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Shani Aarti Pdf Hindi / शनि आरती Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Shani Aarti Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Shani Aarti Pdf Hindi download कर सकते हैं और आप यहां से Griha Pravesh puja Samagri list Pdf कर सकते हैं।

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Shani Aarti Pdf Hindi Download

 

 

पुस्तक का नाम  Shani Aarti Pdf Hindi
पुस्तक के लेखक 
साइज  1 Mb 
पृष्ठ 
भाषा  हिंदी 
फॉर्मेट  Pdf 
श्रेणी  धार्मिक 

 

 

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Shani Aarti Pdf Hindi
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

उन्होंने कहा था – दक्षकुमारी प्यारी सती! मैं तुम्हारे सिवा दूसरी किसी स्त्री का अपनी पत्नी बनाने के लिए न वरण करूँगा न ग्रहण। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ। इस प्रकार सती के साथ उन्होंने पहले ही प्रतिज्ञा कर ली है। अब सती के मर जाने पर वे दूसरी किसी स्त्री को कैसे ग्रहण करेंगे?

 

 

 

यह सुनकर नारद ने कहा – महामते! गिरिराज! इस विषय में तुम्हे चिंता नहीं करनी चाहिए। तुम्हारी यह पुत्री काली ही पूर्वकाल में दक्षकन्या सती हुई थी। उस समय इसी का सदा सर्वमंगलदायी सती नाम था। वे सती दक्ष कन्या होकर रूद्र की प्यारी पत्नी हुई थी।

 

 

 

उन्होंने पिता के यज्ञ में अनादर पाकर तथा भगवान शंकर का भी अपमान हुआ देख क्रोधपूर्वक अपने शरीर को त्याग दिया था। वे ही सती फिर तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई है। तुम्हारी पुत्री साक्षात्त जगदंबा शिवा है। यह पार्वती भगवान हर की पत्नी होगी इसमें संशय नहीं है।

 

 

 

नारद! ये सब बातें तुमने हिमवान कको विस्तार पूर्वक बताई। पार्वती का वह पूर्व रूप और चरित्र प्रीति को बढ़ाने वाला है। काली के उस सम्पूर्ण पूर्व वृतांत को तुम्हारे मुख से सुनकर हिमवान अपनी पत्नी और पुत्र के साथ तत्काल संदेह रहित हो गए।

 

 

 

इसी तरह तुम्हारे मुख से अपनी पूर्व कथा को सुनकर काली ने लज्जा के मारे मस्तक झुका लिया और उसके मंद मुस्कान की प्रभा फ़ैल गयी। गिरिराज हिमालय पार्वती के उस चरित्र को सुनकर उसके माथे पर हाथ फेरने लगे और मस्तक सूंघकर उसे अपने आसन के पास ही बिठा लिया।

 

 

 

नारद! इसके पश्चात तुम उसी क्षण प्रसन्नता पूर्वक स्वर्गलोक को चले गए और गिरिराज हिमवान भी मन ही मन मनोहर आनंद से युक्त हो अपने सर्वसम्पत्तिशाली भवन मे प्रविष्ट हो गए। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! जब तुम स्वर्ग लोक को चले गए तब से कुछ काल और व्यतीत हो जाने पर एक दिन मेना ने हिमवान के निकट जाकर उन्हें प्रणाम किया।

 

 

 

फिर खड़ी हो वे गगिरिकामिनी मेना अपने पति से विनयपूर्वक बोली – प्राणनाथ!  उस दिन नारद मुनि ने जो बात कही थी उसको स्त्री स्वभाव के कारण मैंने अच्छी तरह नहीं समझा मेरी तो यह प्रार्थना है कि आप कन्या का विवाह किसी सुंदर वर के साथ कर दीजिए।

 

 

 

वह विवाह सर्वथा अपूर्व सुख देने वाला होगा। गिरिजा का वर शुभ लक्षणों से सम्पन्न और कुलीन होना चाहिए। मेरी बेटी मुझे प्राणो से भी अधिक प्रिय है। वह उत्तम वर पाकर जिस प्रकार भी प्रसन्न और सुखी हो सके वैसा कीजिए। आपको मेरा नमस्कार है।

 

 

 

ऐसा कहकर मेना आपने पति के चरणों में गिर पड़ी। उस समय उनके मुख पर आसुंओ की धारा बह रही थी। प्राज्ञ शिरोमणि हिमवान ने उन्हें उठाया और यथावत समझाना आरंभ किया। देवी मेनके! मैं यथार्थ और तत्व की बात बताता हूँ सुनो।

 

 

 

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