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Ravidas Ramayan Pdf in Hindi / रविदास रामायण pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Ravidas Ramayan Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Ravidas Ramayan Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से डा.भीमराव आंबेडकर बुक्स भी पढ़ सकते हैं।

 

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Ravidas Ramayan Pdf / रविदास रामायण पीडीऍफ़ 

 

 

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Ravidas Ramayan Pdf in Hindi
डा.भीमराव आंबेडकर बुक्स
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Ravidas Ramayan Pdf in Hindi
रविदास रामायण पीडीएफ डाउनलोड 
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Ravidas Ramayan Pdf in Hindi
Ravidas ji ki Bani Book Pdf Download
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

उस समय यह परम मंगल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। जैसे चन्द्रमा को देखकर समुद्र लहरों का विलास ‘आनंद’ सुशोभित होता है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

1- सबसे पहले रनिवास में जाकर इस समाचार को जिसने सुनाया, उसे बहुत सारा वस्त्र और आभूषण प्राप्त हुआ। सभी रानियां प्रेम से पुलकित हो उठी। वह सब मंगल कलश सजाते हुए प्रेम में मग्न हो गई।

 

 

 

 

2- सुमित्रा जी ने बहुत प्रकार से सुंदर चौक बनाये जो सुंदर मणियों से सुशोभित हो रहे थे। आनंद मग्न होकर श्री राम जी की माता कौशल्या ने ब्राह्मणो को बुलाकर बहुत दान दिए।

 

 

 

 

3- उन्होंने ग्राम देवियो, देवताओ और नागों की पूजा की और भेट देने को कहा था अर्थात कार्य पूर्ण होने पर पूजा करुँगी ऐसा कहा और प्रार्थना करते हुए कहा कि जिस प्रकार से श्री राम जी का सर्व कल्याण हो वही वरदान दीजिए।

 

 

 

 

4- जिनकी वाणी कोयल के समान थी, आँखे हिरण के बच्चे की भांति थी, चन्द्रमा के समान सुंदर मुख वाली स्त्रियां मंगलगान करने लगी।

 

 

 

 

8- दोहा का अर्थ-

 

 

 

श्री राम जी के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर सब स्त्री-पुरुष हर्षित हो उठे और विधाता को अपने अनुकूल समझकर सब लोग सुंदर मंगल साज सजाने लगे।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

 

1- तब राजा ने वशिष्ठ जी को बुलाया और समयोचित उपदेश, शिक्षा देने के लिए उन्हें श्री राम जी के महल भेज दिया। गुरु का आगमन सुनते ही श्री राम जी ने दरवाजे पर आकर उनके चरणों में मस्तक नवाया।

 

 

 

 

2- आदर पूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घर में लाये और षोडशोपचार से पूजा करते हुए उनका सम्मान किया। सीता जी के साथ उन्होंने गुरु का चरण स्पर्श किया और कमल के समान अपने दोनों हाथो को जोड़कर श्री राम जी बोले।

 

 

 

3- यद्यपि सेवक के घर स्वामी का पधारना शुभ मंगल मूल होता है और अमंगल का नाश करता है। तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेम पूर्वक दास को ही कार्य के लिए बुला लेते। ऐसी नीति है।

 

 

 

 

4- परन्तु प्रभु, आपने प्रभुता का त्याग करते हुए स्वयं यहां पधार कर जो स्नेह किया है, उससे यह घर परम पावन हो गया है। हे गोसाई! अब आपकी जो आज्ञा हो मैं वही करू। स्वामी की सेवा में ही सेवक का सदा सर्वदा लाभ रहता है।

 

 

 

 

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