Advertisements

Sanskrit Bharti Book Pdf / संस्कृत भारती बुक Pdf

Advertisements

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Sanskrit Bharti Book Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Sanskrit Bharti Book Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Harivansh Puran Pdf Download कर सकते हैं।

 

 

 

Sanskrit Bharti Book Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम Sanskrit Bharti Book Pdf
पुस्तक के लेखक 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  5 Mb 
पृष्ठ  128 
भाषा  संस्कृत 
श्रेणी 

 

 

 

Advertisements
Sanskrit Bharti Book Pdf
Sanskrit Bharti Book Pdf यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

Advertisements
Sanskrit Bharti Book Pdf
Bihar Ek Parichay Pdf यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

 

 

 

Note- इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी पीडीएफ बुक, पीडीएफ फ़ाइल से इस वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है और ना ही इसे हमारे सर्वर पर अपलोड किया गया है।

 

 

 

यह मात्र पाठको की सहायता के लिये इंटरनेट पर मौजूद ओपन सोर्स से लिया गया है। अगर किसी को इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी Pdf Books से कोई भी परेशानी हो तो हमें [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं, हम तुरंत ही उस पोस्ट को अपनी वेबसाइट से हटा देंगे।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

शिव भक्त शिव मंत्र रूप होने के कारण शिव के ही स्वरुप है। जो सोलह उपचारो से उनकी पूजा करता है उसे अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। जो शिव लिंगोपासक शिव भक्त की सेवा आदि करके उसे आनंद प्रदान करता है। उस विद्वान पर भगवान शंकर बड़े प्रसन्न होते है।

 

 

 

 

दस, पांच या सौ सपत्नीक शिव भक्तो को बुलाकर भोजन आदि के द्वारा पत्नी सहित उनका सदैव समादर करे। देह में, धन में और मंत्र में शिव भावना रखते हुए उन्हें शिव और शक्ति का स्वरुप जानकर निष्कपट भाव से उनकी पूजा करे। ऐसा करने वाला पुरुष इस भूतल पर फिर जन्म नहीं लेता।

 

 

 

 

ऋषि बोले – सर्वज्ञो में श्रेष्ठ सूत जी! बंधन और मोक्ष का स्वरुप क्या है? यह हमे बताइये। सूत जी ने कहा – महर्षियो! मैं मोक्ष और बंधन का स्वरुप तथा मोक्ष के उपाय का वर्णन करूँगा। तुम लोग आदरपूर्वक सुनो। जो प्रकृति आदि आठ बंधनो से बंधा हुआ है।

 

 

 

 

वह जीव बद्ध कहलाता है और जो उन आठो बंधनो से छूटा हुआ है उसे मुक्त कहते है। प्रकृति आदि को वश में कर लेना मोक्ष कहलाता है। बंधन आगंतुक है और मोक्ष स्वतः सिद्ध है। वह जीव जब बंधन से मुक्त हो जाता है तब उसे मुक्त जीव कहते है।

 

 

 

 

बुद्धि, प्रकृति, त्रिगुणात्मक अहंकार और पांच तन्मात्राये इन्हे ज्ञानी पुरुष प्रकृत्याद्यष्टक मानते है। प्रकृति आदि आठ तत्वों के समूह से देह की उत्पत्ति हुई है। देह से कर्म उत्पन्न होता है और फिर कर्म से नूतन देह की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार बारंबार जन्म और कर्म होते रहते है।

 

 

 

 

शरीर को स्थूल, कारण और सूक्ष्म के भेद से तीन प्रकार का जानना चाहिए। स्थूल शरीर व्यापार करने वाला, सूक्ष्म शरीर इन्द्रिय योग प्रदान करने वाला तथा कारण शरीर आत्मानंद की अनुभूति कराने वाला कहा गया है। जीव को उसके प्रारब्ध कर्मानुसार दुःख सुख प्राप्त होते है।

 

 

 

 

वह अपने पुण्य कर्मो के फलस्वरूप सुख और पाप कर्मो के फलस्वरूप दुःख का उपभोग करता है। अतः कर्म पाश से बाँधा हुआ जीव अपने त्रिविधि शरीर से होने वाले शुभाशुभ कर्मो द्वारा हमेशा चक्र की भांति बारंबार घुमाया जाता है। इस चक्रवत भ्रमण की निवृत्ति के लिए चक्रकर्ता का स्तवन एवं आराधन करना चाहिए।

 

 

 

 

प्रकृति आदि आठ पाश जो बताये गए है उनका समुदाय ही महाचक्र है और जो प्रकृति से परे है वह परमात्मा शिव है। भगवान महेश्वर ही प्रकृति आदि महाचक्र के कर्ता है क्योंकि वे प्रकृति से परे है। जैसे बकायन नामक वृक्ष का थाला जल को पीता और उगलता है।

 

 

 

 

मित्रों यह पोस्ट Sanskrit Bharti Book Pdf आपको कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में जरूर बतायें और Sanskrit Bharti Book Pdf की तरह की पोस्ट के लिये इस ब्लॉग को सब्सक्राइब जरूर करें और इसे शेयर भी करें।

 

 

 

Leave a Comment

error: Content is protected !!