Vishnu Sahasranamam in Hindi Pdf / विष्णु सहस्रनाम Pdf Free

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Vishnu Sahasranam in Hindi Pdf विष्णु सहस्रनाम Pdf Free

 

 

 

 

 

 

विष्णु सहस्रनाम Pdf Free Download

 

 

 

विष्णु सहस्रनाम मंत्र और उसके लाभ

 

 

Vishnu Sahasranamam in Hindi Pdf

 

 

 

विष्णु सहस्रनाम का उद्गम महाभारत काल के समय को माना जाता है। जब पितामह भीष्म शरशैया पर लेटे हुए थे। युधिष्ठिर के प्रश्न करने पर ही उन्होंने ‘विष्णु सहस्रनाम’ मंत्र को सर्वश्रेष्ठ बताया था। इस मंत्र में ज्योतिषीय लाभ भी है। यह ‘विष्णु सहस्रनाम’ मंत्र बुरी किस्मत और श्राप से उत्पन्न प्रभाव को खत्म कर देता है।

 

 

 

जो व्यक्ति ‘विष्णु सहस्रनाम’ का जाप करता है उसका भाग्य और तकदीर संवर जाते है। इस जाप की शक्ति से मन को शांति मिलती है और अच्छी ऊर्जा का संचार होता है। इस जाप के प्रभाव से मनुष्य अपने जीवन में तेजी से आगे बढ़ता है और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। उसकी सभी बाधाए दूर हो जाती है।

 

 

 

‘विष्णु सहस्रनाम’ के प्रभाव से मनुष्य के आस-पास सुरक्षा कवच का निर्माण हो जाता है और हर प्रकार से उसकी रक्षा होती है। यह शक्तिशाली मंत्र मनुष्य के जन्म जन्मांतर के पाप को शमन करने की क्षमता रखता है। विष्णु के हजार नाम की महत्ता बड़ी स्वत्वकिता से परिपूर्ण है। इसके प्रतिदिन जाप से घर में बच्चो को स्वास्थ्य और समग्र कल्याण को बढ़ाता है।

 

 

 

यह एक ऐसा मंत्र है जिसमे विष्णु के हजारो नमो का मिश्रण है। यह मंत्र शैव और वैष्णवो के मध्य सेतु का कार्य करता है। विष्णु सहस्रनाम में विष्णु को शिव, रूद्र, ईशान और शम्भू के नाम से संबोधित किया गया है। अगर कोई व्यक्ति विष्णु के सहस्रनामो का जाप नहीं कर सकता है तो वह केवल एक मंत्र के द्वारा ही सहस्रनाम का फल प्राप्त कर जीवन में सुख और शांति का विस्तार पा सकता है।

 

 

 

नमो स्तवन, अनंताप, सहस्र पादाक्षि शिरोरु वाहवे। 

सहस्र नाम्ने पुरुषाय शास्वते, सहस्रकोटि युग धारिणे नमः।।

 

इस महामंत्र का जाप नित्य ही करना चाहिए जिससे मानव का कल्याण संभव है।

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

श्री कृष्ण कहते है – जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी सघन वन को पार कर जाएगी तब तुम सुने हुए तथा सुनने योग्य सबके प्रति अन्यमनस्क हो जाओगे।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – वैदिक रश्मे यथा अनुष्ठान तथा त्रिकाल संध्या, प्रातः कालीन स्नान, पितृ तर्पण आदि क्रियाए नव दीक्षितो के लिए अनिवार्य होती है किन्तु जब कोई पूर्णतया कृष्ण भावना भावित हो जाता है और कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा हुआ हो तो वह इन विधि विधानों के प्रति उदासीन हो जाता है क्योंकि उसे पहले ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है। भगवद्भक्तो के जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त है जिन्हे भगवद्भक्ति के कारण वैदिक कर्मकांड से विरक्ति उत्पन्न हो गई।

 

 

 

यदि कोई परमेश्वर कृष्ण की सेवा करके ज्ञान को प्राप्त होता है तो उसे शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार के कर्म तथा तपस्या व यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। इसी प्रकार जो यह नहीं समझता कि वेदो का उद्देश्य कृष्ण तक पहुंचना है। वह अपने आप को अनुष्ठान आदि में व्यस्त रखता है। वह केवल अपना समय नष्ट करता है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति शब्द – ब्रह्म की सीमा या वेदो तथा उपनिषदों की परिधि को भी लाँघ जाते है।

 

 

 

जब मनुष्य श्री कृष्ण को तथा उनके साथ अपने संबंध को वास्तविक रूप में समझ लेता है तो वह सकाम कर्मो के अनुष्ठानो के प्रति पूर्णतया अन्यमनस्क हो जाता है। भले ही वह अनुभवी ब्राह्मण क्यों न हो। भक्त परंपरा के महान भक्त तथा आचार्य माधवेन्द्र पुरी का कहना है –

 

 

 

हे मेरी त्रिकाल प्रार्थनाओ तुम्हारी जय हो। हे स्नान तुम्हे प्रणाम है, हे देवपितृगण अब मैं आप लोगो के लिए तर्पण करने में असमर्थ हूँ। अब तो जहां भी बैठता हूँ यादव कुलवंशी कंश के हन्ता श्री कृष्ण का ही स्मरण करता हूँ और इस तरह मैं अपने पापमय बंधन से मुक्त हो सकता हूँ। मैं सोचता हूँ यही मेरे लिए पर्याप्त है।”

 

 

 

 

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