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Surendra Mohan Pathak Sudhir Series Pdf Novel Hindi

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Surendra Mohan Pathak Sudhir Series Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Surendra Mohan Pathak Sudhir Series Pdf Download कर सकते हैं और भी उपन्यास के लिये आप हमारे उपन्यास टेलीग्राम ग्रुप से अवश्य जुड़े।

 

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Surendra Mohan Pathak Sudhir Series Pdf

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

बात करने का ढंग तो आम भिखारियों से एकदम अलग था बिलकुल नार्मल अंदाज कार्तिक ने उसे चालीस रुपये देते हुए कहा आप यहां बहस मत करो यह बीस रुपये इस दुकानदार के और यह बीस रुपये क्रासिंग वाले है। वह भिखारन लड़की कार्तिक का मुंह देखने लगी।

 

 

 

शायद सोच रही थी कि वह क्या जवाब दे तभी शेखर बोल उठा तुम्हे पैसा मिल गया अब जाओ यहां से। भिखारन लड़की वहां से चली गयी। अब शेखर कार्तिक से उलझ गया और बोला – कार्तिक भाई आप जैसे लोग ही इन भिखारियों का मन बढ़ा देते है अगर जिसके पास बीस रुपया नहीं रहेगा तो वह कहाँ से देगा।

 

 

 

कार्तिक बोला – शेखर भाई! आपने गौर से उसके चेहरे पर देखा क्या? शेखर क्रोध करते हुए बोला – उसके चेहरे में कौन चाँद-तारा लगा हुआ है जो मैं उसके चेहरे की तरफ देखूं? अरे शेखर भाई! मेरे कहने का मतलब यह है कि वह भीकहरन नहीं थी।

 

 

 

उसका चेहरा बनावटी लग रहा था और उसके कपड़े तो एकदम आम तरह के भिखारियों से हट कर थे। उसकी बात करने की कला तो पढ़े लिखे लोगो के जैसी लग रही थी। शेखर बोला – हमारे पास इन सब बातो पर ध्यान देने के लिए समय कहाँ है?

 

 

 

लेकिन मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ कि अच्छी भली कम्पनी और दुकान संभालते हुए जासूस बनने का भूत कब से सवार हो गया है।

 

 

 

पिता की बनाई हुई दुकान पर ऐस कर रहे हो फिर भी तुम्हे जासूस बनने की पड़ी है। कार्तिक बोला – शेखर भाई! हैण्डलूम की कम्पनी मैंने अपने दम पर खड़ी किया है इतना कहते हुए कार्तिक वहां से चला गया।

 

 

 

उसके मन में उस भिखारन की असलियत जानने की इच्छा प्रबल हो उठी। वह उसकी सहायता करना चाहता था उसके इरादे भी नेक थे।

 

 

 

कार्तिक अपनी कम्पनी में पहुंचा वहां काम सही तरीके से चल रहा था। उसकी कम्पनी का बना हुआ माल चद्दर, तौलिया, रुमाल इत्यादि का बाजार में तीव्र गति से बिक रहा था क्योंकि अच्छी गुणवत्ता और कम कीमत होने से जनता बहुत पसंद कर रही थी।

 

 

 

कार्तिक दो पार्टियों को ही माल देता था। बाकी सारा माल उसकी दुकान पर ही बिक जाता था। सभी कर्मचारियों को वेतन देने का समय हो गया था। पराग ने कार्तिक को एक भी पैसा नहीं दिया था। सिर्फ 20 दिन का खर्च देकर वह गांव चले गए थे।

 

 

 

समय से पहले ही कर्मचारियों को वेतन मिल जाता था। कार्तिक चाहता तो दुकान और कम्पनी के पैसे से सबका वेतन दे सकता था लेकिन उसने पूरा हिसाब अपने पिता को देने का मन बना लिया था। कार्तिक ने अपनी दुकान में कई सालो से पड़े माल और कम्पनी के खराब हुए माल को एक रद्दी माल खरीदने वाले को बेच दिया।

 

 

 

जिससे 8 लाख रुपये प्राप्त हुए उन्ही रुपयों से सभी कर्मचारियों का वेतन दे दिया फिर भी उसके पास एक लाख रुपये बच गए जो उसके खर्च में काम आ रहे थे। अब पराग के आने का समय हो गया था। कार्तिक सुबह अपनी दुकान और कम्पनी के लिए निकला था कि वही भिखारन की लड़की एक नीली कोठी में दाखिल हो रही थी।

 

 

 

कार्तिक वैसे तो प्रतिदिन ही उस नीली कोठी को देखता था लेकिन आज उस भिखारन लड़की को उस नीली कोठी में जाते हुए देखकर उसकी जिज्ञासा बढ़ गयी थी।

 

 

 

लेकिन वह लड़की आज भिखारन के वेश में नहीं थी। उसके हाथ में एक बड़ा सा बैग था वह किसी कुलीन खानदान से ताल्लुक रखती हुई मालूम पड़ती थी।

 

 

 

कार्तिक के पास समय कम था अतः वह अपनी कम्पनी और दुकान की तरफ चला गया। पराग और केतकी दोनों ही दोपहर में गांव से आ गए थे लेकिन वह जिस उद्देश्य से गांव गए थे वह पूरा तो नहीं हो सका लेकिन एक आस जरूर बंध गयी थी।

 

 

 

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