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Varahmihir Rachit Jyotish Granth Pdf / वराहमिहिर रचित ज्योतिष ग्रंथ Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Varahmihir Rachit Jyotish Granth Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Varahmihir Rachit Jyotish Granth Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  वराहमिहिर बृहत्संहिता pdf भी डाउनलोड कर सकते हैं।

 

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Varahmihir Rachit Jyotish Granth Pdf / वराहमिहिर रचित ज्योतिष ग्रंथ पीडीएफ

 

 

 

वराहमिहिर रचित ज्योतिष ग्रंथ Pdf Download

 

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Varahmihir Rachit Jyotish Granth Pdf
Varahmihir Rachit Jyotish Granth Pdf
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ज्योतिष तंत्र बुक्स हिंदी Pdf Download

 

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

4- जनक जी का ज्ञान रूपी चिरंजीवी (मार्कण्डेय) मुनि व्याकुल होकर डूबते हुए मानो उस श्री राम प्रेम रूपी बालक का सहारा मिलने पर बच गया।

 

 

 

 

वस्तुतः ज्ञान शिरोमणि विदेह राज की बुद्धि मोह में मग्न नहीं है। यह तो सीता राम जी के प्रेम की महिमा है। जिसने उनके जैसे महान ज्ञानी को भी विकल कर दिया है।

 

 

 

 

286- दोहा का अर्थ-

 

 

 

माता-पिता के प्रेम में सीता जी इस तरह विकल हो गयी कि वह अपने को संभाल न सकी। परन्तु परम धैर्यवती पृथ्वी की कन्या सीता जी ने समय और सुंदर धर्म का विचारकर धैर्य धारण किया।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

1- सीता जी को तपस्विनी के वेश में देखकर जनक जी को विशेष प्रेम और संतोष हुआ। उन्होंने कहा – बेटी! तूने दोनों कुल को पवित्र कर दिया। सब लोग कह रहे है कि तेरे निर्मल यश से सारा जगत उज्वल हो रहा है।

 

 

 

 

2- तेरी यह कीर्ति रूपी नदी तो देवनदी गंगा जी को जीत कर अनेको ब्रह्माण्ड में बह चली है क्योंकि गंगा जी तो इस पृथ्वी पर तीन ही स्थानों पर हरिद्वार, प्रयाग, गंगासागर को बहुत बड़ा तीर्थ बनाया है। पर तेरी इस कीर्ति रूपी नदी ने तो अनेक संत समाज रूपी तीर्थ बना दिए है।

 

 

 

 

3- पिता जनक जी ने तो स्नेह से सच्ची और सुंदर वाणी कही, परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीता जी मानो संकोच में समा गयी। पिता-माता ने उन्हें फिर हृदय से लगा लिया और हितभरी सुंदर सीख और आशीष दिया।

 

 

 

 

4- सीता जी कुछ कहती नहीं है, लेकिन अपने मन में सकुचा रही है कि रात में सासुओ की सेवा छोड़कर यहां रहना अच्छा नहीं है।

 

 

 

 

रानी सुनयना जी ने जानकी जी का रुख देखकर उनके मन की बात समझते हुए राजा जनक जी को बता दिया। तब दोनों अपने हृदय में सीता जी के शील और स्वभाव की सराहना करने लगे।

 

 

 

 

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