5 + Sant Tulsidas Books Pdf Hindi Free / संत श्री तुलसीदास बुक्स फ्री डाउनलोड

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Sant Tulsidas Books Pdf Hindi Free तुलसीदास बुक्स फ्री डाउनलोड 

 

 

 

 

 

1- रामचरित मानस Pdf फ्री डाउनलोड करें

 

2- गीतावली 

 

3- श्री तुलसी संग्रह 

 

4- रामायण पीडीएफ 

 

5- अग्नि परीक्षा 

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

 

अर्जुन का संदेह – अर्जुन कहता है – हे कृष्ण ! यही मेरा संदेह है और मैं आपसे इसे पूर्णतया दूर करने की प्रार्थना कर रहा हूँ। आपके अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं है जो इस संदेह को नाश कर सके।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भूत, वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता है। भगवद्गीता के प्रारम्भ में भगवान ने कहा है कि सारे जीव व्यष्टि रूप में भूतकाल में विद्यमान थे। इस समय विद्यमान है और भवबंधन मुक्त होने पर भविष्य में भी व्यष्टि रूप में बने रहेंगे। इस प्रकर उन्होंने व्यष्टि जीव के भविष्य विषयक प्रश्न का स्पष्टीकरण कर दिया है।

 

 

 

तथा कथित बड़े-बड़े ऋषि तथा दार्शनिक जो प्रकृति की कृपा पर निर्भर रहते है। वह निश्चय ही उनकी (कृष्ण की) समता नहीं कर सकते है। अब अर्जुन असफल योगियों के भविष्य के विषय में जानना चाहता है। कोई न तो कृष्ण के समान है न ही उनसे बढ़कर है अतः समस्त संदेहो का पूरा-पूरा उत्तर पाने के लिए कृष्ण का निर्णय अंतिम तथा पूर्ण है क्योंकि वह भूत वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता है किन्तु उन्हें कोई नहीं जान पाता है। कृष्ण और कृष्ण भावना भावित व्यक्ति ही जान सकते है कि कौन क्या है।

 

 

 

 

40- कल्याणकारी योगी का विनाश संभव नहीं – श्री कृष्ण कहते है – हे पृथा पुत्र ! कल्याण कार्यो में निरत योगी का न तो इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है। हे मित्र भलाई करने वाला कभी बुराई से पराजित नहीं होता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवद्गीता में (1. 5. 17) श्रील नारदमुनि व्यास देव को इस प्रकार उपदेश प्रदान करते है। “यदि कोई समस्त भौतिक आशाओं को त्यागकर भगवान की शरण में जाता है तो इसमें न कोई क्षति होती है न पतन होता है। दूसरी ओर अभक्त जन अपने-अपने व्यवसायों में लगे रहते है फिर भी वह कुछ प्राप्त नहीं कर पाते है।” भौतिक लाभ के लिए अनेक शास्त्रीय तथा लौकिक कार्य है। जीवन में आध्यात्मिक कार्य या उन्नति अर्थात कृष्ण भावनामृत के लिए योगी को समस्त भौतिक कार्य कलापो का परित्याग करना होता है।

 

 

 

शास्त्रों का आदेश है कि यदि कोई स्वधर्म का आचरण नहीं करता है तो उसे पाप फल भोगना पड़ता है। अतः जो दिव्य कार्यो को ठीक से नहीं कर पाता है उसे फल भोगना पड़ता है। कोई यह तर्क कर सकता है कि यदि कृष्ण भावनामृत पूर्ण हो जाए तो इससे सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त हो सकती है किन्तु उस सिद्धि की प्राप्ति नहीं हुई तो भौतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से दोनों प्रकार से मनुष्य को क्षति पहुँचती है।

 

 

 

यहां भागवत पुराण द्वारा आश्वस्त किया जाता है कि असफल योगी को कदापि चिंतन नहीं होना चाहिए, भले ही उसे ठीक से स्वधर्माचरण न करने का फल भोगना पड़े तो भी वह घाटे में नहीं रहता है क्योंकि शुभ कृष्णामृत कभी भी विस्मृत नहीं होता है। जो इस प्रकार से लगा रहता है वह अगले जन्म में निम्नयोनि में जन्म लेने पर भी पहले की भांति भक्ति करता है।

 

 

 

किन्तु जो नियत कर्मो को दृढ़ता पूर्वक करता है और उसके अंदर कृष्ण भावनामृत का अभाव रहता है तो आवश्यक नहीं है कि उसे शुभ फल की प्राप्ति होगी। मानवता के दो विभाग किए जा सकते है। पहला नियमित दूसरा अनियमित। अनियमित विभाग के लोग संस्कृत तथा असंस्कृत, शिक्षित तथा अशिक्षित, बली तथा निर्बल यह सारे लोग पाशविक प्रवृत्तियों से पूर्ण रहते है उनके कार्य भी कल्याणकारी नहीं होते है क्योंकि वह पशुओ की भांति आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन का भोग करते हुए इस संसार में निरंतर रहते है जो सदा ही दुखमय है।

 

 

 

 

जो लोग शास्त्रों में वर्णित कर्तव्य के सिद्धांतो का पालन करते है वह नियमित विभाग में वर्गीकृत होते है। जो कृष्ण भावनामृत को प्राप्त होते है। वह लोग शास्त्रीय आदेश के अनुसार संयमित होकर निश्चित रूप से जीवन में उन्नति करते है।

 

 

 

कल्याण मार्ग के अनुयायियों की तीन श्रेणियाँ होती है।

1- भौतिक सम्पन्नता का उपभोग करने वाले शास्त्रीय विधि के अनुयायी।

2- इस संसार से मुक्ति पाने के लिए प्रयास रत लोग।

3- कृष्ण भावनामृत के भक्त।

प्रथम वर्ग के अनुयायियों को पुनः दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

 

 

 

कोई भी ऐसा कार्य जो परम आत्मसाक्षात्कार का देहात्म बुद्धि से मुक्ति की ओर उन्मुख नहीं होता है वह रंच मात्र भी कल्याण पद नहीं होता है। सकाम कर्मी तथा इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा न रखने वाले लोग – यह अलग-अलग होते है। सकाम कर्मी अपने जीवन में उच्चस्तर तक उठ सकता है यहां तक कि वह स्वर्ग लोक भी जा सकता है। इस संसार से मुक्त नहीं होने के कारण वह सही ढंग से शुभ मार्ग का अनुगमन नहीं करते। जिस मार्ग से मुक्ति प्राप्त हो वही कर्म शुभ होता है।

 

 

 

चूंकि अष्टांगयोग पद्धति कृष्ण भावनामृत की चरम अनुभूति के लिए होती है। अतः यह पद्धति भी कल्याणकारी होती है। कृष्ण भावनामृत संबंधी कार्य ही एक मात्र शुभ कार्य होता है और जो भी कृष्ण भावनामृत के मार्ग पर प्रगति करने के उद्देश्य से स्वेच्छा से समस्त शारीरिक असुविधाओं को स्वीकार करता है। वह घोर तपस्या के कारण पूर्ण योगी कहलाता है। अतः जो कोई इस दिशा में यथाशक्य प्रयास करता है उसे अपने पतन के प्रति भयभीत नहीं होना चाहिए।

 

 

 

 

41- असफल योगी का जन्म – श्री कृष्ण कहते है – असफल योगी पवित्र आत्माओ के लोको में अनेकानेक वर्षो तक भोग करने के बाद या तो सदाचारी पुरुषो के परिवार में या फिर धनवान के कुल में जन्म लेता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – असफल योगी की दो श्रेणियाँ होती है। एक वह जो बहुत थोड़ी उन्नति के बाद ही भ्रष्ट हो जाता है। दूसरे वह होते है जो दीर्घ काल तक योगाभ्यास करने के बाद भ्रष्ट होते है। योगाभ्यास का उद्देश्य वास्तविक रूप से कृष्ण भावनामृत की सर्वोच्चतम सिद्धि प्राप्त करना है। जो योगी अल्पकालिक अभ्यास के बाद भ्रष्ट होता है वह स्वर्ग लोक को जाता है जहां केवल पुण्य आत्माओ को ही प्रविष्ट होने की अनुमति होती है। यहां पर दीर्घावधि बिताने के पश्चात उसे पुनः इस लोक में वापस भेज दिया जाता है। जिससे वह किसी धनवान के घर जीवन बिताने का अवसर प्रदान किया जाता है कि जिससे वह अपनी पूर्व भौतिक इच्छाओ की पूर्ति कर सके। ऐसे परिवार में जन्म लेने वाले इन सुविधाओं का लाभ उठाते हुए अपने आपको पूर्ण कृष्ण भावनामृत की उच्च अवस्था तक ले जाते है।

 

 

 

 

42- दीर्घकालीन योग में असफलता – श्री कृष्ण कहते है – (यदि दीर्घ काल तक योग करने के बाद असफल रहे तो) वह ऐसे योगी के कुल में जन्म लेता है जो अतिबुद्धिमान है। निश्चय ही इस संसार में ऐसा जन्म दुर्लभ होता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर योगियों के कुल में जन्म लेने की प्रशंसा की गई है क्योंकि ऐसे कुल में उत्पन्न बालक को प्रारम्भ से ही आध्यात्मिक प्रोत्साहन प्राप्त होता है। ऐसे कुल अत्यंत विद्वान होते है। परंपरा तथा प्रशिक्षण के कारण श्रद्धावान होते है। इस प्रकार वह गुरु बनते है, विशेषतया आचार्यो तथा गोस्वामी के कुल में ऐसी परिस्थित है। भारत में ऐसे अनेक आचार्य कुल है किन्तु अब वह अपर्याप्त विद्या तथा प्रशिक्षण के कारण पतनशील हो गए है।

 

 

 

ऐसे विद्वान परिवार में जन्म लेना सचमुच ही अत्यंत सौभाग्य की बात है। भगवद्कृपा से अभी भी कुछ ऐसे परिवार है जहां पीढ़ी दर पीढ़ी योगियों को पश्रय प्राप्त होता है। सौभाग्य वश हमारे गुरु विष्णु पाद श्री श्रीमद्भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज को तथा स्वयं हमे भी ऐसे परिवारों में जन्म लेने का अवसर प्राप्त हुआ। हम दोनों को बचपन से ही भगवद्गीता करने का प्रशिक्षण दिया गया। बाद में दिव्य व्यवस्था के अनुसार हमारी उनसे भेट संभव हुई।

 

 

 

Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है। अतः आपसे निवेदन है कि अगर किसी भी बुक्स, नावेल के अधिकार क्षेत्र से या अन्य किसी भी प्रकार की दिक्कत है तो आप हमें [email protected] पर सूचित करें। हम निश्चित ही उस बुक को हटा लेंगे। 

 

 

 

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