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5 + Vinoba Bhave Books Pdf Hindi / विनोबा भावे बुक्स हिंदी पीडीऍफ़

मित्रों इस पोस्ट में Vinoba Bhave Books Pdf Hindi दिया जा रहा है। आप नीचे की लिंक से Vinoba Bhave Books Pdf Hindi Download कर सकते हैं।

 

 

 

 

Vinoba Bhave Books Pdf Hindi  विनोबा भावे बुक्स हिंदी पीडीऍफ़

 

 

 

 

 

1- विचार पोथी 

 

2- राजनीति से लोकनीति की ओर 

 

3- भूदान यज्ञ 

 

4- संत सुधा सार 

 

5- भूदान गंगा 

 

 

 

विनोबा भावे के बारे में 

 

 

 

विनोबा भावे का नाम महाराष्ट्र में बड़े आदर और सम्मान से लिया जाता है। विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। इनका जन्म महाराष्ट्र के कोंकड़ क्षेत्र में हुआ था। विनोबा भावे पढ़ने-लिखने में बहुत तेज थे। विशेषकर उनका गणित में प्रथम स्थान आता था और वह बहुत ही हाजिर जवाब थे।

 

 

 

एक बार इनके मित्र समूह में एक लड़के ने एक लड़के ने इनकी चुटकी ली क्योंकि उस समय विनोबा का नाख़ून बढ़ा हुआ था। एक लड़के ने कहा विनोबा तुम्हारे नाख़ून बढे हुए है। विनोबा ने तुरंत उत्तर दिया तुम्हे क्यों चिंता हो रही है। तुम नाई हो क्या जो नाखुनो को देखकर चिंता हो रही है।

 

 

 

विनोबा का जन्म 11 सितंबर 1895 है। उनका बचपन का नाम विनायक था। विनोबा नाम गांधी जी का दिया हुआ था। विनोबा में देशभक्ति भी भरी हुई थी। एक बार एक अंग्रेज उनके मित्र के घर गया और उसके खेत में अपना तम्बू गाड़ दिया। विनोब को जब यह बात पता लगी तो उन्होंने मित्र से पूछा।

 

 

 

उसके अनभिग्यता जाहिर करने के बाद विनोबा अपने कुछ साथियो के साथ उस अंग्रेज का तम्बू उखाड़कर फेक दिया। वह अंग्रेज अधिकारी उन साहसी बालको का विरोध भी नहीं कर पाया। विनोबा द्वारा शुरू किया हुआ नारा (सब भूमि गोपाल की) उस समय भारत में बहुत अधिक प्रचलित हुआ था।

 

 

 

25 मार्च 1916 को इंटरमीडिएट करने के पश्चात् वे अहमदाबाद में गांधी आश्रम पहुंचे। 1940 में प्रथम सत्याग्रही के रूप में विनोबा ने अपना भाषण पवनार में दिया। 9 अगस्त 1942 को भारत छोडो आंदोलन के सिलसिले में जेल गए। 15 अगस्त को आजादी मिलते ही बंगाल में दीन दुखियो के कष्ट निवारण के लिए गए।

 

 

विनोबा के विचार उन्हों के शब्दों में —-

 

 

1- हिंदुस्तान का आदमी बैल तो पाना चाहता है लेकिन गाय की सेवा नहीं करना चाहता है।

2- हिंदुस्तान की एकता के लिए हिंदी भाषा से ज्यादा योगदान देवनागरी लिपि दे सकती है।

3- जब तक कष्ट सहने की तैयारी नहीं होगी तब तक लाभ दिखाई नहीं देगा। लाभ की इमारत कष्ट के धूप में ही बनती है।

4- मनुष्य जितना ज्ञान में घुल गया उतना ही कर्म में रंग जाता है।

 

 

Vinoba Bhave Ke Bare Mein

 

 

Vinoba Bhave Ka Naam Maharashtra Mein Bade Adar Aur Samman Se Liya Jata Hai. Vinoba Bhave Ka Mool Naam Vinayak Narhari Bhave Tha. Inka Janm Maharashtra Ke Konked Me Hua Tha. Vinoba Bhave Padhane Likhane Mein Bahut Tej The.

 

 

 

Visheshakr Unka Ganit Me Adhik Number Ata Tha. Padhane Ke Sath Hi We Bahut Hi Hajir Jawab Bhi The. Vinoba Bhave Ka Janm 11 September 1895 Ko Hua Tha.

 

 

 

Vinoba Bhave Me Deshbhakti Koot-Koot Kar Bhari Hui Thi. Vinoba Bhave Dwara Shuru Kiya Gaya Nara “Sab Bhoomi Gopal Ki” Us Samay Poore Bharat Me Prachalit Hua Tha. 

 

 

 

 

दिव्य ज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

Vinoba Bhave Books Pdf Hindi
Vinoba Bhave Books Pdf Hindi

 

 

 

गुरु रूप में श्री कृष्ण का अर्जुन से कहना – श्री भगवान कहते है, हे अर्जुन ! तुम मेरे भक्त तथा मित्र हो अतः तुम इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ सकते हो। आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग यानी परमेश्वर के साथ अपने संबंधो का विज्ञान तुमसे कहा जा रहा है।

 

 

 

उपरोक्त वाक्यों का तात्पर्य – मनुष्यो की दो श्रेणियाँ होती है, एक भक्त दूसरा असुर। भगवान ने अर्जुन को इस विद्या का पात्र इसलिए चुना क्योंकि वह उनका भक्त था। किन्तु असुर के लिए इस गुह्य विद्या को समझ पाना संभव ही नहीं है।

 

 

 

अर्जुन श्री कृष्ण को भगवान के रूप में मानता है, अतः जो गीता भाष्य अर्जुन के पद चिन्हो का अनुसरण करते हुए किया गया है। वह इस परम विद्या के पक्ष में वास्तविक सेवा है। इस परम ज्ञान ग्रंथ के अनेक संस्करण उपलब्ध है, इनमे से कुछ टीका भक्तो द्वारा की गई है, कुछ असुरो द्वारा टीका की गई है।

 

 

 

 

जो टीका भक्तो द्वारा की गई है, वह वास्तविक है क्योंकि इसमें गुरु परंपरा का निर्वहन किया गया है। जो टीका असुरो द्वारा की गई है वह व्यर्थ है क्योंकि इसमें अपने विचारो को मनमाने ढंग से प्राथमिकता दी गई है। इसलिए इस (असुरो) टीका का कई औचित्य ही नहीं है।

 

 

 

किन्तु असुर भगवान श्री कृष्ण को उस रूप में नहीं मानते है। वह कृष्ण के विषय में तरह-तरह की मनगढ़ंत बातें करते है। ऐसे कुमार्गो से बचाव के लिए ही यह एक चेतावनी है। मनुष्य को चाहिए कि अर्जुन की परंपरा का अनुसरण करे और श्रीमद्भागवत के इस परम विज्ञान से लाभ प्राप्त करे।

 

 

 

 

 

4- अर्जुन का दिग्भ्रमित होना – अर्जुन श्री कृष्ण से कहता है कि सूर्यदेव विवस्वान आप से बहुत पहले हो चुके है। वह आप से बड़े (ज्येष्ठ) है तो मैं कैसे समझू कि प्रारम्भ में आपने उन्हें इस विद्या का उपदेश दिया था।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण परम प्रमाण है यह तथ्य आज से नहीं अनंत काल से सारे विश्व में स्वीकार किया जाता रहा है, केवल नराधम असुर ही इस तथ्य को नकारते है। जो भी हो, कृष्ण सर्व स्वीकृत परम प्रमाण है। अतः अर्जुन उन्ही से प्रश्न करता है, जिससे कृष्ण स्वयं ही बताए और असुर तथा उनके अनुयायी जिस भांति तोड़-मरोड़ करते हुए उन्हें (कृष्ण) को प्रस्तुत करते है, उससे बचा जा सके। जब अर्जुन भगवान का माना हुआ भक्त है तो उसे कृष्ण के वचनो पर विश्वास क्यों नहीं हो रहा था ?

 

 

 

 

तथ्य यह है कि अर्जुन यह जिज्ञासा अपने लिए नहीं कर रहा है, अपितु यह जिज्ञासा उन सवो के लिए है जो भगवान में विश्वास नहीं करते है। अथवा उन असुरो के लिए है, जिन्हे यह विचार पसंद नहीं है कि कृष्ण को भगवान माना जाय। उन्ही के लिए अर्जुन यह बात पूछ रहा है, मानो वह स्वयं ही भगवान या कृष्ण से अवगत नहीं है। जैसा कि दसवे अध्याय में पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाएगा।

 

 

 

 

अर्जुन भली-भांति अवगत था कि श्री कृष्ण श्री भगवान है और प्रत्येक वस्तु के मूल स्रोत है तथा ब्रह्म की चरम सीमा है। यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि वह अपने कल्याण के लिए कृष्ण विद्या को समझे, कृष्ण स्वयं अपने विषय में बोल रहे हो तो यह सारे विश्व के लिए शुभ है।

 

 

 

 

कृष्ण द्वारा की गई ऐसी व्याख्याए असुरो को भले ही विचित्र प्रतीत हो क्योंकि कृष्ण को समझने के लिए उनका अलग ही दृष्टिकोण होता है। किन्तु जो भक्त है वह साक्षात् कृष्ण द्वारा उच्चरित वचनो का हृदय से स्वागत करते है।

 

 

 

निःसंदेह कृष्ण इस पृथ्वी पर देवकी के पुत्र के रूप में भी अवतीर्ण हुए। सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना अत्यंत कठिन है कि कृष्ण किस प्रकार उसी शाश्वत आदि पुरुष श्री भगवान रूप में बने हुए थे। अतः इस बात को स्पष्ट करने के लिए ही अर्जुन ने यह प्रश्न पूछा। जिससे वह ही प्रामाणिक तौर पर बताए।

 

 

 

भक्त गण कृष्ण के ऐसे प्रामाणिक वचन का सदा ही पूजा किया करेंगे क्योंकि वे लोग उनके विषय में अधिकाधिक जानने के लिए उत्सुक रहते है। इस तरह जो लोग (नास्तिक गण) कृष्ण को सामान्य व्यक्ति मानते है। वह भी कृष्ण को सच्चिदानंद विग्रह, अतिमानव, दिव्य, त्रिगुणातीत, दिक्काल के प्रभाव से परे समझ सकेंगे।

 

 

 

 

अर्जुन की कोटि के श्री कृष्ण भक्त को कभी भी श्री कृष्ण के दिव्य स्वरूप के विषय में कोई श्रम नहीं हो सकता है। अर्जुन द्वारा भगवान के समक्ष ऐसे प्रश्न उपस्थित करने का उद्देश्य उन व्यक्तियों की नास्तिकतावादी प्रवृत्ति को चुनौती प्रदान करना था जो कृष्ण को भौतिक गुणों के आधीन एक सामान्य व्यक्ति समझते है।

 

 

Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है। अतः आपसे निवेदन है कि अगर किसी भी बुक्स, नावेल के अधिकार क्षेत्र से या अन्य किसी भी प्रकार की दिक्कत है तो आप हमें [email protected] पर सूचित करें। हम निश्चित ही उस बुक को हटा लेंगे। 

 

 

 

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