Sherlock Holmes Novels In Hindi Pdf / शेरलॉक होल्म्स नॉवेल्स Pdf

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Sherlock Holmes Novels In Hindi Pdf शेरलॉक होल्म्स नॉवेल्स इन हिंदी पीडीऍफ़

 

 

 

 

 

 

 

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कृष्ण भावना भावित सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

Sherlock Holmes Novels In Hindi Pdf

 

 

 

परम भोक्ता (कृष्ण) – कृष्ण कहते है – मुझे समस्त यज्ञो तथा तपस्या का परम भोक्ता, समस्त लोको तथा देवताओ का परमेश्वर, समस्त जीवो का उपकारी एवं हितैषी जानकर मेरे भावनामृत से पूर्ण पुरुष भौतिक दुखो से शांति लाभ करता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – माया के वशीभूत सभी जीव इस संसार में शांति प्राप्त करना चाहते है। किन्तु भगवद्गीता में वर्णित शांति के सूत्रों से वह सदा ही अनभिज्ञ रहते है। शांति का सबसे बड़ा सूत्र यही है कि भगवान कृष्ण समस्त मानवीय कर्मो के भोक्ता है। वेदो में (श्वेताश्वर उपनिषद 6. 7) भगवान को तमीश्वराणा परम महेश्वरम कहा गया है। मनुष्यो को चाहिए कि प्रत्येक वस्तु भगवान की दिव्य सेवा में अर्पित कर दे क्योंकि वही समस्त लोको तथा उनमे रहने वाले देवताओ के स्वामी है। उनसे बड़ा कोई नहीं है। वह बड़े से बड़े देवता, शिव तथा ब्रह्मा से महान है।

 

 

 

 

भगवान कृष्ण परमेश्वर है तथा देवताओ सहित सारे जीव उनके अस्तित्व है। माया के वशीभूत होकर सारे जीव सर्वत्र अपना प्रभुत्व जताना चाहते है। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि सर्वत्र भगवान की माया का ही प्रभुत्व स्थापित है। भगवान प्रकृति (माया) के स्वामी है और बद्ध जीव के ऊपर प्रकृति का बहुत कठोर अनुशासन स्थापित है।

 

 

 

यह पांचवा अध्याय कृष्ण भावनामृत का उदद्योष है जिसे कर्मयोग कहते है। उसकी व्याख्या है – व्यावहारिक रूप में जब तक कोई इन तथ्यों को समझ नहीं लेता तब तक संसार में व्यष्टि या समिष्ट रूप से शांति प्राप्त का भागी नहीं हो सकता है। कृष्ण भावनामृत का यही अर्थ है – भगवान कृष्ण परमेश्वर है तथा देवताओ सहित सारे जीव उनके आश्रित है और वह सबको आश्रय देने वाले है। अतः शांति की कामना करने वाले व्यक्ति को पूर्ण कृष्ण भावनामृत के रस में डूबना ही होगा अथवा पूर्ण रूप से कृष्ण भावना भावित होने पर ही शांति को प्राप्त किया जा सकता है।

 

 

 

यहां पर इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है कि कर्मयोग से मुक्ति किस तरह प्राप्त होती है। कृष्ण भावनामृत में कार्य करने का मतलब है पूर्ण रूप से परमेश्वर के पूर्णज्ञान के साथ कर्म करना। ऐसा कर्म दिव्यज्ञान से भिन्न नहीं होता है। प्रत्यक्ष कृष्ण भावनामृत भक्ति योग है और ज्ञान योग वह पथ है जिसपर चलते हुए भक्ति योग की प्राप्ति होती है।

 

 

 

शुद्ध जीव भगवान के अंश रूप में ईश्वर का शाश्वत दास है। वह माया पर प्रभुत्व जताने की इच्छा से माया के संपर्क में आता है और यही उसके कष्टों का मूल कारण भी है। जब तक जीव पदार्थ के संपर्क में रहता है उसे भौतिक आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए ही कार्य करना पड़ता है। किन्तु कृष्ण भावनामृत उसे पदार्थ की परिधि में रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन में ले आता है क्योंकि भौतिक जगत में भक्ति का अभ्यास करने पर जीव का दिव्य स्वरुप पुनः प्रकट होता है।

 

 

 

 

कृष्ण भावनामृत का अर्थ है – परमेश्वर के साथ अपने संबंध का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके कर्म करना और इस चेतना की पूर्णता का अर्थ है कृष्ण या श्री भगवान का पूर्ण ज्ञान। जो मनुष्य जितना ही भक्ति में प्रगतिशील है वह उतना ही पदार्थ के बंधन से मुक्त रहता है। भगवान किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करते, यह तो कृष्ण भावनामृत के लिए व्यक्तिगत व्यावहारिक कर्तव्यपालन पर निर्भर करता है जिससे मनुष्य की इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करके इच्छा तथा क्रोध के प्रभाव को जीत लेता है।

 

 

 

 

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि के अभ्यास द्वारा धीरे-धीरे प्रगति होती है। भक्ति योग में तो यह प्रस्तावना के स्वरुप है और जो कोई भी अपनी कामेच्छाओं को वश में करके कृष्ण भावनामृत में दृढ रहता है वह ब्रह्म निर्वाण या दिव्य अवस्था को प्राप्त कर लेता है। कृष्ण भावनामृत में अष्टांग योग का स्वतः अभ्यास होता है क्योंकि इसमें अंतिम लक्ष्य की पूर्ति होती है और इसी से मनुष्य को पूर्ण शांति प्राप्त हो सकती है और यही जीवन की परम सिद्धि है।

 

 

 

 

 

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