Upanishad In Hindi Pdf Free Download / 108 उपनिषद इन हिंदी पीडीऍफ़ फ्री

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Upanishad In Hindi Pdf Free  उपनिषद इन हिंदी पीडीऍफ़ फ्री 

 

 

 

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दिव्यज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

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यहां भगवान अपनी विलक्षण स्थिति बताते है – यहां भगवान कह रहे है, कि मैं यद्यपि अजन्मा और अविनाशी हूँ और समस्त जीवो का स्वामी हूँ तो भी प्रत्येक युग में मैं अपने आदि दिव्य रूप में प्रकट होता हूँ।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां भगवान ने अपने जन्म की विलक्षणता बताई है। यद्यपि वह एक सामान्य पुरुष की भांति प्रकट हो सकते है किन्तु उन्हें विगत, अनेकानेक ‘जन्मो’ की पूर्ण स्मृति बनी रहती है, जबकि सामान्य पुरुष को कुछ घंटो पूर्व की घटना का स्मरण नहीं रहता है।

 

 

 

यदि कोई पूछे कि एक दिन पूर्व तुम इस समय कौन सा कार्य कर रहे थे तो एक सामान्य व्यक्ति के लिए इसका तत्काल उत्तर दे पाना संभव नहीं होगा।

 

 

 

 

उस व्यक्ति को स्मरण करने के लिए अपनी बुद्धि को कुदेरना पड़ेगा कि वह कल इसी समय क्या कर रहा था। फिर भी लोग प्रायः अपने को ईश्वर या कृष्ण घोषित करते है।

 

 

 

 

अब भगवान दुबारा अपनी प्रकृति या स्वरूप की व्याख्या करते है। प्रकृति अर्थ स्वभाव और स्वरूप दोनों है। भगवान कहते है कि वह अपने शरीर में ही प्रकट होते है।

 

 

 

 

वह सामान्य जीव की भांति शरीर परिवर्तन नहीं करते, अतः मनुष्य को किसी भी निरर्थक घोषणा या वार्ता से भ्रमित नहीं होना चाहिए जो आडंबरधारी लोग खुद को भगवान घोषित करने के लिए करते है।

 

 

 

 

इस जन्म में बद्ध जीव का एक प्रकार का शरीर हो सकता है किन्तु अगले जन्म में दूसरा शरीर रहता है। भौतिक जगत में जीव का कोई स्थाई शरीर नहीं होता है। अपितु वह एक शरीर से दूसरे में देहांतरण करता रहता है। किन्तु भगवान ऐसा नहीं करते है।

 

 

 

 

यद्यपि उनका शरीर भौतिक शरीर की भांति क्षीण नहीं होता है, फिर भी ऐसा ही प्रतीत होता है। भगवान कृष्ण बालपन से कुमार अवस्था तथा कुमार से तरुण हो रहे है किन्तु आश्चर्य तो यह है कि वह कभी तरुण अवस्था से आगे नहीं बढ़ते।

 

 

 

जब भी भगवान प्रकट होते है। दूसरे शब्दों में कृष्ण अपने दो भुजाओ में बांसुरी धारण किए हुए इस जगत में अपने आदि शाश्वत स्वरुप में अवतरित होते है।

 

 

 

 

वह उनका प्राकट्य अपनी अंतरंगा शक्ति से उसी आद्य शरीर में होता है। वह इस भौतिक जगत से निष्कलुषित रहकर अपने शाश्वत शरीर सहित प्रकट होते है।

 

 

 

 

कुरुक्षेत्र में युद्ध के समय उनके अनेक पौत्र थे या दूसरे शब्दों में भौतिक गणना के अनुसार भगवान कृष्ण कभी वृद्ध हो चुके थे। फिर भी वह बीस-पच्चीस वर्ष के युवक जैसे ही लगते थे।

 

 

 

 

यद्यपि वह अपने उसी दिव्य शरीर में प्रकट होते है और ब्रह्माण्ड के स्वामी होते है तो भी ऐसा प्रतीत होता है कि वह सामान्य जीव की भांति ही प्रकट होते है।

 

 

 

 

हमे कृष्ण की वृद्धवस्था का कोई भी प्रतिकृति के दर्शन नहीं होते अथवा किसी को भी उनकी वृद्ध अवस्था का चित्र प्राप्त नहीं है क्योंकि वह सामान्य मनुष्य या हमारे समान कभी वृद्ध होते ही नहीं है।

 

 

 

 

यद्यपि वह कालातीत है। वह काल (समय) में बंधे नहीं है। चाहे कोई काल भूत, वर्तमान तथा भविष्य काल में भी सबसे वयोवृद्ध पुरुष है। न तो उनका शरीर, न ही बुद्धि कभी क्षीण होती है, न ही बदलती है।

 

 

 

 

जब सूर्य हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता है तो हम समझते है कि सूर्य अस्त हो गया है। जब वह हमारे समक्ष उदीयमान रहता है तो हम समझते है कि सूर्य क्षितिज में है।

 

 

 

 

वस्तुतः सूर्य स्थिर है। अतः यह स्पष्ट है कि इस जगत में रहते हुए भी वह उसी अजन्मा सच्चिदानंद रूप वाले है। जिनके दिव्य शरीर तथा बुद्धि में कोई परिवर्तन नहीं होता।

 

 

 

 

वस्तुतः उनका आविर्भाव और तिरोभाव सूर्य उदय तथा अस्त के समान है जो हमारे सम्मुख घूमता हुआ हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता है।

 

 

 

 

किन्तु हम अपनी अपूर्ण और त्रुटि पूर्ण इन्द्रियों के कारण ही सूर्य को उदय होते और अस्त होते हुए परिकल्पित करते है। चूंकि भगवान का प्राकट्य और तिरोधान सामान्य जीव से सर्वथा भिन्न है और इस भौतिक प्रकृति के द्वारा कभी कलुषित नहीं होते है।

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत में वह अपनी माता के समक्ष नारायण रूप में चार भुजाओ तथा षडऐश्वर्यो से युक्त होकर प्रकट होते है। उनका आद्य शाश्वत स्वरूप में प्राकट्य उनकी अहैतुकी कृपा है।

 

 

 

 

जो सभी जीवो को प्रदान की जाती है। जिससे वह सभी भगवान के यथारूप में ध्यान को केंद्रित कर सके न कि निर्विशेष वादियों द्वारा मनो धर्म या कल्पनाओ पर आधारित रूप में।

 

 

 

 

वेदो द्वारा भी पुष्टि की जाती है कि भगवान अजन्मा होकर भी अनेक रूपों में अवतरित होते रहते है। वैदिक साहित्यो से भी पुष्टि होती है यद्यपि भगवान जन्म लेते हुए प्रतीत होते है किन्तु तो भी अपना शरीर परिवर्तित नहीं करते है।

 

 

 

 

विश्वकोष के अनुसार माया या आत्ममाया शब्द भगवान की अहैतुकी कृपा का ही संकेत करता है। भगवान अपनी समस्त पूर्व आविभावी, तिरोभावो से भिज्ञ रहते है किन्तु सामान्य जीव को जैसे ही नवीन शरीर प्राप्त होता है वह अपने पूर्व शरीर की सारी स्मृतियों को विसारने के लिए विवश रहता है।

 

 

 

 

वह (भगवान) समस्त जीवो के स्वामी है, क्योंकि इस धरा पर रहते हुए वह आश्चर्य जनक तथा अति मानवी लीलाए करते है जो तथा कथित भगवान या तथा कथित कृष्ण रूप के लिए सदा सर्वदा ही असम्भव है। अतः भगवान वही निरंतर परम सत्य रूप है और उनके स्वरूप तथा आत्मा में या उनके गुण और शरीर में कोई भी अंतर नहीं होता।

 

 

 

 

अब यह प्रश्न किया जा सकता है कि इस संसार में भगवान क्यों आर्विभूत और तिरोभूत अवस्था में आते रहते है। इसकी व्याख्या अग्रलेख में उल्लिखित है।

 

 

 

 

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