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Surya Ashtakam Pdf in Hindi / श्री सूर्य अष्टकम Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Surya Ashtakam Pdf in Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Surya Ashtakam Pdf in Hindi download कर सकते हैं और आप यहां से Aparadh Shastra Book Pdf कर सकते हैं।

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Surya Ashtakam Pdf in Hindi 

 

 

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Surya Ashtakam Pdf in Hindi Download यहां से करे।
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Surya Ashtakam Pdf in Hindi
Sankhya Darpan Pdf Hindi यहां से डाउनलोड करे
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सूर्याष्टकम स्तोत्र पाठ से लाभ

 

 

 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान सूर्य के लिए रविवार के दिन को मान्यता दी गयी है। रविवार के दिन सूर्याष्टकम का पाठ करने से जातक के सभी कुंडली दोष समाप्त होकर सुख सम्पन्नता प्राप्त होती है। जीवन में ग्रह से उत्पन्न होने वाले दोष का भी शमन होता है।

 

 

 

संसार के सभी कार्य भगवान सूर्य की ऊर्जा शक्ति से ही सम्पन्न होते है। सूर्य की उपासना करने वाले व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा उसके सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होते है। पुराणों में वर्णित है कि सूर्याष्टकम का शीघ्र फल प्रदान करता है।

 

 

 

सूर्याष्टकम पाठ से प्राप्त लाभ

 

 

ऋग्वेद में सूर्य तत्व के स्तंभुष्ठ 1| 111 वैदिक काल से ही सूर्य को आत्म सम्मान तथा सामाजिक प्रतिष्ठा का कारक माना जाता है।

सूर्य की अद्भुत गुरुत्वाकर्षण के कारण ही सभी ग्रह इसके आस-पास घूमते रहते है। सूर्य समस्त सृष्टि के संवाहक है। इनसे ही सभी को जीवन प्राप्त होता है अतः इन्हे सभी प्राणियों का पिता कहा गया है।

यदि कोई रविवार के दिन 11 बार सूर्य मंत्र का नियमित रूप से पाठ करता है तो वह अपने सभी कार्यो में सफलता प्राप्त करता है।

सूर्य आदित्य हृदय का पाठ के साथ ही गायत्री मंत्र का पाठ करने पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।

निःसंतान दम्पति को सूर्य की उपासना करने से संतान लाभ प्राप्त होता है।

राजनीति में भी सूर्य को राजा का दर्जा प्राप्त है। सूर्यवंशी क्षत्रिय सूर्य की सदैव उपासना से सुखी रहते थे।

सूर्य को नव ग्रहो में सम्राट कहा गया है। जातक की कुंडली में सूर्य मजबूत रहने से उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

उनके नेत्रों से प्रेम के आंसू बहने लगे। मुने! हिमशैल ने प्रसन्न मन से अत्यंत प्रेम पूर्वक प्रणाम किया और विनीत भाव से खड़े हो श्री विष्णु आदि देवताओ से कहा – आज मेरा जन्म सफल हो गया। मेरी बड़ी भारी तपस्या सफल हुई। आज मेरा ज्ञान सफल हुआ और आज मेरी सारी क्रियाये सफल हो गयी।

 

 

 

आज मैं धन्य हुआ। मेरी सारी भूमि धन्य हुई। मेरा कुल धन्य हुआ। मेरी स्त्री तथा मेरा सब कुछ धन्य हो गया इसमें संशय नहीं है क्योंकि आप सब महान देवता एक साथ मिलकर एक ही समय यहां पधारे है। मुझे अपना सेवक समझकर प्रसन्नता पूर्वक उचित कार्य के लिए आज्ञा दे।

 

 

 

हिमगिरि का यह वचन सुनकर वे सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और अपने कार्य की सिद्धि मनाते हुए बोले – महाप्राज्ञ हिमाचल! हमारा हितकारक वचन सुनो। हम सब लोग जिस काम के लिए यहां आये है उसे प्रसन्नता पूर्वक बता रहे है।

 

 

 

गिरिराज पहले जो जगदंबा उमा दक्ष कन्या सती के रूप में प्रकट हुई थी और रूद्र पत्नी होकर सुदीर्घकाल तक इस भूतल पर क्रीड़ा करती रही वे ही अंबिका सती अपने पिता से अनादर पाकर अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण करके यज्ञ में शरीर त्याग अपने परम धाम को पधार गयी।

 

 

 

हिमगिरे! वह कथा लोक में विख्यात है और तुम्हे भी विदित है। यदि वे सती पुनः तुम्हारे घर में प्रकट हो जाय तो देवताओ का महान लाभ हो सकता है। ब्रह्मा जी कहते है – श्री विष्णु आदि देवताओ की यह बात सुनकर गिरिराज हिमालय मन ही मन प्रसन्न हो आदर से झुक गए और बोले।

 

 

 

प्रभो! ऐसा हो तो बड़े सौभाग्य की बात है। तदनन्तर वे देवता उन्हें बड़े आदर से उमा को प्रसन्न करने की विधि बताकर स्वयं सदाशिव पत्नी उमा की शरण में गए। एक सुंदर स्थान में स्थित हो समस्त देवताओ ने जगदंबा का स्मरण किया और बारंबार प्रणाम करके वे वहां श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे।

 

 

 

देवता बोले – शिव लोक में निवास करने वाली देवी! उमे! जगदंबे! सदाशिव प्रिये! दुर्गे! महेश्वरी! हम आपको नमस्कार करते है। आप पावन शांत स्वरुप श्री शक्ति है। परम पावन पुष्टि है। अव्यक्त प्रकृति और महतत्त्व ये आपके ही रूप है। हम भक्ति पूर्वक आपको नमस्कार करते है।

 

 

 

आप कल्याणमयी शिवा है। आपके हाथ भी कल्याणकारी है। आप शुद्ध, स्थूल, सूक्ष्म और सबका परम आश्रय है। अंतर्विद्या और सुविद्या से अत्यंत प्रसन्न रहने वाली आप देवी को हम प्रणाम करते है। आप श्रद्धा है। आप धृति है। आप श्री है और आप ही सबमे व्याप्त रहने वाली देवी है।

 

 

 

आप ही सूर्य की किरणे है और आप ही अपने प्रपंच को प्रकाशित करने वाली है। ब्रह्माण्ड रूप शरीर में और जगत के जीवो में रहकर जो ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत की पुष्टि करती है उन आदिदेवी को हम नमस्कार करते है। आप ही वेदमाता गायत्री है आप ही सावित्री और सरस्वती है।

 

 

 

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