Rich Dad Poor Dad Hindi Pdf / रिच डैड पुअर डैड Pdf Hindi

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अव्यक्त प्रकृति (शाश्वत) – भगवान कहते है – हे अर्जुन सुनो ! प्रकृति के अलावा एक अव्यक्त प्रकृति है जो शाश्वत है और इस व्यक्त तथा अव्यक्त पदार्थ से परे है। यह परा (श्रेष्ठ) कभी नाश न होने वाली है। जब इस संसार का सब कुछ लय हो जाता है तब भी उसका नाश नहीं होता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण की परा शक्ति भौतिक गुण के सर्वथा विपरीत है, परा तथा अपरा प्रकृति की व्याख्या सातवे अध्याय में हो चुकी है।

 

 

 

कृष्ण परा शक्ति दिव तथा शाश्वत है, यह उस भौतिक प्रकृति के समस्त परिवर्तनों से परे होती है, जो ब्रह्मा के दिन के समय व्यक्त और रात्रि के समय विनष्ट होती रहती है।

 

 

 

 

21- परम गंतव्य (अविनाशी) – श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है – जिसे वेदांती अप्रकट तथा अविनाशी बताते है, जो परम गंतव्य है, जिसे प्राप्त कर लेने पर कोई वापस नहीं आता वही मेरा परम धाम है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अपने निजी धाम गोलोक वृन्दावन का संकेत मात्र करते है, जो आध्यात्मिक जगत में सर्वश्रेष्ठ लोक है।

 

 

 

 

इसका विशद वृतांत “ब्रह्म संहिता” में मिलता है। वैदिक ग्रंथ (कठोपनिषद 1,3,11) बताते है कि भगवान का धाम सर्वश्रेष्ठ है और यही परम धाम है।

 

 

 

एक बार वहां पहुंचकर फिर से इस भौतिक संसार में आना नहीं होता है। ब्रह्म संहिता में भगवान कृष्ण के परम धाम को चिंतामणि धाम कहा गया है, जो ऐसा स्थान है जहां जीवात्मा की सारी इच्छाए पूरी होती है। भगवान कृष्ण का परम धाम गोलोक वृन्दावन कहलाता है और यह पारस मणि से निर्मित प्रासादों से युक्त है।

 

 

 

 

भगवान का दिव्य स्वरुप समस्त लोको में सर्वाधिक आकर्षक है, उनके नेत्र कमलदलों के समान है, उनका शरीर मेघवर्ण (श्यामरंग) के समान है, वह इतने रूपवान है कि उनका सौंदर्य हजारो कामदेवों को भी मात करता है।

 

 

 

भगवान के धाम में सुंदर-सुंदर वृक्ष है जिन्हे कल्पतरु कहा जाता है जो इच्छा होने पर किसी भी तरह का खाद्य पदार्थ प्रदान कर सकते है।

 

 

 

 

वहां गौए भी है जिन्हे सुरभि गौए कहा जाता है और वह अत्यंत दुग्ध देने वाली है, इस धाम में भगवान की सेवा के लिए लाखो लक्ष्मिया है वह आदि भगवान गोविन्द ही समस्त कारणों के कारण कहलाते है।

 

 

 

 

कृष्ण का परम धाम तथा कृष्ण स्वयं अभिन्न है क्योंकि वह दोनों एक से गुण वाले है आध्यात्मिक आकाश में स्थित इस गोलोक वृन्दावन की प्रतिकृति (वृन्दावन) इस पृथ्वी पर दिल्ली से 90 मील दक्षिण-पूर्व स्थित है।

 

 

 

 

जब कृष्ण ने इस पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया था तो उन्होंने इसी भूमि पर जिसे वृन्दावन कहते है और जो भारत के मथुरा जिले के चौरासी वर्गमील में फैला हुआ है। वही पर श्री कृष्ण ने क्रीड़ा (लीला) किया था।

 

 

 

 

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