Shivani Novels Free Download Hindi / शिवानी नोवेल्स Pdf Free

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Shivani Novels Free Download Hindi शिवानी नोवेल्स Pdf Free Download

 

 

 

 

 

 

1- अतिथि 

 

2- अपराधिनी 

 

3- मेरी प्रिय कहानियां 

 

 

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ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

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मन को श्री कृष्ण में स्थिर करना – श्री कृष्ण कहते है – जिसे योगी का मन मुझमे स्थिर रहता है वह निश्चय ही दिव्य सुख की सर्वोच्च स्थिति प्राप्त करता है वह रजोगुण से परे हो जाता है। वह परमात्मा के साथ अपनी गुणात्मक एकता को समझता है और इस प्रकार अपने समस्त विगत कर्मो के फल से निवृत्त हो जाता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – ब्रह्मभूत वह अवस्था है जिसमे भौतिक कल्मष से मुक्त होकर भगवान की दिव्य सेवा में स्थित हुआ जाता है। स वै मनः कृष्ण पदारविन्दयोः

 

 

 

 

भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरंतर प्रवृत्त रहना या कृष्ण भावनामृत में रहना वस्तुतः रजोगुण तथा भौतिक कल्मष से मुक्त अवस्था होती है। भगवद्भक्ति लभते पराम् (भगवद्गीता 18. 54) । जब तक मनुष्य का मन भगवान के चरण कमलो में स्थिर नहीं हो जाता है तब तक ब्रह्मरूप में नहीं रह सकता है।

 

 

 

 

28- आत्मसंयमी योगी – श्री कृष्ण कहते है – इस प्रकार से योगाभ्यास में निरंतर लगा रहकर आत्मसंयमी योगी समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है और भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में परम सुख प्राप्त करता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – आत्मसाक्षात्कार का अर्थ है भगवान के संबंध में अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानना। जीव (आत्मा) भगवान का ही अंश है। उसकी स्थिति भगवान की दिव्य सेवा करते रहना है। ब्रह्म के साथ यह सानिध्य ही ब्रह्म संस्पर्श कहलाता है।

 

 

 

 

29- योगी पूर्ण दृष्टा होता है – श्री कृष्ण कहते है – वास्तविक योगी समस्त जीव को मुझको (भगवान को) देखता है निःसंदेह स्वरुप सिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्वर को सर्वत्र देखता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावना भावित योगी पूर्ण दृष्टा होता है क्योंकि वह परमात्मा कृष्ण को हर प्राणी के हृदय में परब्रह्म रूप में देखता है। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति

 

 

 

यद्यपि जीवात्मा भी एक-एक हृदय में विद्यमान है किन्तु वह एक साथ समस्त हृदयो में (सर्वव्यापी) नहीं हो सकता है। अपने परमात्मा रूप में भगवान एक कुत्ते तथा एक ब्राह्मण दोनों के हृदय में स्थित होने से भौतिक रूप से प्रभवित नहीं होते है। यही भगवान की परम निरपेक्षता है।

 

 

 

जो वास्तविक रूप से योगाभ्यास करने वाला नहीं है वह इसे स्पष्ट रूप में नहीं देखता है। एक कृष्ण भावना भावित व्यक्ति कृष्ण को आस्तिक तथा नास्तिक दोनों में देख सकता है।

 

 

 

 

स्मृति में इसकी पुष्टि इस प्रकार से हुई है – आततत्वाच्च मातृत्वाच्च आत्मा हि परमो हरिः। भगवान सभी प्राणियों का श्रोत होने के कारण माता और पालनकर्ता के समान है।

 

 

 

 

जिस प्रकार माता अपने समस्त पुत्रो पर समान भाव रखती है। उसी प्रकार परम पिता (या माता) भी रखता है। फलस्वरूप परमात्मा प्रत्येक जीव के भीतर निवास करता है। आत्मा तथा परमात्मा का यही अंतर है।

 

 

 

भगवान की दो प्रमुख शक्तिया है – पराशक्ति तथा अपराशक्ति। जीव पराशक्ति का अंश होते हुए भी अपराशक्ति शक्ति से बद्ध है। बाह्य रूप से भी प्रत्येक जीव भगवान की शक्ति (भगवद शक्ति) में स्थित है।

 

 

 

 

इसका उल्लेख सातवे अध्याय में होगा। जीव सदा ही भगवान की शक्ति में स्थित है। योगी समदर्शी होता है क्योंकि वह देखता है प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्म फल के अनुसार विभिन्न स्थितियों में रहकर भगवान के दास होते है। प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार भगवान में स्थित रहता है।

 

 

 

अपरा शक्ति में जीव भौतिक इन्द्रियों का दास रहता है। जबकि पराशक्ति में जीव साक्षात् परमेश्वर का दास रहता है। इस प्रकार प्रत्येक अवस्था में जीव परमेश्वर का दास है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति में यह समदृष्टि पूर्ण होती है।

 

 

 

Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है। अतः आपसे निवेदन है कि अगर किसी भी बुक्स, नावेल के अधिकार क्षेत्र से या अन्य किसी भी प्रकार की दिक्कत है तो आप हमें [email protected] पर सूचित करें। हम निश्चित ही उस बुक को हटा लेंगे। 

 

 

 

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