Tejaswi Man Pdf Hindi Download / तेजस्वी मन pdf Download

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Tejaswi Man Pdf / तेजस्वी मन pdf 

 

 

 

तेजस्वी मन pdf Download

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित शरीर (सतोगुण) – श्री कृष्ण प्रकृति के तीनो गुणों की व्याख्या करते हुए अर्जुन से कहते है – सतोगुण की अभिव्यक्ति तो तभी अनुभव किया जा सकता है जब शरीर के सारे द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो जाते है।

 

 

 

 

उपरोक्त वाक्यों का तात्पर्य – सतोगुण में सारी वस्तुए अपने सही स्थिति में अवलोकित होती है यथा – सही-सही सुनाई देना और सही ढंग से वस्तुओ का स्वाद प्राप्त होना।

 

 

 

 

जब प्रत्येक द्वार सत्व के लक्षण से दीपित हो जाए तो समझना चाहिए कि उसमे सतोगुण विकसित हो चुका है। प्रत्येक द्वार में सुख के लक्षण उत्पन्न दिखते है यही सतोगुणी स्थिति होती है।

 

 

 

 

12- अनियंत्रित इच्छा, गहन उद्यम (रजोगुण) – यहां रजोगुण की व्याख्या करते हुए श्री कृष्ण कहते है – हे भरत वंशियो में प्रमुख ! जब रजोगुण में वृद्धि हो जाती है तो अत्यधिक आसक्ति सकाम कर्म, गहन उद्यम तथा अनियंत्रित इच्छा एवं लालसा के लक्षण प्रकट होते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – रजोगुण में स्थित व्यक्ति या जिस व्यक्ति में रजोगुण की प्रधानता होती है। यदि उसे मकान बनवाना है तो वह महल बनवाने का अत्यधिक प्रयास करता है। मानो उस महल में सदा रहेगा। रजोगुणी व्यक्ति कभी भी पहले से प्राप्त पद  संतुष्ट नहीं रहता है।

 

 

 

 

उसे अपना पद बढ़वाने की अत्यधिक लालसा रहती है। ऐसा व्यक्ति अपनी इन्द्रियों की तृप्ति के लिए अत्यधिक प्रयास करता रहता है।

 

 

 

 

उसकी इन्द्रिय तृप्ति की सीमा असीमित रहती है। वह अपने परिवार के मध्य रहकर तथा अपने घर में रहकर इन्द्रिय तृप्ति करते रहना चाहता है। इसका कोई अंत नहीं है। इन सारे गुणों को रजोगुण की विशेषता मानना चाहिए।

 

 

 

 

 

13- अंधेरा, जड़ता तथा मोह (तमोगुण) – श्री कृष्ण प्रकृति के तीन गुणों में से यहां तमोगुण का उल्लेख करते हुए कहते है – जब तमोगुण में वृद्धि हो जाती है तो हे कुरुपुत्र ! अंधेरा, जड़ता, प्रमत्तता तथा मोह का प्राकट्य होता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – ज्ञान की अनुपस्थिति के कारण ही प्रकाश का अभाव ही तम का कारण बनता है। चाहे वह तन भौतिक हो या देहात्मक, तम का प्रभाव ज्ञान की अनुपस्थिति के कारण ही बढ़ता है।

 

 

 

 

तमोगुणी व्यक्ति हर प्रकार के नियम के विपरीत ही कार्य करता है या कि तमोगुणी व्यक्ति किसी नियम में बंधकर कार्य नहीं करता है।

 

 

 

 

वह अकारण ही अपनी सनक के अनुसार ही कार्य करना चाहता है। यद्यपि उसमे कार्य करने की क्षमता होती है किन्तु वह परिश्रम नहीं करता है। यह मोह कहलाता है। यद्यपि चेतना रहती है लेकिन जीवन निष्क्रिय रहता है। यह सब तमोगुण के लक्षण है।

 

 

 

 

सतोगुण में मृत्यु – उच्चतर लोक – श्री कृष्ण यहां अर्जुन को समझाते हुए कह रहे है – जब कोई सतोगुण में मरता है तो उसे महर्षियो के विशुद्ध उच्चतर लोको की प्राप्ति होती है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां ‘अमलान’ शब्द महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है – “रजोगगुण तथा तमोगुण से मुक्त” इस भौतिक जगत में बहुत ही अशुद्धियां व्याप्त है लेकिन सतोगुण प्रकृति का सर्वाधिक शुद्ध रूप है।

 

 

 

 

सतोगुण में मृत्यु होने पर मनुष्य ब्रह्मलोक या जन लोक जैसे उच्च लोको प्राप्त करता है और वहां पर दैवी सुख भोगता है। विभिन्न जीवो के लिए विभिन्न प्रकार के लोक है जिसकी सतोगुण में स्थित होने पर मृत्यु होती है तो उसे ऐसे लोक की प्राप्ति होती है जहां महान भक्तगण तथा महर्षि रहते है।

 

 

 

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