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सरगम बुक इन हिंदी Pdf / Saragam Book in Hindi Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Saragam Book in Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Saragam Book in Hindi Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Cheiro Ank vigyan Pdf कर सकते हैं।

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Saragam Book in Hindi Pdf

 

 

पुस्तक का नाम  Sargam Book in Hindi Pdf
पुस्तक के लेखक  भवानी प्रसाद 
फॉर्मेट  Pdf 
भाषा  हिंदी 
साइज 
पृष्ठ 
श्रेणी  नॉलेज 

 

 

 

सरगम बुक इन हिंदी Pdf Download

 

 

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Saragam Book in Hindi Pdf
Sargam Book in Hindi Pdf Download यहां से करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

नारी पति से ऊँचे आसन पर न बैठे, दुष्ट पुरुष के नजदीक न जाय और पति से कभी कातर वचन न बोले। किसी की निंदा न करे। कलह को दूर से ही त्याग दे। गुरुजनो के नजदीक न तो उच्चस्वर में बोले और न हँसे। तो बाहर से आते पति को तुरंत देख अन्न, जल, भोज्य, वस्तु, पान और वस्त्र आदि से उनकी सेवा करती है।

 

 

 

उनके दोनों चरण दबाती है उनसे मीठे वचन बोलती है तथा प्रियतम के खेद को दूर करने वाले अन्यान्य उपायों से प्रसन्नता पूर्वक उन्हें संतुष्ट करती है। उसने मानो तीनो लोको को तृप्त एवं संतुष्ट कर दिया। पिता भाई और पुत्र परिमित सुख देते है परन्तु पति असीम सुख देता है।

 

 

 

अतः नारी को सदा अपने पति का पूजन आदर सत्कार करना चाहिए। पति ही देवता है, पति ही गुरु है और पति ही धर्म तीर्थ एवं व्रत है इसलिए सबको छोड़कर एक मात्र पति की आराधना करनी चाहिए। जो दुर्बुद्धि नारी अपने पति को त्यागकर एकांत में विचरती है।

 

 

 

वह वृक्ष के खोखले में शयन करने वाली क्रूर उलुकी होती है। जो पराये पुरुष को कटाक्षपूर्ण दृष्टि से देखती है वह ऐंचातानी देखने वाली होती है। जो पति को छोड़कर अकेले मिठाई खाती है वह गांव में सुअरी होती है। जो पति को तू कहकर बोलती है वह गूंगी होती है।

 

 

 

जो सौत से सदा ईर्ष्या रखती है वह दुर्भाग्यवती होती है। जो पति की आँख बचाकर किसी दूसरे पुरुष पर दृष्टि डालती है वह कानी टेढ़े मुंह वाली तथा कुरूपा होती है। जैसे निर्जीव शरीर तत्काल अपवित्र हो जाता है उसी तरह पतिहीना नारी भली भांति स्नान करने पर भी सदा अपवित्र रहती है।

 

 

 

लोक में वह माया धन्य है वह जन्मदाता पिता धन्य है तथा वह पति भी धन्य है जिसके घर में पतिव्रता देवी वास करती है। पतिव्रता के पुण्य से पिता, माता और पति के कुलो की तीन-तीन पीढ़ियों के लोग स्वर्गलोक में सुख भोगते है। जो दुराचारिणी अपना शील भंग कर देती है।

 

 

 

वे अपने माता-पिता और पति तीनो के कुलो को नीचे गिराती है तथा इस लोक और परलोक में भी दुःख भोगती है। पतिव्रता का पैर जहां-जहां पृथ्वी का स्पर्श करता है वहां-वहां की भूमि पापहारिणी तथा परम पावन बन जाती है। भगवान सूर्य, चन्द्रमा तथा वायुदेव भी अपने आपको पवित्र करने के लिए ही पतिव्रता का स्पर्श करते है और किसी दृष्टि से नहीं।

 

 

 

जल भी हमेशा पतिव्रता का स्पर्श करना चाहता है और उसका स्पर्श करके वह अनुभव करता है कि आज मेरी जड़ता का नाश हो गया तथा आज मैं दूसरों को पवित्र करने वाला बन गया। भार्या ही गृहस्थी आश्रम की जड़ है, भार्या ही सुख का मूल है, भार्या से ही धर्म के फल की प्राप्ति होती है तथा भार्या ही संतान की वृद्धि कारण है।

 

 

 

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