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Sarvaran comics pdf file download / सर्वरण कॉमिक्स Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Sarvaran comics pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Sarvaran comics pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Sangeet Ki Pustake Pdf कर सकते हैं।

 

 

 

Sarvaran comics pdf Download

 

 

 

 

 

 

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Sarvaran comics pdf
राम रहीम कॉमिक्स Pdf Download
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

एक ही स्त्री के साथ विवाह करके लोक के उत्तम कार्य की सिद्धि करूँगा। अपनी कही हुई इस बात को याद करके आप अपनी ही पूर्व प्रतिज्ञा को पूर्ण कीजिए। स्वामिन! आपका यह आदेश है कि मैं सृष्टि करूँ, श्रीहरि पालन करे और आप स्वयं संहार के हेतु बनकर प्रकट हो सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ता के रूप में प्रकट हुए है।

 

 

 

 

आपके बिना हम दोनों अपना-अपना कार्य करने में समर्थ नहीं है अतः आप एक ऐसी कामिनी को स्वीकार करे जो लोक हित के कार्य में तत्पर रहे। शंभो! जैसे लक्ष्मी विष्णु की और सावित्री मेरी सहधर्मिणी है उसी प्रकार आप इस समय अपनी जीवन सहचरी प्राण वल्लभा को ग्रहण करे।

 

 

 

 

मेरी यह बात सुनकर लोकेश्वर महादेव जी के मुख पर मुसकराहट दौड़ गयी। वे श्रीहरि के सामने मुझसे इस प्रकार बोले – ब्रह्मन! हरे! तुम दोनों हमेशा ही मुझे प्रिय हो। तुम दोनों को देखकर मुझे बड़ा आनंद मिलता है। तुम लोग समस्त देवताओ में श्रेष्ठ तथा त्रिलोकी के स्वामी हो।

 

 

 

 

लोकहित के कार्य में मन लगाए रहने वाले तुम दोनों का वचन मेरी दृष्टि में अत्यंत गौरवपूर्ण है। किन्तु सुरश्रेष्ठ गण! मेरे लिए विवाह करना उचित नहीं होगा क्योंकि मैं तपस्या में संलग्न रहकर हमेशा संसार से विरक्त ही रहता हूँ और योगी के रूप में मेरी प्रसिद्धि है।

 

 

 

 

जो निवृत्ति के सुंदर मार्ग पर स्थित है। अपने आत्मा में ही रमन करता आनंद मानता है जिसका शरीर अवधूत है जो ज्ञानी है आत्मदर्शी और कामना से शून्य है जो भोगो से दूर रहता है तथा जो हमेशा अपवित्र और अमंगलेश्वरधारी है उसे संसार में कामिनी से क्या प्रयोजन है।

 

 

 

 

यह इस समय मुझे बताओ तो सही। मुझे तो हमेशा केवल योग में लगे रहने पर ही आनंद आता है। ज्ञानहीन पुरुष ही योग को छोड़कर भोग को अधिक महत्व देता है। संसार में विवाह करना पराये बंधन में बंधना है। इसे बहुत बड़ा बंधन समझना चाहिए।

 

 

 

 

इसलिए मैं सत्य-सत्य कहता हूँ विवाह के लिए मेरे मन में थोड़ी सी भी अभिरुचि नहीं है आत्मा ही अपना उत्तम अर्थ या स्वार्थ है। उसका भली भांति चिंतन करने के कारण मेरी लौकिक स्वार्थ में प्रवृत्ति नहीं होती। तथापि जगत के हित के लिए तुमने जो कुछ कहा है उसे करूँगा।

 

 

 

 

तुम्हारे वचन को गरिष्ठ मानकर अथवा अपनी कही हुई बात को पूर्ण करने के लिए मैं अवश्य विवाह करूँगा क्योंकि मैं हमेशा भक्तो के वश में रहता हूँ। परन्तु मैं जैसी नारी को प्रिय पत्नी के रूप में ग्रहण करूँगा और जैसी शर्त के साथ करूँगा उसे सुनो।

 

 

 

हरे! ब्रह्मन! मैं जो कुछ कहता हूँ वह सर्वथा उचित ही है। जो नारी मेरे तेज को विभागपूर्वक ग्रहण कर सके जो योगिनी तथा इच्छानुसार रूप धारण करने वाली हो उसी को तुम पत्नी बनाने के लिए मुझे बताओ। जब मैं योग में तत्पर रहूं तब उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा।

 

 

 

 

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