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Shabari Vidya Marathi Pustak Pdf / शाबरी विद्या मराठी पुस्तक Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Shabari Vidya Marathi Pustak Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Shabari Vidya Marathi Pustak Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  बगलामुखी रहस्य बुक Pdf पढ़ सकते हैं।

 

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Shabari Vidya Marathi Pustak Pdf / शाबरी विद्या मराठी पुस्तक पीडीएफ

 

 

 

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Shabari Vidya Marathi Pustak Pdf
शाबरी विद्या मराठी पुस्तक Pdf Download
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Note- इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी पीडीएफ बुक, पीडीएफ फ़ाइल से इस वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है और ना ही इसे हमारे सर्वर पर अपलोड किया गया है।

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

 

श्री रघुनाथ जी के श्याम रंग का सुंदर जल देखकर सारे समाज के साथ ही भरत जी प्रेम बिह्वल होकर विरह रूपी समुद्र में डूबते हुए विवेक रूपी जहाज पर चढ़ गए।

 

 

 

 

वह श्री राम जी की विरह व्यथा से पीड़ित थे फिर उन्हें विवेक रूपी जहाज पर चढ़ते ही ध्यान आया कि जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करेंगे ऐसा सोचकर वह फिर से उत्साहित हो गए।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- उस दिन चलकर यमुना के किनारे निवास किया। समयानुसार सबके खान-पान की सुंदर व्यवस्था हुई। निषाद राज का संकेत मिलते ही रात में ही कई घाट की अगणित नाव वहां आ गई। जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है।

 

 

 

 

2- सबेरे एक साथ में ही सब लोग यमुना के उस पार चले गए और श्री राम जी के सखा निषाद राज की सेवा से संतुष्ट हो गए। फिर स्नान करने के बाद ही निषाद राज के साथ दोनों भाई नदी को सिर नवाकर चले।

 

 

 

 

3- आगे अच्छी सवारियों पर श्रेष्ठ मुनि है। उनके पीछे ही सारा समाज चल रहा है। सबसे पीछे दोनों भाई साधारण वेश में और पैदल ही चल रहे है।

 

 

 

 

4- सेवक मित्र और मंत्री के पुत्र उनके साथ है। वह लोग सीता जी, लक्ष्मण और रघुनाथ जी का स्मरण करते जा रहे है और जहां भी श्री राम जी ने विश्राम किया था वहां प्रेम सहित वह लोग प्रणाम करते है।

 

 

 

गुरु जी से कहकर उन सब को वर्ष भर का भोजन दिए और आदर, दान और विनय से उन्हें वश में करते हुए उनका पारितोष किया। फिर याचको को दान और मान देकर उन्हें संतुष्ट किया तथा मित्रो को पवित्र प्रेम से पवित्र किया।

 

 

 

 

3- फिर दास और दासियो को बुलाया और उन्हें गुरु जी को सौपकर हाथ जोड़कर बोले – हे गुसाई! इन सबकी माता-पिता के समान ही देख-रेख करते रहिएगा।

 

 

 

 

4- श्री राम जी सबसे बार-बार कोमल वाणी में कहते है। मेरा सब प्रकार से हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टा से महान राज सुखी रहे।

 

 

 

 

80- दोहा का अर्थ-

 

 

 

 

हे परम चतुर पुरवासी सज्जनो! आप लोग सब वही उपाय करिए जिससे मेरी सब माता मेरे विरह के दुःख से दुखी न होने पाए।

 

 

 

इस प्रकार श्री राम जी ने सबको समझाते हुए हर्ष के साथ गुरु जी के चरण कमल में सिर नवाकर फिर गणेश जी, पार्वती जी और कैलाशपति महादेव जी को मनाते हुए तथा आशीर्वाद प्राप्त करके चले।

 

 

 

 

2- श्री राम जी के जाते हुए बहुत भारी विषाद हुआ, नगर का आर्तनाद, हाहाकार, सुना नहीं जाता है। लंका में बुरे शकुन होने लगे, अयोध्या में अत्यंत शोक छा गया और देवलोक में सभी हर्ष और विषाद के वश हो गए। हर्ष का कारण यह था कि अब राक्षसों का नाश होगा और विषाद का कारण अयोध्या वासियो का शोक था।

 

 

 

3- मूर्छा दूर होने पर राजा जागे और सुमंत्र को बुलाकर कहने लगे – श्री राम वन को चले गए पर मेरे प्राण नहीं निकल रहे है। न जाने यह किस सुख के लिए इस शरीर में रुके हुए है।

 

 

 

 

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