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Tantra Mantra vidya Sikhana pdf / तंत्र मंत्र विद्या सीखना Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Tantra Mantra vidya Sikhana pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Tantra Mantra vidya Sikhana pdf Download कर सकते हैं और यहां से Vardha hindi shabdkosh pdf कर सकते हैं।

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Tantra Mantra vidya Sikhana pdf

 

 

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Note- इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी पीडीएफ बुक, पीडीएफ फ़ाइल से इस वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है और ना ही इसे हमारे सर्वर पर अपलोड किया गया है।

 

 

 

यह मात्र पाठको की सहायता के लिये इंटरनेट पर मौजूद ओपन सोर्स से लिया गया है। अगर किसी को इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी Pdf Books से कोई भी परेशानी हो तो हमें [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं, हम तुरंत ही उस पोस्ट को अपनी वेबसाइट से हटा देंगे।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

फिर ब्राह्मणो के आदेश से शिव दम्पति एक आसन पर विराजमान हो भक्तो के चित्त को आनंद देने वाली उत्तम शोभा पाने लगे। मुने! तदनन्तर अद्भुत लीला करने वाले उन नवदंपति ने मेरी आज्ञा पाकर अपने स्थान पर आ संस्रवप्राशन किया।

 

 

 

इस प्रकार विधि पूर्वक उस वैवाहिक यज्ञ के पूर्ण पर भगवान शिव ने मुझ लोकस्रष्टा ब्रह्मा को पूर्णपात्र दान दिया। फिर शंभु ने आचार्य को गोदान किया। मंगलदायक जो बड़े-बड़े दान बताये गए है वे भी सहर्ष सम्पन्न किये। तत्पश्चात उन्होंने बहुत से ब्राह्मणो को अलग-अलग सौ-सौ सुवर्ण मुद्राये दी।

 

 

 

करोडो रत्नदान किये और अनेक प्रकार के द्रव्य बांटे। उस समय सब देवता तथा दूसरे-दूसरे चराचर जीव मन में बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोर से जय-जयकार की ध्वनि होने लगी। सब ओर मांगलिक शब्द और गीत होने लगे। बाद्यों की मनोहर ध्वनि सबके आनंद को बढ़ाने लगी।

 

 

 

इसके बाद श्री विष्णु, मैं, देवता, ऋषि तथा अन्य सब लोग गिरिराज से आज्ञा ले बड़ी प्रसन्नता के साथ शीघ्र ही अपने-अपने डेरे में चले आये। उस समय हिमालय नगर की स्त्रियां आनंद मग्न हो शिव और पार्वती को लेकर कोहबर में गयी। वहां उन सबने आदर पूर्वक वर-वधू से लोकाचार सम्पादन कराया।

 

 

 

उस समय सब ओर परमानन्ददायक महान उत्सव छा रहा था। तदनन्तर वे स्त्रियां उन लोक कल्याणकारी दम्पति को साथ ले परम दिव्य चासभवन में गयी और वहां भी प्रसन्नता पूर्वक लोकाचार का सम्पादन किया। इसके बाद गिरिराज के नगर की स्त्रियां नजदीक आकर मंगलकृत्य करके उन नवदम्पति को केलिगृह में पहुंचाया और जयध्वनि करती हुई उनके गठबंधन की गाँठ खोलने आदि का कार्य सम्पन्न किया।

 

 

 

उस समय उन नूतन दम्पति को देखने के लिए सोलह दिव्य नारियां बड़े आदर के साथ शीघ्रता पूर्वक वहां आयी। उनके नाम इस प्रकार है – सरस्वती, लक्ष्मी, सावित्री, गंगा, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, पृथिवी, शतरूपा, संज्ञा तथा रति। ये देवांगनाएँ तथा मनोहारिणी देवकन्या, नागकन्या और मुनि कन्याये भी वहां आ पहुंची।

 

 

 

वहां जितनी स्त्रियां उपस्थित थी उन सबकी गणना करने में कौन समर्थ है? उनके दिए हुए रत्नमय सिंहासन पर भगवान शिव प्रसन्नता पूर्वक बैठे। उस समय उन्होंने शिव से नाना प्रकार की विनोद पूर्ण बाते कही। तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए महेश्वर ने अपनी पत्नी के साथ मिष्ठान्न भोजन और आचमन करके कपूर डाला हुआ पान खाया।

 

 

 

इसी अवसर पर अनुकूल समय जान प्रसन्न हुई रति ने दीनवत्सल भगवान शंकर से कहा – भगवन! पार्वती का पाणिग्रहण करके आपने अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त किया है। बताइये, मेरे प्राणनाथ को जो सर्वथा स्वार्थरहित थे आपने क्यों भस्म कर डाला?

 

 

 

अब यहां मेरे पति को जीवित कीजिए और अपने अन्तःकरण में काम संबंधी व्यापार को जगाइए। आपको और मुझको जो समान रूप से वियोग जनित संताप प्राप्त हुआ है उसे दूर कीजिए। महेश्वर! आपके इस विवाहोत्सव में सब लोग सुखी हुए है।

 

 

 

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