Vishnu Sahasranamam Pdf Hindi / Vishnu Sahasranamam Lyrics Pdf Hindi

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Vishnu Sahasranamam Pdf Hindi देने जा रहे हैं। आप नीचे की लिंक से Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi Pdf free Download कर सकते हैं।

 

 

 

Vishnu Sahasranamam Pdf Hindi / विष्णु सहस्रनाम पीडीएफ फ्री डाउनलोड 

 

 

 

 

 

 

मित्रों Vishnu Sahasranamam भगवान श्री विष्णु जी का बेहद शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें भगवान विष्णु जी के 1000 नाम दिए गए हैं। इसे पढ़ने से जातक को बहुत लाभ होता है।

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

भगवान को अर्जुन को ब्रह्म के बिषय में बताना – भगवान ने अर्जुन से कहा – हे अर्जुन, अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है और उसका नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है। जीवो के भौतिक शरीर से संबंधित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – वैदिक साहित्य में जीव को जीवात्मा तथा ब्रह्म कहा जाता है किन्तु उसे कभी परब्रह्म नहीं कहा जाता है। ब्रह्म अविनाशी तथा नित्य है और इसका विधान कभी भी नहीं बदलता है किन्तु ब्रह्म से भी परे परब्रह्म होता है। ब्रह्म का अर्थ है जीव तथा परब्रह्म का अर्थ भगवान है। जीव का स्वरुप भौतिक जगत में उसकी स्थिति से भिन्न होता है। जीवात्मा विभिन्न स्थितियां ग्रहण करता है-कभी वह अंधकार पूर्ण भौतिक प्रकृति से मिल जाता है और पदार्थ को ही अपना स्वरूप मान लेता है, तो कभी वह परा आध्यात्मिक प्रकृति के साथ मिल जाता है। इसलिए वह परमेश्वर की ततस्था शक्ति कहलाता है।

 

 

 

भौतिक चेतना में जीव का स्वभाव पदार्थ के ऊपर अपना प्रभुत्व जताना है किन्तु आध्यात्मिक चेतना या कृष्ण भावनामृत में उसकी स्थिति परमेश्वर की सेवा करना है। जब जीव भौतिक चेतना में होता है तो उसे इस संसार में विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करने पड़ते है। यह भौतिक चेतना के कारण कर्म अथवा विविध शृष्टि कहलाता है।

 

 

 

भौतिक प्रकृति में वह चौरासी लाख योनियों में से कोई भी शरीर धारण कर सकता है। किन्तु आध्यात्मिक प्रकृति में उसका एक ही शरीर रहता है। भौतिक प्रकृति में वह अपने कर्म के कभी मनुष्य रूप में प्रकट होता है तो कभी देवता, पशु, पक्षी आदि के रूप में प्रकट होता है। भौतिक या आध्यात्मिक प्रकृति के साथ अपनी पहचान के अनुसार ही उसे भौतिक या आध्यात्मिक शरीर की प्राप्ति होती है।

 

 

 

यज्ञ प्रक्रिया में जीव अभीष्ट स्वर्ग लोको की प्राप्ति के लिए विशेष यज्ञ करता है। स्वर्ग लोक की प्राप्ति तथा वहां का सुख भोगने की इच्छा से ही जीव यज्ञ सम्पन्न करता है, किन्तु जब उसका पुण्य क्षीण हो जाता है तो वह पुनः मनुष्य रूप में पृथ्वी पर वापस आ जाता है, यह प्रक्रिया ही कर्म कहलाती है। यज्ञ प्रक्रिया से स्वर्ग प्राप्ति के पश्चात पुण्य क्षीण होने पर जीव को पृथ्वी पर वर्षा के रूप में उतरकर अन्न का रूप धारण करना पड़ता है, इस अन्न को मनुष्य खाता है जिससे यह ओज (वीर्य) में परिणत होता है जो स्त्री के गर्भ में जाकर फिर से मनुष्य का रूप धारण करता है।

 

 

 

छान्दोग्य उपनिषद में वैदिक यज्ञ – अनुष्ठानो का वर्णन मिलता है। यज्ञ की वेदी में पांच अग्नियों को पांच प्रकार की आहुतियां दी जाती है। ये पांच अग्नियां – स्वर्गलोक, बादल, पृथ्वी, मनुष्य तथा स्त्री रूप में मानी गयी है और श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न तथा ओज (वीर्य) ये पांच प्रकार की आहुतियां है। मनुष्य द्वारा यज्ञ करने पर शाश्वत रीति से आने-जाने का क्रम चलता रहता है किन्तु कृष्ण भावनाभावित पुरुष ऐसे यज्ञो से दूर ही रहता है, वह सीधे कृष्ण भावनामृत ग्रहण करता है और इस प्रकार ईश्वर के पास जाने की पूर्ण तैयारी करता है।

 

 

 

भगवद्गीता के निर्विशेषवादी भाष्यकार बिना कारण के कल्पना करते है कि इस जगत में ब्रह्म जीव का रूप धारण करता है। किन्तु भगवान जीव को “मेरा शाश्वत अंश” भी कहते है। भगवान का यह अंश जीव भले ही इस भौतिक जगत में आ गिरता है किन्तु परमेश्वर (अच्युत) कभी नहीं गिरता है। अतः यह विचार कि ब्रह्म जीव का रूप धारण करता है। ग्राह्य नहीं है जबकि निर्विशेषवादी इसके समर्थन में गीता के पन्द्रहवे अध्याय के सातवे श्लोक का उदाहरण देते है। सभी को यह याद रखना होगा कि वैदिक साहित्य में ब्रह्म (जीवात्मा) को परब्रह्म (परमेश्वर) से पृथक माना गया है।

 

 

 

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