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Yoga Books Pdf Hindi Free Download / योगा बुक्स फ्री डाउनलोड

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मित्रों इस पोस्ट में Yoga Books Pdf Hindi दिया गया है। आप नीचे की लिंक से Yoga Books Pdf Hindi Free Download कर सकते हैं।

 

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पतंजलि योग दर्शन
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Patanjali Yoga Sutra PDF Hindi Free Download
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रोगी स्वयं चिकित्सक Pdf Download
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योग प्रवाह 
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धारव योग Dharav Yog Download
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योग और शिक्षा Yog Aur Shiksha Free Download
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गीता का ज्ञान योग 
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कुरुक्षेत्र के स्थल में

 

 

 

अर्जुन कह रहा है – हे कृष्ण ! मैं यहां अब और अधिक खड़ा रहने में असमर्थ हूँ। मैं अपने को भूल रहा हूँ और मेरा सिर चकरा रहा है और मुझे तो केवल अमंगल के कारण दिख रहे है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अपने अधैर्य के कारण ही अर्जुन युद्ध भूमि में खड़ा रहने में असमर्थ था और अपने मन की इस दुर्बलता के कारण ही उसे आत्मविस्मृति हो रही थी। भौतिक वस्तुओ के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण ही मनुष्य ऐसी मोहमयी स्थिति में पड़ जाता है।

 

 

भयं द्वितीया भीनिवेशतः स्यात – (भागवत 11. 2. 36) – ऐसा भय तथा मानसिक असंतुलन उन व्यक्तियों में उत्पन्न होता है जो भौतिक परिस्थितियों से ग्रस्त रहते है।

 

 

 

जब मनुष्य को अपनी आशाओ में केवल निराशा दिखती है तो वह सोचता है “मैं यहां क्यों हूँ ?” प्रत्येक प्राणी अपने में तथा अपने स्वार्थ में रूचि रखता है।

 

 

 

 

किसी की भी परमात्मा में रूचि नहीं होती है। अर्जुन को युद्धभूमि में केवल दुखदायी पराजय की प्रतीति हो रही थी। वह शत्रु पर विजय पाकर भी सुखी नहीं होगा। निमित्तानि विपरीतानि शब्द महत्वपूर्ण है।

 

 

 

 

कृष्ण की इच्छा से अर्जुन अपने स्वार्थ के प्रति अज्ञान दिखा रहा है। मनुष्य का वास्तविक स्वार्थ तो विष्णु या कृष्ण में निहित है। बद्ध जीव इसे भूल जाता है इसलिए ही उसे भौतिक कष्ट उठाने पड़ते है। अर्जुन ने सोचा उसकी विजय उसके शोक का कारण बन सकती है।

 

 

 

 

Yoga Books in Hindi PDF Free
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32/33/34/35- कुटुंबियो तथा जाति पर अर्जुन का स्नेह (मोह) – अर्जुन कहता है – हे गोविन्द ! हमे राज्य, सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ क्योंकि जिन सारे लोगो के लिए हम उन्हें चाहते है वह ही इस युद्ध भूमि में खड़े है।

 

 

 

 

हे मधुसूदन ! जब गुरु जन, पितृगण, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले अथवा अन्य सारे संबंधी अपना-अपना धन एवं प्राण देने के लिए तत्पर है और मेरे समक्ष खड़े है तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहूंगा भले ही वह मुझे क्यों न मार डाले ?

 

 

 

हे जीवन के पालक ! मैं इस सभी से लड़ने के लिए तैयार नहीं हूँ। भले ही मुझे बदले में तीनो लोक क्यों न मिलते हो, इस पृथ्वी की तो बात ही छोड़ दे। भला धृतराष्ट्र के पुत्रो को मारकर हमे कौन सी प्रसन्नता मिलेगी ?

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अर्जुन भगवान कृष्ण को गोविन्द कहकर संबोधित किया क्योंकि वह गौवों तथा समस्त इन्द्रियों की प्रसन्नता के विषय है।

 

 

 

 

इस विशिष्ट शब्द का प्रयोग करके अर्जुन संकेत करता है कि कृष्ण यह समझे कि अर्जुन की इन्द्रिया कैसे तृप्त होगी। किन्तु गोविन्द हमारी इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए नहीं है। हां यदि हम गोविन्द की इन्द्रियों को तुष्ट करने का प्रयास करते है तो हमारी इन्द्रिया स्वतः ही तुष्ट होती है।

 

 

 

किन्तु जब कोई विपरीत मार्ग ग्रहण करता है अर्थात वह अपनी इन्द्रियों की चिंता (तृप्ति) न करके गोविन्द की इन्द्रियों को तुष्ट करने का प्रयास करता है।

 

 

 

 

तब गोविन्द की कृपा से जीव की सारी इच्छाए स्वतः ही पूर्ण हो जाती है। भौतिक दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करना चाहता है और चाहता है कि ईश्वर उसके सहायक की तरह काम करे। किन्तु ईश्वर उसकी तुष्टि नहीं करते है। जितनी उस जीव की पात्रता होती है। उस हद तक नहीं जितना कि वह जीव चाहता है।

 

 

 

यहां पर जाति तथा कुटुंबियो के प्रति अर्जुन का प्रगाढ़ स्नेह आंशिक रूप से इन सबके प्रति उसकी स्वाभाविक करुणा के कारण है। अतः वह युद्ध करने के लिए तैयार नहीं है।

 

 

 

 

हर व्यक्ति अपने वैभव का प्रदर्शन अपने मित्रो तथा परिजनों के समक्ष करना चाहता है। किन्तु अर्जुन को भय है कि उसके सारे मित्र तथा परिजन युद्ध भूमि में मारे जाएगे और वह विजय के पश्चात् उनके साथ अपने वैभव का उपयोग नहीं कर सकेगा। भौतिक जीवन का यह सामान्य लेखा-जोखा है।

 

 

 

 

अर्जुन अपने संबंधियों को मारना नहीं चाह रहा था और यदि उनको मारने की आवश्यकता हो तो अर्जुन की इच्छा थी कि कृष्ण स्वयं उनका वध करे।

 

 

 

 

इस समय उसे (अर्जुन को) यह पता नहीं है कि कृष्ण उन सबको युद्ध भूमि में आने से पूर्व ही मार चुके है और अब उसे (अर्जुन को) निमित्तमात्र बनना है।

 

 

 

 

इसका उद्घाटन आगे चलकर होगा। आध्यात्मिक जीवन भौतिक जीवन से सर्वथा भिन्न होता है। चूंकि भक्त भगवान की इच्छाओ की पूर्ति करना चाहता है अतः भगवद-इच्छा होने पर वह भगवान की सेवा के लिए ही सारे ऐश्वर्य स्वीकार कर सकता है। किन्तु भगवद-इच्छा न हो तो वह एक पैसा भी ग्रहण नहीं कर सकता है।

 

 

 

 

भगवद्भक्त दुष्टो से प्रतिशोध नहीं लेना चाहते है। लेकिन भगवान दुष्टो द्वारा भक्त के उत्पीड़न को सहन नहीं कर पाते है। भगवान का असली भक्त होने के कारण अर्जुन अपने अत्याचारी बंधु-बांधवो से प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था।

 

 

 

 

किन्तु यह भगवान की योजना थी कि उन सभी का वध हो। भगवान किसी को भी अपनी इच्छा से क्षमा कर सकते है किन्तु यदि कोई उनके भक्तो को हानि पहुंचाने की कोशिस में लगा रहता है तो वह उसे कदापि क्षमा नहीं करते है। इसलिए भगवान इन दुराचारियो का वध करने के लिए उद्यत थे यद्यपि अर्जुन उन्हें क्षमा करना चाहता था।

 

 

 

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