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Sadhana Se Siddhi Pdf / साधना से सिद्धि Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Sadhana Se Siddhi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Sadhana Se Siddhi Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Ank Jyotish Ki Kitab Pdf भी पढ़ सकते हैं।

 

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Sadhana Se Siddhi Pdf / साधना से सिद्धि पीडीऍफ़ 

 

 

 

साधना से सिद्धि पीडीएफ डाउनलोड 

 

 

 

 

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Sadhana Se Siddhi Pdf
Sadhana Se Siddhi Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

अरे राजा के बालक! तू अपने माता-पिता को सोच के वश में मत डाल, मेरा यह फरसा बड़ा भयानक है, यह गर्भ के बच्चो का भी नाश करने वाला है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- लक्ष्मण जी हंसकर कोमल वाणी से बोले – अहो! मुनीश्वर आप अपने को बड़ा भारी योद्धा समझते है, आप बार-बार मुझे कुल्हाड़ी दिखाते हुए फूंक से पहाड़ उड़ाना चाहते है।

 

 

 

2- यहां कोई कुम्हड़े का छोटा फल (बतिया) नहीं है जो आपकी तर्जनी अंगुली को देखते ही मर जायेगा। आप मुझे कुठार और धनुष बाण को देखकर ही मैंने कुछ अभिमान सहित कहा था।

 

 

 

3- भृगु मुनि के वंश में उत्पन्न होने वाला भृगुसुत समझकर और आपका यज्ञोपवीत देखकर, आप जो कुछ भी कहते है उसे मैं अपना क्रोध रोककर सहन करता हूँ, देवता, ब्राह्मण, गौ और भगवान के भक्तो पर हमारे कुल में इन सबके ऊपर वीरता नहीं दिखाई जाती है।

 

 

 

4- क्योंकि इन्हे मारने से पाप लगता है और इनसे हारने पर कीर्ति का विनाश हो जाता है। यदि आप मारते है तो भी आपके पैर ही पड़ने चाहिए। आपका एक-एक वचन तो करोडो वज्रो के समान है। आप तो धनु और कुठार व्यर्थ में ही धारण करते है।

 

 

 

 

273- दोहा का अर्थ-

 

 

 

आपके पास मैंने धनु, कुठार देखकर यदि मैंने कुछ अनुचित कह दिया हो तो, हे धीर महामुनि! उसे क्षमा करिये। लक्ष्मण की यह बात सुनकर परशुराम जी क्रोध के साथ गंभीर वाणी से बोले।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- हे विश्वामित्र सुनो! यह बालक तो बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, यह काल के वस होकर अपने कुल का घातक बन रहा है। यह सूर्यवंश में चन्द्रमा रूपी कलंक है, यह बिलकुल उदंड, मुर्ख और निडर है।

 

 

 

2- यह अभी क्षण भर में काल का ग्रास बन जायेगा। मैं पुकार कर कहे देता हूँ, फिर मुझे कोई दोष नहीं देना। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो तो हमारा क्रोध, बल, प्रताप, बतलाकर इसे मना कर दो।

 

 

 

3- तभी लक्ष्मण जी परशुराम रूपी अग्नि में अपनी वाणी रूपी घी डालते हुए कहा – हे मुनि! आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है? आप ने अपनी करनी को अपने मुंह से अनेको बार बहुत प्रकार से वर्णन की है।

 

 

 

4- अगर इतने पर भी संतोष नहीं हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिए। आप अपने क्रोध को रोककर असह्य दुःख क्यों सहते है। आप तो वीरता का व्रत धारण करते है, क्षोभ रहित और धैर्यवान है, आप गाली देते हुए शोभा नहीं पाते है।

 

 

 

 

274- दोहा का अर्थ-

 

 

 

शूरवीर तो युद्ध में वीरता का कार्य करते है कहते हुए अपने को बताते नहीं है। युद्ध में शत्रु को उपस्थित पाकर अपने प्रताप की डींग तो कायर ही मारा करते है।

 

 

 

 

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