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Warren Buffett Books in Hindi Pdf / वॉरेन बफेट बुक्स हिंदी Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Warren Buffett Books in Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Warren Buffett Books in Hindi Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Bahut Door Kitna Door Hota Hai Pdf कर सकते हैं।

 

 

 

Warren Buffett Books in Hindi Pdf Download

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अहो! जिनके स्मरण करने मात्र से सब कुछ पवित्र हो जाता है उन्ही के बिना यह किया हुआ सारा यज्ञ अपवित्र हो जायेगा। द्रव्य, मंत्र आदि, हव्य और कव्य ये सब जिनके स्वरुप है उन्ही भगवान शिव के बिना इस यज्ञ का आरंभ कैसे किया गया? क्या आपने भगवान शिव को सामान्य देवता समझकर उनका अनादर किया है?

 

 

 

 

आज आपकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है। इसलिए आप पिता होकर भी मुझे अधम जंच रहे है। अरे! ये विष्णु और ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनि अपने प्रभु भगवान शिव के आये बिना इस यज्ञ में कैसे चले आये? ऐसा कहने के बाद शिव स्वरूपा परमेश्वरि सती ने भगवान विष्णु ब्रह्मा इंद्र आदि सब देवताओ को तथा समस्त ऋषियों को बड़े-बड़े शब्दों में फटकारा।

 

 

 

 

ब्रह्मा जी कहते है – नारद! इस प्रकार से क्रोध से भरी हुई जगदंबा सती ने वहां व्यथित हृदय से अनेक प्रकार की बाते कही। श्री विष्णु आदि समस्त देवता और मुनि जो वहां उपस्थित थे सती की बात सुनकर चुप रह गए। अपनी पुत्री के वचन सुनकर कुपित हुए दक्ष ने सती की ओर क्रूर दृष्टि से देखा और इस प्रकार कहा।

 

 

 

 

भद्रे! तुम्हारे बहुत वचन कहने से क्या लाभ। इस समय तुम्हारा यहां कोई काम नहीं है। तुम जाओ या ठहरो यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। तुम यहां आयी ही क्यों? समस्त विद्वान जानते है कि तुम्हारे पति शिव अमंगल रूप है। वे कुलीन भी नहीं है। वेद से बहिष्कृत है और भूतो प्रेतों तथा पिशाचो के स्वामी है।

 

 

 

 

वे बहुत ही कुवेष धारण किए रहते है। इसीलिए रूद्र को इस यज्ञ के लिए नहीं बुलाया गया है। बेटी! मैं रूद्र को अच्छी तरह जानता हूँ। अतः जान बूझकर ही मैंने देवर्षियों की सभा में उनको आमंत्रित नहीं किया है। रूद्र को शास्त्र के अर्थ का ज्ञान नहीं है।

 

 

 

 

वे उदंड और दुरात्मा है। मुझ मूढ़ पापी ने ब्रह्मा जी के कहने से उनके साथ तुम्हारा विवाह कर दिया था। अतः शुचिस्मिते! तुम क्रोध छोड़कर स्वस्थ हो जाओ। इस यज्ञ में तुम आ ही गयी हो तो स्वयं अपना भाग ग्रहण करो। दक्ष के ऐसा कहने पर उनकी त्रिभुवन पूजिता पुत्री सती ने शिव की निंदा करने वाले अपने पिता की ओर जब दृष्टिपात किया तब उनका रोष और भी बढ़ गया।

 

 

 

वे मन ही मन सोचने लगी कि अब मैं शंकर जी के पास कैसे जाउंगी। यदि शंकर जी के दर्शन की इच्छा से वहां गयी और उन्होंने यहां का समाचार पूछा तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगी? तदनन्तर तीनो लोको की जननी सती रोषावेश से युक्त हो लंबी सांस खींचती हुई अपने दुष्ट हृदय पिता से बोली।

 

 

 

 

जो महादेव जी की निंदा करता है या सुनता है वे दोनों तब तक नरक में पड़े रहते है जब तक सूर्य और चन्द्रमा विद्यमान है। अतः तात! मैं अपने इस शरीर को त्याग दूंगी जलती आग में प्रवेश कर जाउंगी। अपने स्वामी का अनादर सुनकर अब मुझे इस जीवन की रक्षा से।

 

 

 

 

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