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Shri Krishna Story In Hindi Pdf Free / श्री कृष्ण स्टोरी इन हिंदी पीडीऍफ़

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Shri Krishna Story In Hindi Pdf Free श्री कृष्ण स्टोरी इन हिंदी पीडीऍफ़ 

 

 

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Shri Krishna Story In Hindi Pdf Free
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भगवान कृष्ण के 108 नाम Pdf Download
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कृष्ण भावना भावित सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

आत्मसंयम – श्री कृष्ण कहते है – जो व्यक्ति क्रोध तथा समस्त भौतिक इच्छा त्याग चुका है। किसी भी भौतिक इच्छा से रहित नहीं है। जो स्वरुप सिद्ध तथा आत्मसंयमी है और संसिद्ध के लिए निरंतर प्रयास करता है। उनकी मुक्ति निकट भविष्य में सुनिश्चित है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – मोक्ष के लिए सतत प्रयास करने वाले महापुरुषों में से जो कृष्ण भावना भावित होता है वह सर्वश्रेष्ठ है। इस तथ्य की पुष्टि भागवत में (4. 22. 39) इस प्रकार हुई है। “भक्ति पूर्वक भगवान वासुदेव की पूजा करने का प्रयास तो करो ! बड़े से बड़े साधु पुरुष भी इन्द्रियों के वेग को रोकने में उतनी कुशलता से समर्थ नहीं हो पाते जितना कि वह सकाम कर्मो की तीव्र इच्छा को समूल नष्ट करके और भगवान के चरणकमलों की सेवा करके दिव्य आनंद में लीन रहते है।”

 

 

 

बद्ध जीव में कर्म के फलो को भोगने की इच्छा इतनी बलवती होती है कि ऋषियों, मुनियो तक के लिए कठोर परिश्रम के बाद भी ऐसी इच्छाओ को वश में करना कठिन होता है। आत्म ज्ञान या आत्म साक्षात्कार का पूर्ण ज्ञान होने से वह निरंतर ही समाधि में स्थिर रहता है। जो भगवद्भक्त कृष्ण चेतना में निरंतर भक्ति करता है और आत्म साक्षात्कार में सिद्ध होता है उसे शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए – “मछली, कछुआ तथा पक्षी केवल दृष्टि चिंतन तथा स्पर्श से अपनी सन्तानो को पालते है। हे पद्मज ! मैं भी उसी तरह करता हूँ।” 

 

 

 

इसी प्रकार से भगवद्भक्त भगवद्धाम से दूर स्थिर रहकर स्थित रहकर भी भगवान का चिंतन करके कृष्ण भावनामृत द्वारा उनके धाम पहुंच सकता है। उसे भौतिक क्लेश का अनुभव नहीं होता है। यह जीवन अवस्था ब्रह्म निर्वाण अर्थात भगवान में निरंतर लीन रहने के कारण भौतिक कष्टों का अभाव कहलाती है।

 

 

 

मछली अपने बच्चो को केवल देखकर बड़ा करती है। कछुआ अपने बच्चो को केवल चिंतन द्वारा पालता है। कछुआ तो खुद पानी में रहता है और अपने अंडे स्थल में देता है। जल में रहने के कारण निरंतर अपने अंडो का चिंतन करता रहता है। उसी प्रकार से मनुष्य को भी सदा ईश्वर का चिंतन करना चाहिए। इस प्रकार से हमेशा भगवान का चिंतन करने से मनुष्य हमेशा भगवान के सानिध्य में रहता है और यह क्रिया अंत समय तक बनी रहने के कारण उसे मुक्ति प्राप्त होती है।

 

 

 

 

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