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Vishnu Aarti Pdf Hindi / श्री विष्णु आरती Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Vishnu Aarti Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Vishnu Aarti Pdf Hindi download कर सकते हैं और आप यहां से Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf कर सकते हैं।

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Vishnu Aarti Pdf Hindi Download

 

 

पुस्तक का नाम  Vishnu Aarti Pdf Hindi
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  0.80 Mb 
पृष्ठ 
भाषा  हिंदी 
श्रेणी  भक्ति 

 

 

 

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Vishnu Aarti Pdf Hindi
Vishnu Aarti Pdf Hindi Download यहां से करे।
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Vishnu Aarti Pdf Hindi
Apara Ekadashi Katha in Hindi Pdf यहां से डाउनलोड करे।
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Vishnu Aarti Pdf Hindi
Vedant Darshan Pdf Hindi Download यहां से करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

दक्ष! यदि कोई विष्णु भक्त होकर मेरी निंदा करेगा और मेरा भक्त होकर विष्णु की निंदा करेगा तो तुम्हे दिए हुए पूर्वोक्त सारे पाप उन्ही दोनों को प्राप्त होंगे और निश्चय ही उन्हें तत्वज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। ब्रह्मा जी कहते है – मुने! भगवान महेश्वर के इस सुखदायक वचन को सुनकर सब देवता मुनि आदि को उस अवसर का बड़ा हर्ष हुआ।

 

 

 

कुटुंब सहित दक्ष बड़ी प्रसन्नता के साथ शिव भक्ति में तत्पर हो गया। वे देवता आदि भी शिव को ही सर्वेश्वर जानकर भगवान शिव के भजन में लग गए। जिसने जिस प्रकार परमात्मा शंभु की स्तुति की थी उसे उसी प्रकार संतुष्ट चित्त हुए शंभु ने वर दिया।

 

 

 

मुने! तदनन्तर भगवान शिव की आज्ञा पाकर प्रसन्नचित्त हुए शिव भक्त दक्ष ने शिव के ही अनुग्रह से अपना यज्ञ पूरा किया। उन्होंने देवताओ को तो यज्ञ में भाग दिए ही शिव को भी पूर्ण भाग दिया। साथ ही ब्राह्मणो को दान दिया। इस तरह उन्हें शंभु का अनुग्रह प्राप्त हुआ।

 

 

 

इस प्रकार महादेव जी के उस महान कर्म का विधि पूर्वक वर्णन किया गया। प्रजापति ने ऋत्विजो के सहयोग से उस यज्ञकर्म को विधिवत समाप्त किया। मुनीश्वर! इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप शंकर के प्रसाद से वह दक्ष यज्ञ पूरा हुआ। तदनन्तर सब देवता और ऋषि संतुष्ट हो भगवान शिव के यश का वर्णन करते हुए अपने-अपने स्थान को चले गए।

 

 

 

दूसरे लोग भी उस समय वहां से सुखपूर्वक विदा हो गए। मैं और श्री विष्णु भी अत्यंत प्रसन्न हो भगवान शिव के सर्वमंगलदायक सुयश का निरंतर गान करते हुए अपने-अपने स्थान को सानंद चले आये। सत्पुरुषों के आश्रयभूत महादेव जी भी दक्ष से सम्मानित हो प्रीति और प्रसन्नता के साथ गणो सहित अपने निवास स्थान कैलास पर्वत को चले गए।

 

 

 

अपने पर्वत पर आकर शंभु ने अपनी प्रिया सती का स्मरण किया और प्रधान-प्रधान गणो से उनकी कथा कही। इस प्रकार दक्ष कन्या सती यज्ञ में अपने शरीर को त्यागकर फिर हिमालय की पत्नी मेना के गर्भ से उत्पन्न हुई यह बात प्रसिद्ध है। फिर वहां तपस्या करके गौरी शिवा ने भगवान शिव का पतिरूप में वरण किया।

 

 

 

वे उनके वामांग में स्थान पाकर अद्भुत लीलाये करने लगी। नारद! इस तरह मैंने तुमसे सती के परम अद्भुत दिव्य चरित्र का वर्णन किया है जो मोक्ष और भोग को देने वाला तथा सम्पूर्ण कामनाओ को पूर्ण करने वाला है। यह उपाख्यान पाप को दूर करने वाला पवित्र एवं परम पावन है।

 

 

 

स्वर्ग यश तथा आयु को देने वाला तथा पुत्र पौत्र रूप फल प्रदान करने वाला है। तात! जो भक्तिमान पुरुष भक्तिभाव से लोगो को यह कथा सुनाता है। वह वह इस लोक में सम्पूर्ण कर्मो का फल पाकर परलोक में परम गति को प्राप्त कर लेता है।

 

 

 

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