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Yajurveda in Hindi Pdf / यजुर्वेद इन हिंदी पीडीएफ

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Yajurveda in Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Yajurveda in Hindi Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Atharva Veda In Hindi Pdf भी पढ़ सकते हैं।

 

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Yajurveda in Hindi Pdf / यजुर्वेद Pdf 

 

 

यजुर्वेद इन हिंदी पीडीएफ डाउनलोड 

 

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Yajurveda in Hindi Pdf
Yajurveda in Hindi Pdf
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यजुर्वेद संहिता पीडीऍफ़ डाउनलोड 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

श्री राम जी के प्रेम से सने हुए सुंदर वचन सुनकर मुनि वशिष्ठ जी ने श्री राम जी की प्रसंशा करते हुए कहा कि हे नाथ! भला आप ऐसा क्यों न कहे। आप सूर्यवंश के भूषण जो है।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

1- श्री राम जी के गुण स्वभाव और शील की बड़ाई करते हुए मुनिराज प्रेम से पुलकित होते हुए बोले। हे श्री राम जी! राजा दशरथ जी ने राज्याभिषेक की तैयारी की है। वह आपको युवराज का पद देना चाहते है।

 

 

 

 

2- इसलिए हे श्री राम जी! आज आप उपवास, हवन आदि विधि पूर्वक सब संयम कीजिए, जिससे विधाता कुशल पूर्वक इस काम को निवाहते हुए सफल कर दे। गुरु जी शिक्षा दे कर राजा दशरथ जी के पास चले गए। श्री राम जी के हृदय में यह सुनकर खेद हुआ ।

 

 

 

 

3- हम सब भाई एक साथ ही जन्म लिए, खाना, सोना, लड़कपन का खेल-कूद, कनक छेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब एकसाथ ही हुए।

 

 

 

 

4- फिर इस निर्मल वंश में एक ही बात अनुचित हो रही है कि और सब भाइयो को छोड़कर एक बड़े भाई का ही राज्याभिषेक होता है। तुलसीदास जी कहते है कि यह प्रभु का प्रेम से पूर्ण पछतावा, भक्तो के मन की कुटिलता का रहण करे।

 

 

 

 

आदर दान, विनय और बड़ाई करते हुए सारी बारात का सम्मान करके राजा जनक ने महान आनंद के साथ प्रेम पूर्वक मुनि समूहों की पूजा और वंदना किया।

 

 

 

 

सिर नवाकर देवताओ को मनाकर राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव के भूखे होते है, वह तो प्रेम से ही प्रसन्न हो जाते है, उन पूर्णकाम माहनुभावो को कोई कुछ देकर कैसे संतुष्ट कर सकता है क्या अंजली जल देने से समुद्र संतुष्ट हो सकता है?

 

 

 

 

2- फिर जनक जी अपने भाई सहित हाथ जोड़कर कोशलाधीश दशरथ जी से स्नेह, शील और सुंदर प्रेम में सना हुआ मनोहर वचन बोले – हे राजन! आपके साथ संबंध हो जाने से हम सब प्रकार से बड़े हो गए। इस राज-पाट और हम दोनों को बिना मूल्य का सेवक ही समझियेगा।

 

 

 

 

3- इन लड़कियों को टहलनी मानकर, इनके ऊपर नयी दया करके पालन करियेगा। मैंने बड़ी ढिठाई की कि आपको यहां बुला भेजा, इस अपराध को क्षमा कीजियेगा।

 

 

 

 

फिर सूर्य कुल के भूषण दशरथ जी ने समधी जनक जी को इतना सम्मान दिया कि वह सम्मान का के भंडार हो गए। उनकी आपस की विनय को कहा नहीं जा सकता है। दोनों के हृदय प्रेम से परिपूर्ण है।

 

 

 

 

4- देवतागण फूल बरसा रहे है, राजा जनवासे को चले, नगाड़े की ध्वनि, जय ध्वनि और वेद ध्वनि हो रही है। आकाश में और नगर में खूब कौतुहल के साथ ही आनंद छा रहा है। तब मुनीश्वर की आज्ञा पाते ही सुंदरी सखियां मंगलगान करती हुई दुलहिनो के साथ दूल्हों को लिवाकर कोहवर को चली।

 

 

 

 

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