Top 25 + Swami Vivekananda All Books in Hindi Free Download

Swami Vivekananda All Books in Hindi मित्रों इस पोस्ट में Swami Vivekananda Books in Hindi दिया गया है।  आप इन्हे फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं। 

 

 

 

Swami Vivekananda All Books in Hindi

 

 

 

 

 

 

 

1- स्वामी विवेकानंद बुक्स Swami Vivekananda Books PDF in Hindi

 

2-  स्वामी विवेकानंद बुक्स Swami Vivekananda Books PDF

 

4- मेरा जीवन तथा ध्येय Mera Jivan Tatha Dhyey Free Download

 

5- भारत में विवेकानंद Bharat Me Vivekananda Free

 

6- हिंदी देश बोध Hindi Dash Bodh Download 

 

7- जाती संक्रांति Swami Vivekananda in Hindi PDF Download

 

8- भारतीय नारी Vivekananda Motivational Books PDF

 

9- धर्मतत्व  DharmaTatwa Pdf Free

 

10- ईशदूत ईशा  Ishadut Isha PDF

 

11- शिक्षा ( विवेकानंद बुक्स ) Swami Vivekananda in Hindi PDF

 

13- राजयोग Rajyog PDF Free

 

14- मरणोत्तर जीवन Maranottar Jivan

 

15- कर्म योग Karmyog Download Karen

 

16-ज्ञान योग Gyan Yog Download

 

17 -प्रेम योग Prem Yog Free Book

 

18- मेरी समरनीति Meri SamarNiti Best Pdf

 

19 – वर्तमान भारत  Vartman Bharat  PDF

 

20- भक्ति योग Bhakti Yoga PDF 

 

21- Biography book of Swami Vivekananda in Hindi pdf download

 

 

 

Rajyog By Swami Vivekananda in Hindi

 

 

 

 

 

 

राजयोग का मुख्य ग्रंथ महर्षि पतंजलि का योग सूत्र है। इसका प्रयोग स्वामी विवेकानंद ने 19वीं शताब्दी में किया था। योग का अलग-अलग अर्थ अलग-अलग संदर्भों में वर्णित होता है। कर्म योग की “समाधि” अवस्था को ही राजयोग कहा जाता है।

 

 

 

 

प्रत्येक योग की कुछ न कुछ अच्छाइयों को अपने भीतर समाहित करने के कारण राजयोग को सभी योगो का राजा कहते है। इस योग के प्रयोग से साधक के मन क्लेश मिट जाता है और योग साधक को शांति का अनुभव होता है।

 

 

 

 

योग उसे ही कहते है जहां जोड़ या जुड़ाव हो – प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अनंत ज्ञान और शक्ति का सागर है। योग साधना में साधक की शक्तियों का जुड़ाव दैविक शक्तियों से होता है। जिससे साधक अपने मन को एकाग्र कर सकता है।

 

 

 

 

योग साधना के द्वारा मन की चंचलता पर अंकुश लगाने का कार्य होता है। अगर मन स्थिर हो गया तो साधक शांति के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। Rajyog By Swami Vivekananda in Hindi बुक यहां से डाउनलोड करें। 

 

 

 

Bhakti Yoga PDF भक्ति योग हिंदी में 

 

 

 

 

ब्रह्म से जुड़ने की कला या परम सत्ता से जुड़ना ही योग कहलाता है और भक्ति यानी कि प्रेम से परम सत्ता के साथ ही जुड़ना भक्ति योग कहलाता है। परम चेतना से चेतना का जुड़ाव ही भक्ति है।

 

 

 

 

संसार द्वारा प्रदत्त सभी उपाधियों को विसार कर “परमानंद” जिससे जुड़ने में परम आनंद की अनुभूति हो वह ही भक्ति है। भक्ति योग परमात्मा के साथ एक रूपता की जागृत अवस्था और अनुभूति है।

 

 

 

 

भक्ति की परिभाषा को व्याखित नहीं किया जा सकता, जिस प्रकार से सूर्य को दीपक दिखाना नगण्य लगता है या सूर्य के समक्ष दीप शिखा का कोई आकार नहीं है। दीप शिखा सूर्य के समक्ष सूर्य में ही विलीन हो जाती है। उसी तरह भक्ति को परिभाषित करना बड़ा ही दुश्कर है।

 

 

 

 

 

इसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। जैसे मनुष्य के तन में श्वांस का आना जाना लगा रहता है। उसी तरह इसकी सिर्फ अनुभूति ही की जा सकती है। भक्ति योग में जब मानव प्रतिष्ठित होता है तब उसके मुखमण्डल पर ओजस्विता के साथ ही प्रखर तेज की चमक उपस्थित हो जाती है।

 

 

 

 

 

व्यक्ति हर पल प्रफुल्लित रहता है और शांति का अनुभव करता है। भक्ति का एक अनुभव ज्ञान है। जिसमे सब कुछ परमात्मा का ही परिलक्षित होता है या कहें कि हर जगह में हर दृष्टि में परम सत्ता का संचालन अनुभव गम्य होने लगता है।

 

 

 

 

 

श्वेताश्वर उपनिषद में इसे असीम अनंत ईश्वर के प्रेम के रूप में दर्शाया गया है। भागवद गीता में इसे अंतिम सत्य अथवा मुक्ति के रूप में बताया गया है और नारद भक्ति सूत्र में इसे भागवतम के रूप में समझाया गया है।

 

 

 

 

भक्ति भाव की प्रधानता —जिस प्रकार मनुष्य को भोजन करते समय “भाव” अथवा रस की अनुभूति नहीं होने पर उसे भोजन में कोई आनंद नहीं प्राप्त होता है।

 

 

 

 

तब मनुष्य को वह भोजन अच्छा ही नहीं लगता, ठीक उसी प्रकार कोई कार्य या भक्ति में भाव का होना अनिवार्य है अन्यथा किसी से भी भक्ति नहीं हो सकती है।

 

 

 

 

जिस प्रकार छोटा बालक अपनी माता की गोद में जाकर खेलने लगता है और उल्लसित रहता है। ठीक उसी हालत भक्ति योग करने वाले साधक की हो जाती है। जो कि अवर्णनीय है इसे सिर्फ और सिर्फ अनुभव के द्वारा ही ज्ञात किया जा सकता है।हरिदास साहित्य में इसे “पंच विधा” भाव में दर्शाया गया है।

 

 

 

 

1. शांत भाव-भक्त की अवस्था उस समय शांत रहती है और वह खुद में ही रमण रहता है।

 

2. दास्य भाव -जो खुद को सदैव ही परमात्म सेवा में हमेशा लगाए रखे।

 

3. वात्सल्य भाव – मैया यशोदा की भांति ईश्वर को पुत्र की तरह पालना जैसे कौशल्या और राम का वात्सल्य भाव।

 

4. सखा भाव अथवा साख्य भाव -अर्जुन और कृष्ण का सखा भाव यथा ऊधव और कृष्ण का साख्य भाव इसमें भक्त खुद को ईश्वर के रूप में बिम्बित करना।

 

5. माधुर्य भाव –यह भक्ति का श्रेष्ठ भाव है। जहां भक्त ईश्वर के प्रति अपना सब कुछ अर्पण कर देता है और अभय हो जाता है। यथा मीरा, राधा और गोपियों की स्थिति यही थी।

 

 

 

आप भक्ति योग बुक ( लिंक पर क्लिक करके ) डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

सिर्फ पढने के लिए

 

 

Swami Vivekananda All Books in Hindi

 

 

 

 

आप मंदिर जाते है, तो भगवान् के लिये अपनी क्षमता के अनुसार कुछ ना कुछ अर्पित करने के लिए अवश्य ही ले जाते है। डॉक्टर के पास जाते है तो फीस पहले देना होता है।

 

 

 

 

कहने का मतलब हर जगह पहले आप को ही देना पड़ता है यहां तक कि मरने के बाद भी कफ़न से लेकर लकड़ी तक के पैसे पहले देने पड़ते है। उसके बाद ही आपकी बातों पर गौर किया जाता है।

 

 

 

 

 

बीरबल नाम का एक आदमी था। नाम तो उसका बीरबल था लेकिन उसकी बातों को सुनने के लिए अकबर नहीं था। बीरबल को अपने खेत के पेपर निकलवाने थे।

 

 

 

 

वह लेखपाल के पास गया तो लेखपाल ने कहा, ” १२ बज गए है। अभी तक बोहनी नहीं हुई है।  पहले बोहनी कराओ।  उसके बाद ही कोई गुंजाइस होगी।”

 

 

 

 

 

 

उस लेखपाल को सरकार की तरफ से अच्छा वेतन मिलता है। वह किसलिए है ?  यह पूछने वाला कोई नहीं है। भरा हुआ पैसा कहां जाता है।  ऊपरवाला भी नहीं बता सकता। ऐसे शानदार ऑफिसर है बिजली विभाग में ,कितने बड़े मंदिर ऐसे है जहां एक महीने पहले ही अपने नंबर बुक करने पड़ेंगे फिर आपको भगवान् के दर्शन होंगे।

 

 

 

 

 

बात बीरबल की हो रही थी, वह पेपर निकलवा कर आया तो उसकी तबीयत ख़राब हो गई, वह डॉक्टर के पास गया डॉक्टर ने चेक नहीं किया बिल पहले सुना दिया ३०० रूपये लगेंगे। मरता क्या नही करता बिल का ३०० रूपये तो देना ही पड़ा। कहने का मतलब हर जगह आप को पहले देना ही पड़ेगा, कारण चाहे जो भी हो पहले देने का आदत डालनी होगी अन्यथा आपका काम अधूरा रह जायेगा।

 

 

 

 

गिरना और उठना

 

 

 

 

2 – गोपाल समुद्र के किनारे घूम रहा था। उसके पास कोई काम नहीं था और वह परेशान था। कंपनी में कुछ त्रुटि के कारण उसका काम छूट गया था। उसके पास मात्र 400 रुपये थे।

 

 

 

 

घूमते हुए उसकी निगाह समुद्र की लहरों पर गई। लहरे एक के बाद एक आती गिर जाती और पुनः उठकर आ जाती थी। उन लहरों को देखकर गोपाल अब  निश्चय कर चुका था कि उसे एक सफल आदमी बनना है। 200 रुपये में उसने भुने हुए चने ख़रीदे और उसे समुद्र के किनारे ही घूमकर बेचने लगा।

 

 

 

 

 

शाम तक उसके पास 600 रुपये की आमदनी हो चुकी थी। दूसरे दिन उसे कुछ लोग सामान के साथ पकड़ लिये और परेशान करने लगे। यही क्रम एक सप्ताह चला, लेकिन अब गोपाल को उन लोगों ने परेशान करना छोड़ दिया था।

 

 

 

 

इसलिए कि गोपाल ने उन लोगों से दोस्ती कर ली थी। अब उसका धंधा पहले से दोगुना हो गया था। उसने अब अन्य लोगों को सहारा देना शरू कर दिया। आज गोपाल एक सफल इंसान है।

 

 

 

 

सीख- गिरने पर ही उठने के लिए हिम्मत मिलती है।

 

 

 

 

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