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Swami Vivekananda Books Hindi Pdf / स्वामी विवेकानंद बुक्स पीडीएफ

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मित्रों इस पोस्ट में Swami Vivekananda  Books Hindi Pdf दिया जा रहा है। आप यहां से Swami Vivekananda Books Hindi Pdf Free Download कर सकते हैं।

 

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Swami Vivekananda Books Hindi Pdf / स्वामी विवेकानंद बुक्स Pdf

 

 

 

Meditation and its Methods Book pdf in Hindi

 

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Swami Vivekananda Books Hindi Pdf
Swami Vivekananda Books Hindi Pdf
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राजयोग बुक पीडीएफ 

 

 

 

 

 

 

श्री कृष्ण कह रहे है – समस्त ऐन्द्रिय क्रियाओ से विरक्ति को योग की स्थिति (योग धारणा) कहा जाता है। इन्द्रियों के समस्त द्वारो को बंद करके मन को हृदय में और प्राणवायु को सिर पर केंद्रित करके मनुष्य अपने को योग में स्थापित करता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां बताई गई विधि के द्वारा सबसे पहले इन्द्रिय भोग के सारे द्वार बंद करने होते है। यह प्रत्याहार या इन्द्रिय बिषयो से इन्द्रियों को हटाना कहलाता है।

 

 

 

सबसे उत्तम विधि तो कृष्ण भावनामृत है। यदि कोई भक्ति में अपने मन को कृष्ण में स्थिर करने में समर्थ होता है तो उसके लिए अविचल दिव्य समाधि में बने रहना सुगम हो जाता है।

 

 

 

 

प्रत्याहार में ज्ञानेन्द्रियां नेत्र, कान, नाक, जीभ तथा स्पर्श को पूर्णतया वश में करके इन्द्रिय तृप्ति से दूर रखा जाता है। इस प्रकार मन हृदय में स्थित परमात्मा पर केंद्रित होता है और प्राणवायु को सिर के ऊपर तक चढ़ाया जाता है।

 

 

 

 

इसका विस्तृत वर्णन छठवे अध्याय में हो चुका है। जैसा पहले ही कहा जा चुका है अब यह विधि व्यावहारिक नहीं है। सबसे उत्तम विधि चैतन्य प्रभु के अनुसार भगवान के नाम का कीर्तन है जो सरल तथा सुगम भी है।

 

 

 

 

13- योगाभ्यास में स्थित होकर भगवान का चिंतन करना – श्री कृष्ण के अनुसार – इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परम संयोग यानी ओंकार का उच्चारण करते हुए यदि कोई भगवान का चिंतन करता है और अपने शरीर का त्याग करता है तो वह निश्चित रूप से आध्यात्मिक लोको को जाता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि ओम, ब्रह्म तथा भगवान कृष्ण परस्पर भिन्न नहीं है। ओम कृष्ण की निर्विशेष ध्वनि है तथा हरे कृष्ण में यह ओम सन्निहित है।

 

 

 

अतः यदि कोई हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे, राम राम हरे हरे। इस मंत्र का जप करते हुए शरीर त्यागता है तो वह अपने अभ्यास के गुणानुसार आध्यात्मिक लोक को जाता है।

 

 

 

इस युग के लिए कृष्ण मंत्र जप की स्पष्ट संस्तुति है। कृष्ण के भक्त कृष्ण लोक या गोलोक वृन्दावन को जाते है। सगुण वादियों के लिए आध्यात्मिक आकाश में अन्य अनेक लोक है, जीने बैकुंठ लोक कहते है। किन्तु निर्विशेषवादी तो ब्रह्म ज्योति में अटके रह जाते है।

 

 

 

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