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Upanishad Hindi Pdf / Chandogya Pdf / Durga Saptashati Pdf Free

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मित्रों इस पोस्ट में Upanishad Hindi Pdf दिया गया है। आप नीचे की लिंक से Upanishad Hindi Pdf फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

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श्वेताश्वतरोपनिषद Pdf
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माण्डूक्य उपनिषद Pdf 
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Upanishad Hindi Pdf
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कल्याण उपनिषद Pdf
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ऐतरेयोपनिषद पीडीएफ फ्री upanishads pdf
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छान्दोग्य उपनिषद Pdf Free Download
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Chandogya Pdf Free Download

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

श्री कृष्ण कहते है कि जो व्यक्ति इन्द्रियों को पूर्णतया वश में रखते हुए इन्द्रिय संयमन करता है और चेतना को मुझमे स्थिर कर देता है वह मनुष्य स्थिर बुद्धि कहलाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – योग सूत्र भी विष्णु का ध्यान अति आवश्यक बताता है। शून्य का नहीं। तथाकथित योगी जो विष्णु पद को छोड़कर अन्य किसी वस्तु का ध्यान धरते है वह केवल मृगमरीचिकाओं की खोज में वृथा ही अपना समय गवाते है।

 

 

 

 

हमे कृष्ण भावनाभावित होना चाहिए, भगवान के प्रति अनुरक्त होना चाहिए असली योग का यही उद्देश्य होता है। यहां बताया गया है कि योग सिद्धि की चरम अनुभूति कृष्ण भावनामृत ही है।

 

 

 

 

जैसा कि पहले कहा जा चुका है दुर्वासा मुनि का झगड़ा महाराज अम्बरीष से हुआ था क्योंकि वह गर्ववश महाराज अम्बरीष पर क्रुद्ध हो गए थे जिससे वह अपनी इन्द्रियों को नहीं रोक पाए।

 

 

 

 

जब तक कोई कृष्ण भावनाभावित नहीं होता है तब तक इन्द्रियों को वश में करना कदापि संभव नहीं होता है। दूसरी तरफ महाराज अम्बरीष दुर्वासा मुनि के समान योगी नहीं थे किन्तु वह कृष्ण के भक्त अवश्य ही थे और उन्होंने मुनि के सारे अन्याय सहन कर लिए थे इसलिए महाराज अम्बरीष विजयी हुए थे।

 

 

 

 

इस प्रसंग में मत्पर शब्द अत्यंत सार्थक है कोई मत्पर किस तरह हो सकता है इसका वर्णन महाराज अम्बरीष के जीवन में बताया गया है।

 

 

 

मत्पर परंपरा के महान विद्वान तथा आचार्य श्रील बलदेव विद्याभूषण का कहना है – मद्भक्ति प्रभावेन सर्वेन्द्रिय विजय पूर्विका स्वात्म दृष्टिः सुलभेति भावः – इन्द्रियों को केवल कृष्ण की भक्ति के बल से वश में किया जा सकता है। यहां अग्नि का उदाहरण उल्लेखनीय है।

 

 

 

 

जिस प्रकार से जलती हुई अग्नि कमरे के भीतर की सारी वस्तुए जला देती है उसी प्रकार योगी के हृदय में स्थित भगवान विष्णु सारे मैल को जलाकर योगी का हृदय स्वच्छ बना देते है।

 

 

 

 

राजा अम्बरीष अपनी इन्द्रियों को वश में कर सके क्योकि उनमे निम्नलिखित गुण थे जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में (9, 4, 18, 20) हुआ है।

 

 

 

राजा अम्बरीष ने अपना मन कृष्ण चरणारविंदो पर स्थिर कर दिया था। अपनी वाणी को भगवत चर्चा में लगा दिया था। अपने हाथो को भगवान का मंदिर साफ करने में लगा दिया था।

 

 

 

अपने कानो को भगवान की लीला सुनने में लगा दिया था। अपनी आँखों को भगवान का स्वरुप देखने में लगा दिया था। अपनी नाक को भगवान के चरणारविन्दो पर भेट किए गए फूलो की गंध सूंघने में लगाया, अपने शरीर को भक्त का शरीर स्पर्श करने में लगाया था।

 

 

 

अपने पावों को जहां-जहां भगवान के मंदिर है  स्थानों की यात्रा करने में लगाया था। अपनी जीभ को उन्हें (भगवान को) अर्पित तुलसी दलों का आस्वाद करने में लगाया था।

 

 

 

अपने सिर को भगवान को नमस्कार करने में लगाया था तथा अपनी इच्छाओ को भगवान की इच्छाओ को पूरा करने में लगा दिया था और इन गुणों के कारण वह भगवान के मत्पर भक्त बनने के योग्य हो गए थे।

 

 

 

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