Vaibhav Lakshmi Mantra in Hindi Pdf / वैभव लक्ष्मी मंत्र

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वैभव लक्ष्मी मंत्र Vaibhav Lakshmi Mantra in Hindi Pdf

 

 

 

 

 

 

Vaibhav Lakshmi Mantra in Hindi 

 

 

या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।

या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥

या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।

सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥

 

 

2-यत्राभ्याग वदानमान चरणं प्रक्षालनं भोजनं

सत्सेवां पितृ देवा अर्चनम् विधि सत्यं गवां पालनम  

धान्यांनामपि सग्रहो न कलहश्चिता तृरूपा प्रिया:
दृष्टां प्रहा हरि वसामि कमला तस्मिन ग्रहे निष्फला:    

 

 

 

लक्ष्मी पूजा विधि

 

 

Vaibhav Lakshmi Mantra in Hindi

 

 

 

दिवाली के दिन या फिर शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माता लक्ष्मी के साथ भगवान गजानन और माता सरस्वती की पूजा बहुत ही लाभप्रद होती है। माता लक्ष्मी के पूजन से घर परिवार धन-धान्य से पूर्ण रहता है।

 

 

 

पूजन हेतु सामाग्री

 

 

 

दिवाली पर माता लक्ष्मी की पूजा की सामाग्री नहुत ही सरल है। ये वस्तुए इस प्रकार है –

लक्ष्मी, भगवान गणेश, माता सरस्वती के चित्र (Photo), रोली, कुमकुम, चावल, जल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, अगरबत्ती, कपूर, मिट्टी और तांबे के दीपक, रुई, रक्षासूत्र (कलावा), नारियल, शहद, गंगाजल, दही, गुड़, फल, फूल, धनिया, जौ, गेहूं, दूर्वा (दूब), चंदन, सिंदूर, घी, पंचामृत, दूध, मेवा, बताशा, जनेऊ, श्वेत वस्त्र, कलश, चौकी, इत्र, शंख, आसन, कमलगट्टे की माला, थाली, चांदी का सिक्का, बिना वर्क का मिष्ठान प्रसाद के लिए।

 

 

 

पूजा विधि

 

 

सर्वप्रथम चौकी पर श्वेत वस्त्र बिछा ले, फिर उसपर मां लक्ष्म, गणेश और माता सरस्वती को विराजमान करे। उसके बाद थोड़ा सा जल लेकर सर्वप्रथम प्रतिमा को फिर खुद को निम्नलिखित मंत्र को पढ़ते हुए छिड़के (शुद्ध करे)

 

 

उसके बाद मां धरा (पृथ्वी) को प्रणाम करे और निम्लिखित मंत्र पढ़े।

 

इसके बाद “ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः” कहते हुए आचमन करे।

 

 

इसके बाद मन को शांत करे और मन ही मन मां को प्रणाम करे। उसके बाद जल, अक्षत, पुष्प और एक रु. का सिक्का लेकर पूजा का संकल्प ले। इसके बाद भगवान गणेश और गौरी का पूजन करे। उसके बाद कलश पूजन और नवग्रहों की पूजा करे।

 

 

 

हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर नवग्रह स्त्रोत्र बोले। इसके बाद भगवती जोइश मातृकाओं का पूजन करे। इसके उपरांत 16 मातृकाओं को गंध, अक्षत, पुष्प प्रदान करते हुए पूजन करे। उसके बाद रक्षासूत्र लेकर गणेश भगवान माता लक्ष्मी और सरस्वती को अर्पण करते हुए स्वयं को भी बंधवाए।

 

 

 

उसके बाद सभी देवी देवताओ को तिलक लगाकर स्वयं को तिलक लगाए। इसके बाद माता लक्ष्मी की पूजा करे। सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा करे। उसके बाद 7, 11 या फिर 21 दीपक जलाए और माता लक्ष्मी को श्रृंगार अर्पण करे।

 

 

 

उसके बाद मां को भोग लगाए और उनकी आरती करे। उसके बाद श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त या फिर कनक धारा स्त्रोत्र का पाठ करे। उसके बाद माता लक्ष्मी से क्षमा मांगे।

 

 

 

लक्ष्मी नारायण की कहानी 

 

 

 

एक बार भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से बोले, “सत्संग में अपार शक्ति होती है। सत्संग जहां होता है वहां कभी अभाव नहीं रहता। ” लक्ष्मी जी ने कहा, “प्रभू अगर मैं चाहूं तो कोई भी व्यक्ति सत्संग नहीं कर सकेगा। अगर आप चाहे तो प्रयास करके देख सकते है।”

 

 

 

 

विष्णु जी ने कहा, “ठीक है।”

 

 

 

 

अब विष्णु जी एक कथा वाचक का स्वरूप बनाकर एक नगर में सेठ के पास गए और बोले, “मैं काशी से आया हूँ और इस नगर में सत्संग करना चाहता हूँ।”

 

 

 

 

सेठ ने कथा वाचक का खूब सत्कार किया और बोला, “महात्मन, आप दूसरी जगह पर क्यूं जाएंगे मैं आपके लिए अपने घर में रहने का प्रबंध कर देता हूँ। आपको सत्संग समागम करने के लिए पास में ही जगह उपलब्ध करा देता हूँ। आपको कोई परेशानी नहीं होगी।”

 

 

 

 

धीरे-धीरे समय बीत रहा था। जहां स्वयं नारायण कथा वाचन करते हो, वहां भक्तो की भीड़ न जुटे यह असंभव था। सत्संग समागम में भक्तो की अपार भीड़ जुटने लगी।

 

 

 

 

अचानक एक दिन एक औरत के घर के सामने एक वृद्धा औरत आकर पानी मांगने लगी। तब वह औरत बोली, “माता मुझे सत्संग में जाना है।” तब वह वृद्धा औरत बोली, “बेटी मुझे बहुत जोर की प्यास लगी है। पानी पिलाकर फिर सत्संग में चली जाना।”

 

 

 

 

औरत एक लोटा पानी लेकर आई और वृद्धा को पीने के लिए दिया। वृद्धा ने पानी पीने के उपरांत वह लोटा उस औरत की तरफ बढ़ा दिया जिसने वृद्धा को पानी पीने के लिए दिया था।

 

 

 

 

लेकिन लोटा उस औरत के हाथ में आते ही (जिसने पानी पीने के लिए दिया था) स्वर्ण के लोटे में बदल गया। अब तो उस औरत के मन में लालच आ गया था।

 

 

 

 

 

कहां वह एक लोटा पानी देने में आना कानी कर रही थी। अब वृद्धा से भोजन करने के लिए कह रही थी। वृद्धा बोली, “बेटी तुम सत्संग में जाओ नहीं तो देर हो जाएगी।”

 

 

 

 

सत्संग में आकर उस औरत ने सभी लोगो से कहा, “एक वृद्धा माता आई है। जिसके घर में जिस पात्र में भोजन करती है वह स्वर्ण का हो जाता है।”

 

 

 

 

 

यह बात पूरे गांव में फ़ैल गई थी। दूसरे दिन सत्संग में आदमी औरत कम संख्या में आए थे। तब कथा वाचक ने कारण पूछा तो सेठ बोला, “एक वृद्ध माता आई है वह जिसके यहां जिस पात्र में भोजन करती है वह स्वर्ण का हो जाता है। इसलिए उस वृद्ध माता को सभी अपने घर एक बार बुलाना चाहते है। सो यहां सत्संग में लोगो की उपस्थिति कम है।”

 

 

 

 

 

कथा वाचक भगवान विष्णु समझ गए कि लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है। एक दिन सेठ ने कथा वाचक से कहा, “अब आपके लिए धर्मशाला में कमरा बुक करा दिया गया है। आप वही रहकर सत्संग करिएगा क्योंकि यहां वृद्ध माता को बुलाना है।”

 

 

 

 

सेठ ने वृद्ध माता को अपने घर बुलाया। तब कथा वाचक ने सेठ से कहा, “मैं उस वृद्धा से बात करना चाहता हूँ, आप थोड़ा दूर ही रहो।” तब कथा वाचक के स्वरूप में भगवान विष्णु ने वृद्धा के स्वरूप में लक्ष्मी से कहा, “मैं आपसे एक वचन चाहता हूँ।”

 

 

 

 

लक्ष्मी ने कहा, “आज्ञा दीजिए प्रभू।”

 

 

 

 

विष्णु ने कहा, “जहां भी सत्संग होगा वहां आपको विराजमान रहना होगा।”

 

 

 

 

इतना कहकर कथा वाचक विष्णु जी बैकुंठ चले गए। तब सभी लोग वृद्धा से अपने घर भोजन करने के लिए कहने लगे। लेकिन वृद्धा ने कहा, “यह तो मूर्खो का नगर है। जहां के लोग एक कथा वाचक का सम्मान नहीं कर सकते वहां मैं भोजन कैसे ग्रहण करुँगी ?”

 

 

 

 

इतना कहकर वृद्ध माता बैकुंठ श्री विष्णु के पास लौट गई थी।

 

 

 

 

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