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Sampurn Gurucharitra Pdf Hindi / संपूर्ण गुरुचरित्र Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Sampurn Gurucharitra Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Sampurn Gurucharitra Pdf Hindi कर सकते हैं और आप यहां से Shiv Puran Katha Hindi Mein Pdf कर सकते हैं।

 

 

 

Sampurn Gurucharitra Pdf Hindi Download

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

विद्वान पुरुष को चाहिए कि वहां तीर्थ जल से देवता आदि का स्नानांग तर्पण भी करे। इसके बाद धौतवस्त्र लेकर पांच कच्छ करके उसे धारण करे। साथ ही कोई उत्तरीय भी धारण कर ले क्योंकि संध्या वंदन आदि सभी कर्मो में उसकी आवश्यकता होती है।

 

 

 

 

नदी और तीर्थो में स्नान करने पर स्नान संबंधी उतारे हुए वस्त्र को वहां न धोये। स्नान के पश्चात विद्वान पुरुष भीगे हुए उस वस्त्र को बावड़ी में, कुए के पास अथवा घर आदि में ले जाए और वहां पत्थर पर, लकड़ी आदि पर, स्थल में या जल में अच्छी तरह धोकर उस वस्त्र को निचोड़े।

 

 

 

 

द्विजो! वस्त्र को निचोड़ने से जो जल गिरता है वह एक श्रेणी के पितरो की तृप्ति के लिए होता है। इसके बाद जाबालि उपनिषद में बताये गए मंत्र से भस्म लेकर उसके द्वारा त्रिपुण्ड्र लगाए। इस विधि का पालन न किया जाय। इसके पहले ही अगर जल में भस्म गिर जाय तो गिराने वाला नरक में जाता है।

 

 

 

 

इत्यादि मंत्र से पाप शांति के लिए सिर पर जल छिड़के तथा इस मंत्र को पढ़कर पैर पर जल छिड़के। इसे सन्धिप्रोक्षण कहते है। मंत्र में तीन ऋचाये है और प्रत्येक ऋचा में गायत्री छंद के तीन-तीन चरण है। इनमे से पहले ऋचा के तीन चरणों का पाठ करते हुए क्रमशः पैर, हृदय और मस्तक में जल छिड़के।

 

 

 

 

दूसरी ऋचा के तीन चरणों को पढ़कर क्रमशः हृदय, मस्तक और पैर में जल छिड़के तथा तीसरी ऋचा के तीन चरणों का पाठ करते हुए क्रमशः मस्तक, पैर और हृदय का जल से प्रोक्षण करे। इसे विद्वान पुरुष मंत्र स्नान मानते है। किसी अपवित्र वस्तु से किंचित स्पर्श हो जाने पर अपना स्वास्थ्य ठीक न रहने पर राजा और राष्ट्र पर भय उपस्थित होने पर तथा यात्रा काल में जल की उपलब्धि न होने की विवशता आ जाने पर मंत्र स्नान करना चाहिए।

 

 

 

 

प्रातःकाल सूर्यानुवाक से तथा सायंकाल अग्नि संबंधी अनुवाक से जल का आचमन करके पुनः जल से अपने अंगो का प्रोक्षण करे। मध्यान्हकाल में भी इस मंत्र से आचमन करके पूर्ववत प्रोक्षण या पार्जन करना चाहिए। प्रातःकाल की सन्ध्योपासना में गायत्री मंत्र का जप करके तीन बार ऊपर की ओर सूर्यदेव को अर्घ्य देने चाहिए।

 

 

 

 

ब्राह्मणो! मध्यान्हकाल में गायत्री मंत्र के उच्चारण पूर्वक सूर्य को एक ही अर्घ्य देना चाहिए। फिर सायंकाल आने पर पश्चिम की ओर मुख करके बैठ जाय और धरती पर ही सूर्य के लिए अर्घ्य दे ऊपर की ओर नहीं। प्रातःकाल और मध्यान्ह के समय अंजली में अर्घ्य जल लेकर अंगुलियों की ओर से सूर्यदेव के लिए अर्घ्य दे।

 

 

 

 

फिर अंगुलियों के छिद्र से ढलते हुए सूर्य को देखे तथा उनके लिए स्वतः प्रदक्षिणा करके शुद्ध आचमन करे। सायंकाल में सूर्यास्त से दो घड़ी पहले की हुई संध्या निष्फल होती है क्योंकि वह सायंकाल संध्या का समय नहीं है। ठीक समय पर संध्या करनी चाहिए ऐसी शास्त्र की आज्ञा है।

 

 

 

 

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