Advertisements

Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi / वट सावित्री व्रत कथा pdf

Advertisements

मित्रों इस पोस्ट में Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi दिया गया है। आप नीचे की लिंक से Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi Download कर सकते हैं और आप यहां से Shiv Swarodaya in Hindi Pdf कर सकते हैं।

Advertisements

 

 

 

 

 

 

 

Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi Download

 

 

 

Advertisements
Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi
Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi Download यहां से करे।
Advertisements

 

 

 

Advertisements
Geet Govind Pdf in Hindi
Geet Govind Pdf in Hindi यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

 

Note- इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी पीडीएफ बुक, पीडीएफ फ़ाइल से इस वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है और ना ही इसे हमारे सर्वर पर अपलोड किया गया है।

 

 

 

 

यह मात्र पाठको की सहायता के लिये इंटरनेट पर मौजूद ओपन सोर्स से लिया गया है। अगर किसी को इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी Pdf Books से कोई भी परेशानी हो तो हमें [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं, हम तुरंत ही उस पोस्ट को अपनी वेबसाइट से हटा देंगे।

 

 

 

वट सावित्री व्रत कथा Pdf

 

 

 

वट सावित्री और उसकी कथा का सुहागिन स्त्रियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस कथा में सावित्री और उसके पति सत्यवान का वर्णन किया गया है। वट सावित्री के व्रत से सुहागिन स्त्रियों का सुहाग अक्षय रहता है तथा सुहागिन स्त्रियों के पति की आयु दीर्घ होती है।

 

 

मान्यताओं के अनुसार सावित्री ने भी अपने पति के प्राण को इसी दिन यमराज से वापस प्राप्त किया था। यह कथा इस प्रकार है – अश्वपति नाम के एक राजा थे। वह बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे। दैवयोग से बहुत दिनों के बाद उन्हें एक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। उस कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

 

 

वह कन्या द्वितीया के चन्द्रमा की भांति बढ़ने लगी। सावित्री रूपवती होने के साथ ही बहुत गुणवती थी। राजा अश्वपति को उसके विवाह की चिंता होने लगी। सावित्री अपने पिता की आज्ञा से स्वयं ही अपने योग्य वर की तलाश में निकल पड़ी। कई दिन बीतने के पश्चात सावित्री की तलाश सत्यवान के ऊपर जाकर पूर्ण हुई।

 

 

सत्यवान द्युमत्सेन नामक राजा का पुत्र था। विरोधी राजाओ ने उनका राज्य छीन लिया था। अतः राजा और रानी जो कि अंधे हो चुके थे अपने पुत्र सत्यवान के साथ जंगल में निवास करने लगे। सत्यवान जंगल से लकड़ियां तोड़कर बेचता और उससे प्राप्त हुई आय से अपने माता-पिता के साथ ही अपनी उदर पूर्ति करता था।

 

 

सत्यवान को देखने के बाद सावित्री घर लौट आयी तथा अपने पिता से कहा कि वह सत्यवान के साथ ही विवाह करना चाहती है। उसी समय अश्वपति के दरबार में नारद मुनि का आगमन हुआ उन्होंने कहा – राजन! आपकी यह कन्या जिससे विवाह करने जा रही है वह बालक अल्पायु है।

 

 

उसकी आयु कुछ दिन के लिए ही शेष है अतः सावित्री का उसके साथ विवाह करना उचित नहीं है। नारद मुनि की यह बात सुनकर सावित्री जिद पर अड़ गयी कि उसे हर हालात में सत्यवान से ही विवाह करना है। सावित्री की जिद से हारकर राजा अश्वपति ने सत्यवान के साथ उसका विवाह कर दिया।

 

 

सावित्री ने राज वैभव का त्याग कर दिया तथा सत्यवान और उसके अंधे माता-पिता की सेवा करने के लिए वन में रहने लगी। सत्यवान का अंत समय निकट आ गया था। सावित्री उसे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती थी। एक दिन सावित्री ने भी जिद करके सत्यवान के साथ जंगल में चली गयी।

 

 

सत्यवान लकड़ी तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ गया। अचानक उसे भयंकर सरदर्द हुआ वह नीचे उतर आया तथा जमीन पर लेट गया। सावित्री ने उसका सिर गोद में रख लिया। उसी समय यमराज ने आकर सत्यवान का प्राण हर लिया। सावित्री को पहले ही ज्ञात था कि तीसरे दिन सत्यवान की मौत होने वाली है।

 

 

उसने तीन दिन पहले से ही अन्न जल त्याग कर दिया था। सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण लौटाने की प्रार्थना किया और उनके पीछे-पीछे चलने लगी। कुछ दूर चलने के बाद यमराज ने देखा कि सावित्री उनके पीछे आ रही है। तब उन्होंने सावित्री से कहा कि मैं तुम्हारे साहस और पति निष्ठा से प्रसन्न हूँ तुम मुझसे सत्यवान के प्राण को छोड़कर कोई दूसरा वरदान मांग लो और वापस लौट जाओ।

 

 

सावित्री ने कहा – महाराज! हमारे सास-ससुर का अंधापन समाप्त होकर उनका खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हो जाय। यमराज ने तथास्तु कहा और चल दिए। कुछ दूर जाने के पश्चात उन्होंने पुनः पीछे मुड़कर देखा कि सावित्री फिर उनके पीछे आ रही है।

 

 

तब यमराज ने कहा – पुत्री! मृत्यु इस सृष्टि का अटल नियम है तुम मुझसे एक वरदान और ले लो पर यहां से लौट जाओ। सावित्री बोली – कि हमारे पिता पुत्रहीन है उन्हें पुत्र की प्राप्ति हो जाय। यमराज ने तथास्तु कहा फिर आगे बढ़ चले। कुछ दूर फिर आगे आने के बाद यमराज ने पीछे मुड़कर देखा कि सावित्री उनके पीछे चली आ रही है।

 

 

यमराज रुककर बोले – पुत्री! तुम ब्यर्थ ही कष्ट कर रही हो मैं सत्यवान के प्राण को मुक्त करने में समर्थ नहीं हूँ। सावित्री बोली – मै अपने पति के प्राण के बिना वापस नहीं जा सकती हूँ। यम ने कहा – तुम मुझसे एक वरदान और मांग लो पर यहां से वापस लौट जाओ।

 

 

सावित्री ने कहा – यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो मुझे सौ पुत्रो का वरदान दीजिए। यमराज ने तथास्तु कह दिया फिर जाने लगे तब सावित्री बोली – महाराज! आपने मुझे सौ पुत्रो का वरदान दिया है और हमारे पति के प्राण को अपने साथ लिए जा रहे है तब आपका यह वरदान कैसे सफल होगा। यमराज ने हारकर सत्यवान के प्राण को मुक्त कर दिया तथा सावित्री को अखंड सौभाग्य प्रदान कर वहां से चले गए।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

विष्णो! महाप्रभो! आपके बल से ही मैंने इस महान यज्ञ का आरंभ किया है। सत्यकर्म की सिद्धि के लिए आप ही प्रमाण माने गए है। विष्णो! आप कर्मो के साक्षी तथा यज्ञो के प्रतिपालक है। महाप्रभो! आप वेदोक्त धर्म तथा ब्रह्मा जी के रक्षक है। अतः प्रभो! आपको मेरे इस यज्ञ की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि आप सबके प्रभु है।

 

 

 

 

ब्रह्मा जी कहते है – दक्ष की अत्यंत दीनतापूर्ण बात सुनकर भगवान विष्णु उस समय शिवतत्व से विमुख हुए दक्ष को समझाने के लिए इस प्रकार बोले – दक्ष! इसमें संदेह नहीं कि मुझे तुम्हारे यज्ञ की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि धर्म परिपालन विषयक जो मेरी सत्य प्रतिज्ञा है वह सर्वत्र विख्यात है।

 

 

 

 

परन्तु दक्ष! मौन जो कुछ कहता हूँ उसे तुम सुनो। इस समय अपनी क्रूरतापूर्ण बुद्धि को त्याग दो। देवताओ के क्षेत्र नैमिषारण्य में जो अद्भुत घटना घटित हुई थी उसका तुम्हे स्मरण नहीं हो रहा है। क्या तुम अपनी कुबुद्धि के कारण उसे भूल गए? यहां कौन सा भगवान रूद्र के कोप से तुम्हारी रक्षा किसको अभिमत नहीं है?

 

 

 

 

परन्तु जो तुम्हारी रक्षा करने को उद्यत होता है वह अपनी दुर्बुद्धि का ही परिचय देता है। दुर्मते! क्या कर्म है और क्या अकर्म इसे तुम नहीं समझ पा रहे हो। केवल कर्म ही कभी कुछ करने में समर्थ नहीं हो सकता। जिसके सहयोग से कर्म में कुछ करने की सामर्थ्य आती है उसी को तुम स्वकर्म समझो।

 

 

 

 

भगवान शिव के बिना दूसरा कोई कर्म के कल्याण करने की शक्ति देने वाला नहीं है। जो शांत हो ईश्वर में मन लगाकर उनकी भक्ति पूर्वक कार्य करता है उसी को भगवान शिव तत्काल उस कर्म का फल देते है। जो मनुष्य केवल ज्ञान का सहारा ले अनीश्वरवादी हो जाते या ईश्वर को नहीं मानते है वे शतकोटि कल्पो तक नरक में ही पड़े रहते है।

 

 

 

 

फिर वे कर्मपाश में बंधे हुए जीव प्रत्येक जन्म में नरको की यातना भोगते है क्योंकि वे केवल सकाम कर्म के ही स्वरुप का आश्रय लेने वाले होते है। ये शत्रु मर्दन वीरभद्र जो यज्ञशाला के आंगन में आ पहुंचा है। भगवान रूद्र की क्रोधाग्नि से प्रकट हुए है।

 

 

 

 

ये हम लोगो के विनाश के लिए आये है इसमें संशय नहीं है। कोई भी कार्य क्यों न हो वस्तुतः इनके लिए कुछ भी अशक्य है ही नहीं। ये महान सामर्थ्यशाली वीरभद्र सब देवताओ को अवश्य जलाकर ही शांत होंगे इसमें संशय नहीं जान पड़ता।

 

 

 

 

मैं भ्रम से महादेव जी की शपथ का उल्लंघन करके जो यहां रुका रहा उसके कारण तुम्हारे साथ मुझे भी इस कष्ट का सामना करना ही पड़ेगा। भगवान विष्णु इस प्रकार कह ही रहे थे कि वीरभद्र के साथ शिवगणों की सेना का समुद्र उमड़ आया। समस्त देवता आदि ने उन्हें देखा।

 

 

 

मित्रों यह पोस्ट Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi आपको कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में जरूर बतायें और Vat Savitri Vrat Katha Pdf Hindi की तरह की पोस्ट के लिये इस ब्लॉग को सब्सक्राइब जरूर करें और इसे शेयर भी करें।

 

 

Leave a Comment

Advertisements
error: Content is protected !!