Rudrashtadhyayi Pdf Free Download / Rudri Path Free Pdf Download

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रुद्री पाठ Pdf Free Download

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

अनासक्त कर्म – श्री कृष्ण कहते है – जो पुरुष अपने कर्तव्य के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन, वही सन्यासी और असली योगी है, वह नही जो न तो अग्नि जलाता है न कर्म करता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां भगवान बताते है कि अष्टांग योग पद्धति मन तथा इन्द्रियों को वश में करने के लिए साधन है। किन्तु इस कलयुग में सामान्य जनता के लिए इसे संपन्न करना बहुत कठिन है। यद्यपि इस अध्याय में अष्टांग योग पद्धति की संस्तुति की गई है। किन्तु भगवान बल देते है कि कर्म योग या कृष्ण भावनामृत में कर्म करना इससे श्रेष्ठ विधि है।

 

 

 

पूर्णता की कसौटी है – कृष्ण भावनामृत में कर्म करना, कर्म के फलो का भोग करने के उद्देश्य से नहीं। कृष्ण भावनामृत में कर्म करना सब मनुष्यो का परम कर्तव्य है क्योंकि सब लोग परमेश्वर के अंश है। इस संसार में प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए और अपनी वस्तुओ की रक्षा के लिए कर्म करता है किन्तु कोई मनुष्य बिना स्वार्थ के कर्म नहीं करता। वह स्वार्थ आत्मकेंद्रित हो या व्यापक।

 

 

 

 

 

शरीर के अंग पूरे शरीर के लिए ही कार्य करते है। शरीर के अंग शरीर तुष्टि के लिए कार्य करते है न कि अपनी तुष्टि के लिए। इसी तरह से जीव जब अपनी तुष्टि के लिए नहीं परब्रह्म की तुष्टि के लिए कार्य करता है तब वह पूर्ण सन्यासी या पूर्णयोगी होता है।

 

 

 

 

कभी-कभी सन्यासी सोचते है कि उन्हें सारे कार्यो से मुक्ति प्राप्त हो गई अतः वह अग्निहोत्र यज्ञ करना देते है लेकिन वह स्वार्थी होते है। उनका कार्य तो निराकार ब्रह्म से तादात्म अस्थापित करना होता है। जो योगी समस्त कर्म बंद करके अर्ध निमीलित नेत्रों से योगाभ्यास करता है वह ही आत्म संतुष्टि की इच्छा से से पूरित होता है। ऐसी इच्छा भौतिक इच्छा से तो श्रेष्ठ है किन्तु स्वार्थ से रहित कदापि नहीं होती है।

 

 

 

 

कृष्ण भावना भवित व्यक्ति को कभी भी आत्मसंतुष्टि की इच्छा नहीं होती है किन्तु कृष्ण भावना भावित व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के पूर्ण ब्रह्म की तुष्टि के लिए कर्म करता है। उसक एक मात्र लक्ष्य कृष्ण की प्रसन्नता होता है। उसे ही पूर्ण योगी या पूर्ण सन्यासी कहा जाता है।

 

 

 

त्याग के सर्वोच्च प्रतीक भगवान चैतन्य प्रार्थना करते है – हे सर्व शक्तिमान प्रभु ! मुझे न तो धन संग्रह की की कामना है, न ही मुझे अनुयायियों की कामना है। मैं तो जन्म जन्मांतर आपकी प्रेमाभक्ति की अहैतुकी कृपा का अभिलाषी हूँ।

 

 

 

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