World Map Pdf in Hindi Download / वर्ल्ड मैप इन हिंदी HD pdf Download

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World Map Pdf Download in Hindi / वर्ल्ड मैप पीडीएफ डाउनलोड

 

 

 

 

 

 

World Map Pdf Free Download Hindi 

 

 

Oxford Student Atlas Pdf Book Download in Hindi

 

 

 

मित्रों अक्सर यह रिक्वेस्ट आ रही थी कि World Map Pdf 2020, World Map Pdf 2021 उपलब्ध करवाया जाए, सो आज हम आप तक World Map Pdf उपलब्ध करवा रहे हैं।  आप World Map Pdf Free Download कर सकते हैं। यह परीक्षा की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है।

 

 

 

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IAS, PCS, UPSC, Bank रेलवे आदि की परीक्षा में भारतीय मानचित्र और विश्व के मानचित्र से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। आप Atlas Map Book के माध्यम से इसकी तैयारी कर सकते हैं।

 

 

 

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स्थिर मनवाला, आशक्ति, भय तथा क्रोध से मुक्त होता है – श्री कृष्ण कहते है जो त्रय तापो के होने पर भी मन में विचलित नहीं होता है अर्थात सुख में सहज प्रसन्न नहीं होता है और आशक्ति क्रोध तथा भय से सदा ही मुक्त है वह स्थिर मनवाला मुनि कहलाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – मुनि शब्द का अर्थ है वह जो शुष्क चिंतन के लिए मन को अनेक प्रकार से उद्वेलित करे किन्तु किसी तथ्य पर पहुंचने में विफल रहे। कहा जाता है कि प्रत्येक मुनि का अपना-अपना दृष्टि कोण होता है और जब तक एक मुनि का दृष्टि कोण दूसरे मुनि के दृष्टि कोण से भिन्न न हो तब तक उसे वास्तविक मुनि नहीं कहा जा सकता है।

 

 

 

न चासा वृषिर्यस्य मंत्रं न भिन्नम (महाभारत वनवर्ष (313, 116) किन्तु जिस स्थितधीः मुनि का यहां भगवान ने उल्लेख किया है। वह सामान्य मुनि से भिन्न होता है। स्थितधीः मुनि सदैव कृष्ण भावनाभावित रहता है क्योंकि वह सारा सृजनात्मक चिंतन पूरा कर चुका होता है।

 

 

 

कृष्ण भावनाभावित मुनि राग या विराग से प्रभावित नहीं होता है। राग का अर्थ होता है अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए वस्तुओ को ग्रहण करना और विराग अर्थ है ऐसी किसी भी ऐंद्रिक आशक्ति का सदा अभाव। किन्तु कृष्ण भावनामृत में स्थिर व्यक्ति में न तो राग होता है न ही विराग होता है क्योंकि उसका सारा जीवन ही भगवत सेवा के लिए समर्पित रहता है। फलतः सारे प्रयास असफल रहने पर भी वह कभी क्रुद्ध नहीं होता है। चाहे विजय हो या न हो कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति अपने संकल्प का पक्का होता है।

 

 

 

 

जिसने शुष्क चिंतन की अवस्था पार कर ली है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है भगवान श्री कृष्ण या वासुदेव ही सब कुछ है (वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सु दुर्लभः) वह स्थिर चित्त मुनि कहलाता है।

 

 

 

 

ऐसा कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति त्रिविध तापो के संघात से तनिक भी विचलित नहीं होता है क्योंकि वह इन तापो को (कष्टों) को भगवत कृपा के रूप में स्वीकार करता है और पूर्व के पापो के कारण अपने को अधिक कष्ट सहन करने के योग्य बनाता है और उसे अनुभव होता है कि उसके सारे दुःख भगवत कृपा से रंच मात्र रह जाते है।

 

 

 

 

ऐसा व्यक्ति सोचता है कि वह भगवत कृपा से ही उसे सुख की ऐसी स्थिति प्राप्त हुई है और भगवान की सेवा करने का उसका प्रयास और दृढ हो जाता है और भगवान की सेवा के लिए तो वह सदैव साहस करने के लिए सन्नद्ध रहता है और इस तरह ही वह अपने सुख के लिए भी या जब वह सुखी रहता है तो अपने को सुख के आयोग्य मानकर इसका भी श्रेय भगवान को देता है।

 

 

 

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