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Shiksha Shastra Book Hindi Pdf / शिक्षा शास्त्र की किताब Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Shiksha Shastra Book Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Shiksha Shastra Book Hindi Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Prithvi Nath Pandey Hindi Book Pdf कर सकते हैं।

 

 

 

Shiksha Shastra Book Hindi Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  Shiksha Shastra Book Hindi Pdf
पुस्तक के लेखक  एम. डी. जफर 
भाषा  हिंदी  
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  22.25 Mb 
पृष्ठ  216 
श्रेणी  शिक्षा 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

उसी प्रकार शिव प्रकृति आदि को अपने वश में करके उसपर शासन करते है। उन्होंने सबको वश में कर लिया है इसीलिए वे शिव कहे गए है। शिव ही सर्वज्ञ, निःस्पृह तथा परिपूर्ण है। सर्वज्ञता, अनादि, स्वतंत्रता, तृप्ति, बोध, नित्य अलुप्त शक्ति से संयुक्त होना और अपने अंदर अनंत शक्तियों को धारण करना महेश्वर के इन छः प्रकार के मानसिक ऐश्वर्यो को केवल वेद जानता है।

 

 

 

 

अतः भगवान शंकर के अनुग्रह से ही प्रकृति आदि आठो तत्व वश में होते है। भगवान शंकर का कृपा प्रसाद प्राप्त करने के लिए उन्ही का पूजन करना चाहिए। यदि कहे शिव तो परिपूर्ण है निःस्पृह है उनकी पूजा कैसे हो सकती है? तो इसका उत्तर यह है कि भगवान शंकर के उद्देश्य से उनकी प्रसन्नता के लिए किया हुआ सत्कर्म उनके कृपा प्रसाद को प्राप्त करने वाला होता है।

 

 

 

 

शिव लिंग में शिव की प्रतिमा में तथा शिव भक्त जनो में शिव की भावना करके उनकी प्रसन्नता के लिए पूजा करनी चाहिए। वह पूजन शरीर से, वाणी से, मन से और धन से भी किया जा सकता है। उस पूजा से महेश्वर शिव जो प्रकृति से परे है पूजक पर विशेष कृपा करते है और उनका वह कृपा प्रसाद सत्य होता है।

 

 

 

 

भगवान शंकर की कृपा से कर्म आदि सभी बंधन अपने वश में हो जाते है। कर्म से लेकर प्रकृति पर्यन्त सब कुछ जब वश में हो जाता है तब वह जीव मुक्त कहलाता है और स्वात्माराम रूप से विराजमान होता है। परमेश्वर शिव की कृपा से जब कर्मजनित शरीर अपने वश में हो जाता है।

 

 

 

 

तब भगवान शिव के लोक में निवास का सौभाग्य प्राप्त होता है। इसी को सालोक्य मुक्ति कहते है। जब तन्मात्राये वश में हो जाती है तब जीव जगदंबा सहित भगवान शंकर का सामीप्य प्राप्त कर लेता है। यह सामीप्य मुक्ति है उसके आयुध आदि और क्रिया आदि सब कुछ भगवान शिव के समान हो जाते है।

 

 

 

 

भगवान का महाप्रसाद प्राप्त होने पर बुद्धि भी वश में हो जाती है। बुद्धि प्रकृति का कार्य है। उसका वश में होना सार्ष्टिमुक्ति कहा गया है। पुनः भगवान का महान अनुग्रह प्राप्त होने पर प्रकृति वश में हो जाएगी। उस समय भगवान शंकर का मानसिक ऐश्वर्य बिना यत्न के ही प्राप्त हो जायेगा।

 

 

 

 

सर्वज्ञता और तृप्ति आदि जो शिव के ऐश्वर्य है उन्हें पाकर मुक्त पुरुष अपने आत्मा में ही विराजमान होता है। वेद और शास्त्रों में विश्वास रखने वाले विद्वान पुरुष इसी को सायुज्य मुक्ति कहते है। इस प्रकार लिंग आदि में शिव की पूजा करने से क्रमशः मुक्ति स्वतः प्राप्त हो जाती है।

 

 

 

 

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