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Sunil Prabhakar Novel in Hindi Pdf / कब्र मेरी माँ उपन्यास Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Sunil Prabhakar Novel in Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Sunil Prabhakar Novel in Hindi Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Amit Khan Novels Hindi Pdf कर सकते हैं।

 

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Sunil Prabhakar Novel in Hindi Pdf Download

 

 

 

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Sunil Prabhakar Novel in Hindi Pdf
कब्र मेरी मां हिंदी नॉवेल यहां से डाउनलोड करे।
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Sunil Prabhakar Novel in Hindi Pdf
रणक्षेत्रम भाग 3 हिंदी नॉवेल यहां से डाउनलोड करे।
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Sunil Prabhakar Novel in Hindi Pdf
Vardi Wala Gunda Novel pdf यहां से डाउनलोड करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

उन दोनों का दिमाग इतना तीव्र था कि लापरवाही करते हुए भी दूसरे नंबर पर रहते थे। अगर ध्यान से पढ़ाई करते तब एक नंबर पर अवश्य ही रहते। विवेक सोनकर और नरेश प्रजापति परीक्षा के बाद अपने पेपर को एक दूसरे को दिखाते दोनों एक ही कक्षा के विद्यार्थी थे।

 

 

 

 

पढ़ने में तीव्र थे और ऐसा प्रतीत होता था कि इस बार भी यही दोनों सम्मिलित रूप से नंबर एक पर रहने वाले है इनके बाद ही दूसरा कोई है। सुधीर और रजनी स्कूल के लिए साथ ही जाते थे। सुधीर ने रास्ते में कहा – ‘दीदी’ एक बात कहूं? हां जरूर कहो सुधीर मैं समझ रही हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो।

 

 

 

 

ठीक है बताओ मैं क्या कहना चाहता हूँ। सुधीर ने प्रश्न कर दिया। रजनी ने उत्तर देते हुए कहा कि जहां तक मेरा अंदाज है कि तुम कम्पनी के बारे में ही सोच रहे हो क्या मैं  हूँ ना सुधीर? सुधीर बोला – आप तो हमारी गाइड हो गयी है जो बिना कहे ही सब उत्तर बता देती है।

 

 

 

 

हम लोग इतने छोटे क्यों है दीदी? क्या हम लोग जल्दी से बड़े नहीं हो सकते?  हमे अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होना है दीदी। देखो सुधीर, समय पर ही सब कार्य होता है। समय से पहले शुरू भी नहीं होता है। रजनी एकदम दार्शनिक बनते हुए बोली।

 

 

 

 

लेकिन आपको कैसे पता है शाम के समय मैं तुम्हे अवश्य ही बताउंगी। स्कूल में रजनी और सुधीर अपने-अपने कक्षा में चले गए थे। डा. निशा भारती के पास कोमल और सरिता बहुत ही खुश थी। कोमल अब पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गयी थी।

 

 

 

कोमल ने डा. भारती के घर का सारा कार्य संभाल लिया था। सरिता हमेशा ही विपिन के साथ रहती थी। एक फौजी ऊपर से जितना अनुशासन प्रिय तथा कठोर।

 

 

 

 

लेकिन एक छोटी सी बालिका के साथ खुद छोटा बच्चा बन गया था क्योंकि इतने धनवान घर में एक सरिता ही जिंदगी जीने का साधन थी और विपिन उसके ही साथ अपना समय बिताते थे। डा. भारती सरकारी अस्पताल में व्यस्त रहती थी।

 

 

 

 

तथा आने के पश्चात अब उन्हें भोजन के लिए भी तैयारी नहीं करनी पड़ती थी क्योंकि कोमल यह सब जिम्मेदारी बहुत ही भली प्रकार निबाह रही थी। अब तो डा. भारती को अपने सरोज क्लिनिक में बैठने के लिए भरपूर समय मिलता था। भारती दम्पत्ति निःसंतान थे।

 

 

 

 

लेकिन सरिता ने इस कमी को पूरा कर दिया था। डा. भारती अपने क्लिनिक में किसी भी मरीज से कोई भी फ़ीस नहीं लेती थी विशेषकर असहाय लोगो से। वह तो अनाथ और असहाय लोगो की पूरी तरह सेवा करती थी और मध्यम वर्ग से एक शपथ पत्र भरवाकर तब ही उसका इलाज करती थी कि डा. के फ़ीस का पैसा किसी जरूरतमंद को देना होगा।

 

 

 

 

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