Swami Vivekananda Books / Dr Shyama Prasad Books / Godan Pdf

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Swami Vivekananda Books 

 

 

 

 

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2-  स्वामी विवेकानंद बुक्स Vivekananda Books PDF

 

4- मेरा जीवन तथा ध्येय Mera Jivan Tatha Dhyey Free Download

 

5- भारत में विवेकानंद Bharat Me Vivekananda Free

 

6- हिंदी देश बोध Hindi Dash Bodh Download 

 

7- जाती संक्रांति Swami Vivekananda in Hindi PDF Download

 

8- भारतीय नारी Vivekananda Motivational Books PDF

 

9- धर्मतत्व  DharmaTatwa Pdf Free

 

10- ईशदूत ईशा  Ishadut Isha PDF

 

11- शिक्षा ( विवेकानंद बुक्स ) Swami Vivekananda in Hindi PDF

 

13- राजयोग Rajyog PDF Free

 

14- मरणोत्तर जीवन Maranottar Jivan

 

15- कर्म योग Karmyog Download Karen

 

16-ज्ञान योग Gyan Yog Download

 

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18- मेरी समरनीति Meri SamarNiti Best Pdf

 

19 – वर्तमान भारत  Vartman Bharat  PDF

 

20- भक्ति योग Bhakti Yoga PDF 

 

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Dr. Shyama Prasad Mukherjee Books Free Download

 

 

Shyama Prasad Mukherjee Books

 

 

 

Godan Pdf Free Download

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

इच्छाओ का निरंतर प्रवाह – श्री कृष्ण कहते है – जो पुरुष समुद्र में निरंतर प्रवेश करती रहने वाली नदियों के समान इच्छाओ के निरंतर प्रवाह से विचलित नहीं होता है और जो सदैव ही स्थिर रहता है वही व्यक्ति शांति प्राप्त कर सकता है वह नहीं जो ऐसी इच्छाओ को तुष्ट करने की चेष्टा करता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यद्यपि विशाल सागर में सदैव जल रहता है किन्तु वर्षा ऋतु में यह विशेषतया अधिकाधिक जल से भर जाता है तो भी सागर उतने पर ही स्थिर रहता है। वह न तो विक्षुब्ध होता है और न तट की सीमा का उल्लघन करता है। यही स्थिति कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति की होती है।

 

 

 

कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति यही प्रमाण है कि इच्छाओ के होते हुए भी वह इन्द्रिय तृप्ति के लिए उन्मुख नहीं होता है चूँकि वह भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में ही तुष्ट रहता है। अतः वह समुद्र की भांति स्थिर रहकर ही ही पूर्ण शांति का आनंद उठा सकता है। किन्तु दूसरे लोग जो मुक्ति की सीमा तक इच्छाओ की पूर्ति करना चाहते है फिर तो भौतिक सफलताओ का क्या कहना – उन्हें कभी शांति मिल ही नहीं पाती है

 

 

 

 

 

जब तक मनुष्य शरीर है तब तक इन्द्रिय तृप्ति के लिए शरीर की मागे बनी ही रहेगी किन्तु भक्त अपनी पूर्णता के कारण ही ऐसी इच्छाओ से विचलित नहीं होता है। कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि भगवान उसकी सारी इच्छाओ को पूरी करते रहते है। अतः वह सागर के तुल्य होता है अपने आप में सदैव पूर्ण। सागर में गिरने वाली नदियों के समान ही भौतिक इच्छाए उसके पास आती है किन्तु वह अपने कार्य में स्थिर रहता है और इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा से रंचमात्र भी विचलित नहीं होता है।

 

 

 

 

कर्मी, मुमुक्ष तथा वह योगी सिद्धि के कामी होते है यह सभी अपनी अपूर्ण इच्छाओ के कारण ही दुखी रहते है किन्तु कृष्ण भावनाभावित पुरुष भगवत सेवा में ही सुख पूर्वक रहता है और उसकी कोई भी इच्छा नहीं होती है। वस्तुतः वह तो तथा कथित भाव बंधन की कामना भी नहीं करता है। कृष्ण के भक्तो की कोई इच्छा नहीं रहती है इसलिए ही वह शांत रहते है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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