यायनी, ईशानी, चामुंडा, मुण्डमर्दिनि, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी इन नव दुर्गाओं के साथ तथा समस्त भूतगणों के साथ महाकाली दक्ष का विनाश करने के लिए चली। डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रमथ, कुष्पान्ड, चटक, ब्रह्मराक्षस, भैरव तथा क्षेत्रपाल आदि ये सभी वीर भगवान शिव की आज्ञा का पालन एवं दक्ष के यज्ञ का विनाश करने के लिए तुरंत चल दिए।

 

 

 

इनके सिवा चौसठ गणो के साथ योगिनियो का मंडल भी सहसा कुपित हो दक्ष यज्ञ का विनाश करने के लिए वहां से प्रस्थित हुई। इस प्रकार कोटि-कोटि गण एवं विभिन्न प्रकार के गणाधीश वीरभद्र के साथ चले। उस समय भरियो की गंभीर ध्वनि होने लगी। नाना प्रकार के शब्द करने वाले शंख बज उठे।

 

 

 

भिन्न-भिन्न प्रकार की सींगे बजने लगी। महामुने! सेनासहित वीरभद्र की यात्रा के समय वहां बहुत से सुखद शकुन होने लगे। इस प्रकार जब प्रमथगणो सहित वीरभद्र ने प्रस्थान किया तब उधर दक्ष तथा देवताओ को बहुत से अशुभ लक्षण दिखाई देने लगे। देवर्षे यज्ञ विध्वंस की सूचना देने वाले त्रिविधि उत्पात प्रकट होने लगे।

 

 

 

 

दक्ष की बायीं आंख, बायीं भुजा और बायीं जांघ फड़कने लगी। तात! वाम अंगो का फड़कना सर्वथा अशुभ सूचक था और नाना प्रकार के कष्ट मिलने की सूचना दे रहा था। उस समय दक्ष की यज्ञशाला में धरती डोलने लगी। दक्ष को दोपहर के समय दिन में ही अद्भुत तारे दीखने लगे।

 

 

 

दिशाए मिलन हो गयी। सूर्यमंडल चितकबरा दिखने लगा। उस पर हजारो घेरे पड़ गए  जिससे वह भयंकर जान पड़ता था। बिजली और अग्नि के समान दीप्तिमान तारे टूट-टूटकर गिरने लगे तथा और भी बहुत से भयानक अपशकुन होने लगे। इसी बीच में वहां आकाशवाणी प्रकट हुई जो सम्पूर्ण देवताओ और विशेषतः दक्ष को अपनी बात सुनाने लगी।

 

 

 

आकाशवाणी बोली – ओ दक्ष! आज तेरे जन्म को धिक्कार है! तू महामूढ़ और पापात्मा है। भगवान हर की ओर से आज तुझे महान दुःख प्राप्त होगा जो किसी तरह टल नहीं सकता। अब यहां तेरा हाहाकार भी सुनाई नहीं देगा। जो मूढ़ देवता आदि तेरे यज्ञ में स्थित है उनको भी महान दुःख होगा इसमें संशय नहीं है।

 

 

 

ब्रह्मा जी कहते है – मुने! आकाशवाणी की यह बात सुनकर और पूर्वोक्त अशुभ सूचक लक्षणों को देखकर दक्ष तथा दूसरे देवता आदि को भी अत्यंत भय प्राप्त हुआ। उस समय दक्ष मन ही मन अत्यंत व्याकुल हो कांपने लगे और अपने प्रभु लक्ष्मीपति भगवान विष्णु की शरण में गए।

 

 

 

वे भय से अधीर हो बेसुध हो रहे थे। उन्होंने स्वजन वत्सल देवाधिदेव भगवान विष्णु को प्रणाम किया और उनकी स्तुति करके कहा दक्ष बोले – देवदेव! हरे! विष्णो! दीनबन्धो!! कृपानिधे! आपको मेरी और मेरे यज्ञ की रक्षा करनी चाहिए। प्रभो! आप ही यज्ञ के रक्षक है यज्ञ ही आपका कर्म है  और आप यज्ञस्वरूप है।

 

 

 

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