Shiv Tandav Stotram Pdf in Hindi / शिव तांडव स्तोत्र Pdf

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Shiv Tandav Stotram Pdf Hindi / रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र pdf

 

 

 

शिव तांडव स्तोत्र pdf download

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

मिट्टी, पत्थर, स्वर्ण के टुकड़े को समान दृष्टि से देखना – सारे भौतिक कार्यो का परित्याग – भगवान ने अर्जुन के प्रश्नो का उत्तर देते हुए कहा – हे पाण्डुपुत्र ! जो प्रकाश, आसक्ति तथा मोह के उपस्थित होने पर न तो उनसे घृणा करता है और न लुप्त हो जाने पर उनकी इच्छा करता है।

 

 

 

 

जो भौतिक गुणों की इन समस्त प्रतिक्रियाओं से निश्चल तथा अविचलित रहता है और यह जानकर कि केवल गुण ही क्रियाशील है।

 

 

 

 

उदासीन तथा दिव्य बना रहता है। जो अपने आप में स्थित है और सुख तथा दुख को एक समान मानता है। जो मिट्टी के ढेले, पत्थर एवं स्वर्ण के टुकड़े को समान दृष्टि से देखता है।

 

 

 

 

जो अनुकूल तथा प्रतिकूल के प्रति समान बना रहता है जो शत्रु तथा मित्र के साथ समान व्यवहार करता है और जिसने सारे भौतिक कार्यो का परित्याग कर दिया है। ऐसे व्यक्ति को प्रकृति के गुणों से अतीत कहते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जब कोई भी जीव इस संसार में इस भौतिक शरीर से युक्त होकर रहता है। तो यह समझना चाहिए कि वह प्रकृति के तीन गुणों में से किसी एक के वश में है जब वह इस भौतिक शरीर से बाहर जाता है तो वह प्रकृति के गुणों से छूट जाता है।

 

 

 

 

यहां अर्जुन ने भगवान से तीन प्रश्न पूछे है और उन्होंने क्रमशः एक-एक का उत्तर दिया है। इन श्लोको में कृष्ण पहले यह संकेत करते है, जो व्यक्ति दिव्य पर स्थित है।

 

 

 

 

वह न तो किसी से ईर्ष्या करता है और न ही किसी वस्तु की अभिलाषा करता है। जब तक मनुष्य इस भौतिक शरीर के प्रति सचेतन रहता है तब तक वह अपनी इन्द्रियों को तृप्ति करने के लिए कर्म करता है।

 

 

 

 

इस भौतिक शरीर के ममत्व को ख़त्म करने के लिए मनुष्य को उदासीन अवस्था में रहना चाहिए। लेकिन ज्यों ही मनुष्य अपनी चेतना को कृष्ण में स्थानांतरित कर देता है तो इन्द्रिय तृप्ति स्वतः ही रुक जाती है और उसे इस भौतिक शरीर के पालन की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

 

 

 

 

भौतिक पद पर स्थित व्यक्ति को शारीरिक मान-अपमान की चिंता रहती है। वह मान-अपमान के भाव से प्रभावित रहता है। लेकिन दिव्य पद पर स्थित व्यक्ति कभी इस भौतिक मान-अपमान से प्रभावित नहीं होता है।

 

 

 

 

उसके शरीर के भौतिक गुण कार्य करेंगे लेकिन आत्माए से कार्य पृथक रहता है। वह किस तरह पृथक होता है? वह न तो शरीर का भोग करना चाहता है न उससे बाहर जाना चाहता है।

 

 

 

 

इस प्रकार से दिव्य पद पर स्थित भक्त स्वयमेव ही मुक्त अवस्था में पहुंच जाता है। उसे प्रकृति के गुणों से मुक्त होने के लिए किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

 

 

 

 

अर्जुन का अगला प्रश्न दिव्य व्यक्ति के व्यवहार से संबंधित है – ऐसा व्यक्ति कृष्ण भावनामृत में रहकर अपना कर्तव्य पालन करता है और इस बात से व्यर्थ ही चिंताग्रसित नहीं होता है कि अमुक व्यक्ति उसका अपमान कर रहा है या कि सम्मान कर रहा है वह इन सब बातो से परे रहता है।

 

 

 

 

जो बातें कृष्ण भावनामृत में उसके अनुकूल होती है उन्हें स्वीकार करने में जरा भी समय नहीं गवाता है। लेकिन उसे किसी भी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती है चाहे वह वस्तु पत्थर हो या कि सोना।

 

 

 

 

वह समभाव रखता है और सारी वस्तुओ को समान धरातल पर देखता है क्योंकि वह भली प्रकार से समझता है कि उसे इस भौतिक संसार से कुछ भी लेना देना नहीं है।

 

 

 

 

वह प्रत्येक व्यक्ति से जो कृष्ण भावनामृत के सम्पादन में उसकी सहायता करता है उसे अपना मित्र मानता है और वह अपने तथा कथित शत्रु से भी घृणा नहीं करता है।

 

 

 

 

उसे सामाजिक तथा राजनितिक विषय तनिक भी प्रभावित नहीं कर पाते है क्योंकि वह इस भौतिक क्षणिक उथल-पुथल की स्थिति से पूर्ण अवगत रहता है।

 

 

 

 

उसके सारे कर्म कृष्ण के लिए होते है वह कृष्ण के लिए कुछ भी करने को उद्यत रहता है वह अपने लिए कोई कर्म नहीं करता है।

 

 

 

 

उसके सारे प्रयास कृष्ण के लिए होता है। वह अपने लिए कुछ भी प्रयास नहीं करता है। ऐसे आचरण से मनुष्य वास्तव में दिव्य पद पर स्थित हो सकता है।

 

 

 

 

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