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Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf in Hindi / श्रीमद भागवत महापुराण Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf / श्रीमद भागवत महापुराण पीडीऍफ़ 

 

 

 

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Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण pdf
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Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf in Hindi
श्रीमद भागवत महापुराण इन संस्कृत pdf
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Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf in Hindi
श्रीमद भागवत महापुराण पीडीएफ डाउनलोड 
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Shrimad Bhagwat Mahapuran Pdf in Hindi
संपूर्ण गरुड़ पुराण Pdf Download
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

नारद जी को यह बात अच्छी नहीं लगी यद्यपि शिव जी ने उनकी भलाई के लिए ही कहा था। हे भरद्वाज अब कौतुक सुनो हरि की इच्छा बलवान है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- श्री राम जी जो चाहते है वही होता है। ऐसा कोई नहीं जो उनके विरुद्ध कर सके। शंकर जी के वचन नारद को अच्छे नहीं लगे और वह तब ब्रह्मलोक को चले गए।

 

 

 

 

2- नारद जी हाथ में सुंदर वीणा लिए क्षीर सागर को गए वह गायन कला में निपुण थे। जहां वेदो के मस्तक स्वरुप लक्ष्मी निवास भगवान नारायण रहते है।

 

 

 

3- नारद जी को देखते ही चराचर के स्वामी भगवान हँसते हुए बोले – हे मुनि! आज आपने बहुत दिनों पर दया की। रमा निवास भगवान उठकर बड़े आनंद से नारद जी से मिले और उनके साथ आसन पर बैठ गए।

 

 

 

4- श्री रघुनाथ जी की माया बड़ी प्रबल है। यद्यपि शिव जी के मना करने पर भी नारद जी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान को कह सुनाया। जगत में ऐसा कौन जन्मा है जो भगवान की माया से मोहित न जाय।

 

 

 

128- दोहा का अर्थ-

 

 

 

भगवान रुखा मुंह करते हुए मीठे वचन कहे – हे मुनिराज! आपके स्मरण से दूसरो के मोहाभिमान नष्ट हो जाते है। तो आप कैसे मोह के वशीभूत हो सकते है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- जिसके मन में ज्ञान वैराग्य नहीं रहते है, उसके मन में ही मोह उत्पन्न होता है। हे मुनि! सुनिए आप तो ब्रह्मचर्य व्रत में तत्पर है धीर बुद्धि है, भला आपको कैसे कामदेव सता सकता है?

 

 

 

 

2- करुणा निधान भगवान ने विचारकर देखा कि नारद के मन में अभिमान का अंकुर पैदा हो गया है। तब नारद जी ने अभिमान के साथ कहा – भगवान – यह सब आपकी कृपा है।

 

 

 

 

3- मैं अभिमान रूपी वृक्ष को तुरंत ही उखाड़कर फेक दूंगा। मैं अवश्य ही उपाय करूँगा जिसमे मुनि का कल्याण हो और मेरा खेल हो क्योंकि सेवको का हित करना हमारा प्रण है।

 

 

 

 

4- उनके हृदय में अभिमान और बढ़ गया था, वह (नारद जी) भगवान के चरणों में सिर नवाकर चले, तब लक्ष्मीपति भगवान ने अपनी माया को प्रेरित किया। अब उसकी कठिन करनी सुनो।

 

 

 

129- दोहा का अर्थ-

 

 

 

उस हरि माया ने रास्ते में सौ योजन (चार सौ कोस) का एक नगर रचा, उस नगर की रचनाये भगवान विष्णु के नगर बैकुंठ से भी सुंदर थी।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- उस नगर में शील निधिधाम का राजा रहता था। उस नगर के सभी नर-नारी कामदेव और रति के समान ही सुंदर थे। उस राजा के यहां असंख्य हाथी घोड़े और सेना के समूह थे।

 

 

 

 

2- वह रूप, तेज, बल का और तेज का स्वामी था। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रो के समान था, उसकी एक विश्वमोहिनी नामक कन्या थी, उसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाती थी।

 

 

 

 

3- वह भगवान की मया ही थी जी सब गुणों की खान थी, उसकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता है। उस राजकुमारी का स्वयंवर था, वहां अनेको राजा आये थे।

 

 

 

4- नारद जी कौतुक वस उस नगर में गए वहां सभी नगर वासियो से उन्होंने सब हाल पूछा, वह राजा के महल में आये, राजा ने उन्हे आसन पर बैठाया।

 

 

 

130- दोहा का अर्थ-

 

 

 

राजा ने नारद जी को लाकर राजकुमारी को दिखाकर उसके सब गुण दोष बताने की प्रार्थना की, राजा ने नारद जी से कहा, आप हृदय में विचार कर इसके गुण दोष बताइये।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- नारद जी देर तक उस राजकुमारी की तरफ देखते ही रह गए वह अपना वैराग्य ही भूल गए, उसके लक्षण को देखकर मुनि बहुत ही हर्षित हुए लेकिन प्रकट में उन लक्षणों को नहीं बताया।

 

 

 

2- नारद जी अपने मन में कहने लगे, यह शीलनिधि की कन्या जिसका वरण करेगी वह अमर हो जायेगा, उसकी रणभूमि में पराजय नहीं होगी और संसार के सारे जीव उसकी सेवा करेंगे।

 

 

 

3- नारद जी ने सब लक्षण अपने हृदय में रखकर राजा को बनावटी लक्षण बताये और राजा से बोले यह तुम्हारी कन्या बहुत ही सुलक्षण है। इतना कहते हुए नारद जी चल दिए उनके मन में यह चिंता थी।

 

 

 

 

4- मैं सोच विचार कर वही उपाय करूँगा, जिससे यह कन्या मुझे ही वरण करे। हे विधाता! यह कन्या मुझे किस प्रकार प्राप्त होगी क्योंकि इस समय जप-तप से कुछ होने वाला नहीं है।

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

इस समय तो सुंदरता का बड़ा रूप चाहिए जिसे देखकर राजकुमारी रीझकर मेरे गले में जयमाल डाल दे।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- अब मैं भगवान से उनकी सुंदरता मांग लेता हूँ। परन्तु, मुझे उनके पास जाने में देर हो जाएगी, हरि भगवान तो हमारे परम हितैषी है और वही इस समय हमारी सहायता कर सकते है।

 

 

 

2- नारद जी ने उस समय बहुत प्रकार से विनती की और लीलाधारी तुरंत ही वही प्रकट हो गए। भगवान को देखकर नारद जी को परम संतोष हुआ उनके नेत्र शीतल हो गए, उन्होंने सोचा अब हमारा कार्य हो जायेगा।

 

 

 

 

3- नारद जी ने अति दीन होकर आर्त भाव से भगवान को सब बताया और उनसे सहायता करने की प्रार्थना करने लगे। नारद जी बोले हे भगवान आप हमे अपना सुंदर रूप प्रदान करिये जिससे मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूं?

 

 

 

 

4- नारद जी बोले हे नाथ! मैं आपका दास हूँ। जो हमारे हित में हो वही कार्य शीघ्र करिये। भगवान अपनी माया का प्रबल रूप देखकर मन ही मन हँसते हुए बोले।

 

 

 

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