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Vishnu Sahasranamam in Sanskrit pdf / विष्णु सहस्त्रनाम संस्कृत Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Vishnu Sahasranamam in Sanskrit pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Vishnu Sahasranamam in Sanskrit pdf Download कर सकते हैं और यहां से Shani Aarti Pdf Hindi कर सकते हैं।

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Vishnu Sahasranamam in Sanskrit pdf Download

 

 

पुस्तक का नाम  Vishnu Sahasranamam in Sanskrit pdf
भाषा  संस्कृत 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  0.07 Mb 
पृष्ठ  32 
श्रेणी  धार्मिक 

 

 

 

 

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Vishnu Sahasranamam in Sanskrit pdf
Vishnu Sahasranamam in Sanskrit pdf Download यहां से करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

जिनके लिए शिवा ने बड़ी भारी तपस्या की थी। उन भगवान शिव को बड़े प्रेम से देखती हुई वे वहां अत्यंत शोभा पा रही थी। फिर मेरे और गर्गादि मुनियो के कहने से शंभु ने लोकाचारवश शिवा का पूजन किया। इस प्रकार परस्पर पूजन करते हुए वे दोनों जगन्मय पार्वती परमेश्वर वहां सुशोभित हो रहे थे।

 

 

 

त्रिभुवन की शोभा से सम्पन्न हो परस्पर देखते हुए उन दोनों दम्पति की लक्ष्मी आदि देवियो ने विशेष रूप से आरती उतारी। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! इसी समय वहां गर्गाचार्य से प्रेरित हो मेना सहित हिमवान ने कन्यादान का कार्य आरंभ किया।

 

 

 

उस समय वस्त्राभूषणो से विभूषित महाभागा मेना सोने का कलश लिए पति हिमवान के दाहिने भाग में बैठी। तत्पश्चात पुरोहित सहित हर्ष से भरे हुए शैलराज ने पाद्य आदि के द्वारा वर  का पूजन करके वस्त्र चंदन और आभूषणों द्वारा उनका वरण किया।

 

 

 

इसके बाद हिमाचल ने ब्राह्मणो से कहा – आप लोग तिथि आदि के कीर्तन पूर्वक कन्यादान के संकल्पवाक्य का प्रयोग बोले। उसके लिए अवसर आ गया है। वे सब द्विजश्रेष्ठ काल के ज्ञाता थे। अतः तथास्तु कहकर वे सब बड़ी प्रसन्नता के साथ तिथि आदि का कीर्तन करने लगे।

 

 

 

तदनन्तर सुंदर लीला करने वाले परमेश्वर शंभु के द्वारा मन ही मन प्रेरित हो हिमाचल ने प्रसन्नता पूर्वक हंसकर उनसे कहा – शंभो! आप अपने गोत्र का परिचय दे। प्रवर, कुल, नाम वेद और शाखा का प्रतिपादन करे। अब अधिक समय न बिताये।

 

 

 

हिमाचल की यह बात सुनकर भगवान शंकर सुमुख होकर भी विमुख हो गए। अशोचनीय होकर भी तत्काल शोचनीय अवस्था में पड़ गए। उस सम्मी श्रेष्ठ देवताओ मुनियो गन्धर्वो यक्षों और सिद्धो ने देखा कि भगवान शिव के मुख से कोई उत्तर नहीं निकल रहा है।

 

 

 

नारद! यह देखकर तुम हंसने लगे और महेश्वर का मन ही मन स्मरण करके गिरिराज से यों बोले – पर्वतराज! तुम मूढ़ता के वशीभूत होकर कुछ भी नहीं जानते। महेश्वर से क्या कहना चाहिए और क्या नहीं इसका तुम्हे पता नहीं है। वास्तव में तुम बड़े बहिर्मुखी हो।

 

 

 

तुमने इस समय साक्षात् हर से उनका गोत्र पूछा है और उसे बताने के लिए प्रेरित किया है। तुम्हारी यह बात अत्यंत उपहासजनक है। पर्वतराज! इनके गोत्र, कुल और नाम को तो ब्रह्मा और विष्णु आदि भी नही जानते फिर दूसरों की क्या चर्चा है?

 

 

 

शैलराज! जिनके एक दिन में करोडो ब्रह्माओं का लय होता है उन्ही भगवान शंकर को तुमने आज  काली के तपोबल से प्रत्यक्ष देखा है। इनका कोई रूप नहीं है, ये प्रकृति से परे निर्गुण परब्रह्म परमात्मा है। निराकार, निर्विकार, मायाधीश एवं परात्पर है।

 

 

 

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