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Rudri Path Pdf Hindi Free Download /

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नमस्कार मित्रों, आज इस पोस्ट में हम आपको Rudri Path Pdf Hindi दे रहे हैं। आप नीचे की लिंक से Rudri Path Pdf फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

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Rudri Path Pdf Hindi Free

 

 

 

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सरल रुद्राष्टाध्यायी Pdf Download
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Rudri Path Pdf Hindi Free Download
संपूर्ण रुद्री पाठ Pdf Free Download
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Hanuman Chalisa in Bengali Pdf Free Download 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

ईश्वरीय जीवन का पथ-(सत्य को समझना) – श्री कृष्ण कहते है – यह आध्यात्मिक तथा ईश्वरीय जीवन का पथ है। जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता है यदि कोई जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह से स्थित हो तो वह भगवद्धाम में प्रवेश कर सकता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – मनुष्य कृष्ण भावनामृत या दिव्य जीवन को एक क्षण में प्राप्त कर सकता है और हो सकता है लाखो जन्मो के बाद भी प्राप्त न हो, यह तो सत्य को समझने और स्वीकार करने की बात है। खटवांग महाराज ने अपनी मृत्यु के कुछ मिनट पूर्व ही कृष्ण के शरणागत होकर ऐसी जीवन अवस्था प्राप्त कर ली थी। निर्वाण का अर्थ है – भौतिकतावादी जीवन शैली का अंत। इस जीवन अंत होने से पूर्व कोई कृष्ण भावनाभावित हो जाता है तब उसे तुरंत ही ब्रह्म निर्माण अवस्था प्राप्त हो जाती है। भगवद्धाम और भगवद्भक्ति के बीच कोई भी अंतर नहीं होता है।

 

 

 

 

जीवन दर्शन के अनुसार इस भौतिक जीवन के पूरा होने पर केवल शून्य ही शेष रहता है किन्तु भगवद्गीता की शिक्षा इससे भिन्न शिक्षा प्रदान करती है। वास्तविक जीवन का शुभारंभ इस भौतिक जीवन के पूरा होने के बाद ही शुरू होता है। स्थूल भौतिकतावादी के लिए यह जानना पर्याप्त होगा कि इस भौतिक जीवन का अंत निश्चित है, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नतशील व्यक्तियों के लिए इस जीवन के बाद ही अन्य जीवन प्रारंभ होता है।

 

 

 

 

भगवद्धाम और भगवद्भक्ति दोनों ही परम पद है, अतः भगवान की दिव्या प्रेमाभक्ति में व्यस्त रहने का अर्थ है – भगवद्धाम को प्राप्त करना। भौतिक जगत में इन्द्रिय विषयक कार्य होते है और आध्यात्मिक जगत में कृष्ण भावनामृत विषयक कार्य को प्राथमिकता प्रदान की जाती है। इसी जीवन में ही कृष्ण भावनामृत की प्राप्ति तत्काल ब्रह्म प्राप्ति जैसी है और जो भी कृष्ण भावनामृत में स्थित होता है। वह निश्चित ही पहले से ही भगवद्धाम में प्रवेश कर चुका होता है।

 

 

 

 

भगवद्गीता में भगवद्भक्ति को मुक्त अवस्था माना गया है (सगुणान्समती त्यैतान ब्रह्म भूयाय कल्पते) ब्रह्म और भौतिक पदार्थ दोनों एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते है। अतः ब्राह्मी स्थिति का अर्थ है “भौतिक कार्यो के पद पर न होना” अतः ब्राह्मी स्थिति भौतिक कार्यो से मुक्ति है। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने भगवद्गीता के इस द्वितीय अध्याय को सम्पूर्ण ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषय के रूप में संक्षिप्त किया है। भगवद्गीता के प्रतिपाद्य है – कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग। इस द्वितीय अध्याय में कर्मयोग तथा ज्ञानयोग की स्पष्ट व्याख्या हुई है एवं भक्तियोग की भी झांकी दे दी गयी है।

 

 

 

 

 

 

 

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