Yada Yada Hi Dharmasya Meaning in Hindi / यदा यदा ही धर्मस्य मीनिंग हिंदी

मित्रों इस पोस्ट में Yada Yada Hi Dharmasya Meaning in Hindi दिया गया है। आप इस पोस्ट यदा यदा ही धर्मस्य मीनिंग हिंदी को पूरा जरूर पढ़ें।

 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasya Meaning in Hindi यदा यदा ही धर्मस्य मीनिंग हिंदी 

 

 

 

 

 

 

मित्रो आज हम इस पोस्ट में Yada Yada Hi Dharmasya का अर्थ बताने जा रहे है। यह एक बहुत ही पवित्र श्लोक है। यदा यदा ही धर्मस्य गीता का प्रमुख श्लोक है। इसे भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान देते समय कुरुक्षेत्र में सुनाया था।

 

 

 

जब अर्जुन ने हर तरफ अपने सगे संबंधियों को युद्ध के मैदान में पाया और युद्ध करने से मना कर दिया। तब उन्हें श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया। यह Yada Yada Hi Dharmasya Sloka  अध्याय 4 का 7 और 8 श्लोक है।

 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasya Shlok Meaning In Hindi 

 

 

 

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।। 

 

 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम। 

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

 

 

जब-जब धर्म की हानि होती है। तब-तब मैं आता हूँ, मैं प्रकट होता हूँ। जब-जब अधर्म बढ़ता है मैं तब-तब आता हूँ। साधुओ (सज्जन) लोगो की रक्षा के लिए मैं आता हूँ। दुष्टो के विनाश के लिए मैं आता हूँ। धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूँ और युग-युग में मैं जन्म लेता हूँ।

 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasya Hindi शब्दार्थ 

 

 

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यदा – जब।

यदा – जब।

हि – वास्तव में।

धर्मस्य – धर्म की।

ग्लानि – हानि।

भवति – होती है।

भारत – हे भारत।

अभ्युत्थानम – वृद्धि।

अधर्मस्य – अधर्म की।

तदा तदा –  तब तब।

आत्मानं – अपने रूप को रचता हूँ (अपने रूप को बनता हूँ।)

सृजामि – लोगो के समक्ष प्रकट होता हूँ।

अहम – मैं।

परित्राणाय – सज्जन पुरुषो के लिए (सज्जनों के लिए)

साधूनां – उद्धार करने के लिए।

विनाशाय – विनाश करने के लिए।

च – और।

युगे युगे – युग युग में।

 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasya Meaning In Hindi 

 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasy Glanirbhavati Bharat. 

Abhyutthanamdharmasya Tadatmanam Srijyaham.

 

 

Paritranay Sadhunam Vinashay Cha Dushkritam.

Dharma Sansthapanarthay Sambhavami Yuge Yuge.

 

 

 

 

जब अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र में हर तरफ अपने सगे संबंधियों, भाइयो, पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य को देखा तो युद्ध करने से मना कर दिया। वे कहने लगे कि अपने सगे संबंधियों और रिश्तेदारों पर बाण कैसे चलाऊंगा।

 

 

 

तब श्री कृष्ण ने समय को रोक दिया जो जैसा तह वही ठहर गया। जल, वायु, पक्षी, मानव, फूल सब स्थिर हो गए। तब श्री कृष्ण ने अपना विराट रूप प्रकट किया। उसके बाद अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया। उसके बाद अर्जुन ने युद्ध किया और पांडवो ने विजय पायी।

 

 

 

Sambhavami Yuge Yuge Meaning In Hindi 

 

 

 

मैं आप लोगो को यहां पर Sambhavami Yuge Yuge Meaning In Hindi बताने जा रहा हूँ।

 

Sambhavami- मैं प्रकट होता हूँ। 

 

Yuge- हर युग में 

 

Yuge-हर युग में 

 

 

Sambhavami Yuge Yuge Meaning In English

 

 

 

Sambhavami –  I Am Born.

Yuge – In Age.

Yuge – In Age.

 

 

 

Sambhavami Yuge Yuge Meaning In Hindi 

 

 

 

Sambhavami – प्रकट हुआ करता हूँ।

Yuge Yuge – युग युग में।

 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasya Shlok

 

 

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।। 

 

 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम। 

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasya in Sansktit

 

 

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।। 

 

 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम। 

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

Yada Yada Hi Dharmasya Meaning in Hindi
Yada Yada Hi Dharmasya Meaning in Hindi

 

 

 

 

चंचल तथा दुराग्रही (मन) – अर्जुन कहता है – हे कृष्ण ! चूंकि मन चंचल (अस्थिर) उच्च श्रृंखल, हठीला तथा अत्यंत बलवान है। अतः इसे वश में करना हमारे लिए वायु को वश में करने कठिन कार्य लगता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – मन इतना बलवान तथा दुराग्रही है कि कभी-कभी यह बुद्धि का तिरस्कार तथा उललंघन कर देता है। यद्यपि उसे बुद्धि के आधीन माना जाता है। कृतिम रूप से मनुष्य अपने मित्र तथा शत्रु दोनों के प्रति मानसिक संतुलन स्थापित कर सकता है। इस व्यवहार जगत में जहां मनुष्य को अनेक विरोधी तत्वों से संघर्ष करना होता है। उनके लिए मन को वश में कर पाना अत्यंत कठिन कार्य होता है। किन्तु अंतिम रूप से कोई भी संसारी पुरुष ऐसा करने में संभव नहीं हो पाता है क्योंकि ऐसा कर पाना वेगवान वायु को वश में करने से भी कठिन कार्य है।

 

 

 

यद्यपि बुद्धि को मन का नियंत्रण करना चाहिए। किन्तु मन इतना प्रबल तथा हठी नहीं है कि उसे अपनी बुद्धि से जीतना कठिन हो जाता है। जिस प्रकार अच्छी से अच्छी दवा के द्वारा कभी-कभी रोगी नियंत्रित नहीं होता है। वैदिक साहित्य (कठोपनिषद 1. 3. 3-4) में कहा गया है।

 

 

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च, बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च। 

इन्द्रियांणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान, आत्मेन्द्रिय मनोयुक्तं भोक्ते त्याहुर्मनीषिणः।।  

 

 

“प्रत्येक व्यक्ति इस भौतिक शरीर रूपी रथ पर आरूढ़ है और बुद्धि इसका सारथी है मन लगाम है तथा इन्द्रिया घोड़े है। इस प्रकार मन तथा इन्द्रियों की संगति से यह आत्मा सुख या दुख का भोक्ता है। ऐसा बड़े-बड़े चिंतको का कहना है।

 

 

 

ऐसे प्रबल मन को योगाभ्यास द्वारा वश में किया जा सकता है। किन्तु ऐसा अभ्यास कर पाना अर्जुन जैसे संसारी व्यक्ति के लिए कभी भी व्यावहारिक नहीं होता, तो फिर आधुनिक मनष्य के संबंध में क्या कहा जाय ? मन को वश में रखने की सरलतम विधि यह है कि – स वै मनः कृष्ण पदारविन्दयोः – मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन को पूर्णतया कृष्ण में लगाए। तभी मन को विचलित करने के लिए अन्य व्यस्तताए शेष नहीं रहेगी।

 

 

 

यहां पर उच्च श्रृंखल मन के ऊपर प्रयुक्त उपमा अत्यंत उपयुक्त है – झंझवात को रोक पाना कठिन होता है और उच्च श्रृंखल मन को रोक पाना तो और भी कठिन होता है। मन को वश में रखने का सरलतम उपाय जिसे भगवान चैतन्य ने सुझाया है। यह है कि समस्त दैन्यता के साथ मोक्ष के लिए ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का कीर्तन किया जाय। तभी शांति और मुक्ति संभव हो सकती है।

 

 

 

 

35- उपयुक्त अभ्यास से (मन को) रोकना संभव है – श्री कृष्ण कहते है – हे महाबाहु कुंती पुत्र ! निःसंदेह चंचल मन को वश में करना अत्यंत कठिन है। किन्तु उपयुक्त अभ्यास द्वारा तथा विरक्ति द्वारा ऐसा संभव होता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अर्जुन द्वारा व्यक्त इस हठीले मन को वश में करने की कठिनाई को भगवान स्वीकार करते है। किन्तु साथ ही वह सुझाते है कि अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा यह संभव है। यह अभ्यास क्या है ? कृष्ण भावनामृत ही वह अभ्यास है जिससे समस्त विषयो से विरक्ति होती है। कृष्ण भावनामृत के अभ्यास से मनुष्य भगवान की नवधा भक्ति का आचरण करता है। ऐसी भक्ति का प्रथम अंग है –  कृष्ण के विषय में श्रवण करना। वर्तमान युग में तीर्थ वास, परमात्मा का ध्यान, मन तथा इन्द्रियों का निग्रह, ब्रह्मचर्य पालन, एकांत वास आदि कठोर विधि-विधानों का पालन कर पाना कदापि संभव नहीं है।

 

 

 

 

मन को समस्त प्रकार की दुश्चिंताओ से शुद्ध करने के लिए यह परम शक्तिशाली एवं दिव्य विधि है-कृष्ण भावनामृत में कार्य करना। मन को उन सारे कार्यो से विरक्त कर लेने पर, जिनसे कृष्ण का कोई संबंध नहीं है। मनुष्य सुगमता पूर्वक वैराग्य सीख सकता है। वैराग्य का अर्थ है – पदार्थ से विरक्ति और मन का आत्मा में प्रवृत्त होना।

 

 

 

कृष्ण के विषय मे जीतन अधिक श्रवण किया जाता है उतना ही मनुष्य उन वस्तुओ के प्रति अनासक्त होता है जो मन को कृष्ण से दूर ले जाती है। निर्विशेष आध्यात्मिक विरक्ति कृष्ण के कार्य कलापो में मन लगाने से अधिक कठिन होता है क्योंकि कृष्ण के विषय में श्रवण करने से मनुष्य स्वतः परमात्मा के प्रति आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति ही परेशानुभूति या आध्यात्मिक तुष्टि कहलाती है।

 

 

 

भक्ति संपन्न करने पर आध्यात्मिक दिव्य तुष्टि की अनुभूति होती है। यह ठीक वैसे ही है जिस तरह भोजन के प्रत्येक कौर से भूखे को तुष्टि प्राप्त होती है। भूख लगने पर मनुष्य जितना अधिक भोजन करता है उतनी ही अधिक तुष्टि और शक्ति प्राप्त हो जाती है। कृष्ण भावनामृत से मन भौतिक वस्तुओ से विरक्त होता जाता है। जैसे कुशल उपचार मिलने पर तथा सुपथ्य के द्वारा रोग का इलाज संभव होता है। अतः भगवान कृष्ण के कार्य कलापो का श्रवण उन्मत्त मन का कुशल उपचार है और कृष्ण को अपित भोजन या कृष्ण प्रसादम ग्रहण करना रोगी के लिए उपयुक्त पथ्य है। ऐसा उपचार ही कृष्ण भावनामृत की विधि है।

 

 

 

 

36- सफलता का मंत्र संयमित मन – श्री कृष्ण कहते है – जिसका मन उच्च श्रंखल है उसके लिए आत्म साक्षात्कार कठिन कार्य होता है किन्तु जिसका मन संयमित है और जो समुचित उपाय करता है उसकी सफलता ध्रुव है ऐसा मेरा मत है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवान घोषणा करते है कि जो व्यक्ति अपने मन को भौतिक व्यापारों से विलग करने के लिए समुचित उपचार नहीं करता है। उसे आत्म साक्षात्कार में शायद ही सफलता प्राप्त हो सके। मन का निग्रह किए बिना योगाभ्यास करना समय का अपव्यय है। भौतिक भोग में मन लगाकर योग का अभ्यास करना मानो अग्नि में जल डालकर उसे प्रज्वलित करने के समान है। योग का ऐसा प्रदर्शन भले ही भौतिक दृष्टि से लाभप्रद हो किन्तु जहां तक आत्म-साक्षात्कार का प्रश्न है यह सब व्यर्थ है।

 

 

 

कृष्ण भावना भावित व्यक्ति बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के ही योगाभ्यास का फल सरलता से प्राप्त कर लेता है। किन्तु योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति को कृष्ण भावना भावित हुए बिना सफलता नहीं मिल सकती है। अतः मनुष्य को चाहिए कि भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरंतर मन को लगाकर उसे वश में करे।

 

 

 

 

37- असफल योगी की गति – अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण ! उस असफल योगी की गति क्या है जो प्रारम्भ में श्रद्धा पूर्वक आत्म-साक्षात्कार की विधि ग्रहण करता है किन्तु बाद में भौतिकता के कारण उससे विचलित हो जाता है और योग सिद्धि को प्राप्त नहीं कर पाता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवद्गीता में आत्म-साक्षात्कार या योग का मार्ग वर्णित है। आत्म साक्षात्कार का मूल नियम यह है कि जीवात्मा यह भौतिक शरीर नहीं है। अपितु उससे भिन्न है और उसका सुख शाश्वत जीवन आनंद तथा ज्ञान में निहित है। इसके लिए अष्टांग योग की विधि या भक्ति योग का अभ्यास करना होता है। आत्म साक्षात्कार की खोज ज्ञान के द्वारा की जाती है। यह शरीर तथा मन दोनों से परे है। अष्टांग योग या भौतिक योग की प्रत्येक विधि में जीव को अपनी स्वाभाविक स्थिति भगवान से अपने संबंध तथा उन कार्यो की अनुभूति प्राप्त करनी होती है। जिनके द्वारा वह टूटी हुई श्रृंखला को जोड़ सके और कृष्ण भावनामृत की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था प्राप्त कर सके।

 

 

 

 

भगवान ने द्वितीय अध्याय में इसपर बल दिया है कि दिव्य मार्ग में थोड़े से प्रयास से भी मोक्ष की महती आशा रहती है। इन तीनो में से इस युग के लिए भक्ति योग विशेष रूप से उपयुक्त है। लेकिन इन तीनो विधियों में से किसी एक का भी पालन करके मनुष्य देर-सवेर अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह तीन विधि है – ज्ञान, अष्टांग योग तथा भक्ति योग।

 

 

 

भाले ही कोई आत्मसाक्षात्कार के मार्ग को नियम या निष्ठापूर्वक क्यों न स्वीकार करे किन्तु ज्ञान की अनुशीलन विधि तथा अष्टांग योग का अभ्यास इस युग के लिए सामान्यतया बहुत कठिन है। अतः निरंतर प्रयास करने पर भी मनुष्य अनेक कारणों से असफल हो सकता है। अतः अर्जुन पुनः आश्वस्त होने की दृष्टि से भगवान कृष्ण से अपने पूर्व कथन की पुष्टि करने के लिए कहता है क्योंकि ईश-साक्षात्कार की यह श्रेष्ठतम प्रत्यक्ष विधि है।

 

 

 

आत्मसाक्षात्कार में असफल होने का पहला कारण यह हो सकता है कि मनुष्य इस विधि का पालन करने में पर्याप्त सतर्क न रह पाए। दिव्यमार्ग का अनुसरण बहुत कुछ माया के ऊपर धावा बोलने जैसा है। फलस्वरूप जब भी मनुष्य माया के वाश से छूटना चाहता है तब वह अनेक प्रलोभन के द्वारा अभ्यास कर्ता को पराजित करना चाहती है। अर्जुन आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से विचलन के प्रभाव के संबंध में जिज्ञासा करता है।

 

 

 

बद्धजीव पहले से प्रकृति के गुणों द्वारा मोहित रहता है और दिव्य अनुशासनों का पालन करते समय भी उसके पुनः मोहित होने की संभावना बनी रहती है। यही योगाच्चलित मानस अर्थात दिव्यपथ से विचलन कहलाता है।

 

 

 

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