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Ravan Samhita Pdf Hindi Free Download / रावण संहिता पीडीएफ

मित्रों इस पोस्ट में Ravan Samhita Pdf Hindi दिया जा है। आप नीचे की लिंक से Ravan Samhita Pdf Hindi Free Download कर सकते हैं।

 

 

 

Ravan Samhita Hindi Pdf Free रावण संहिता के बारे में 

 

 

 

 

 

 

रावण संहिता रावण की ज्योतिष विद्या के बारे में बताया गया है। अगर कोई रावण संहिता में दी गई ज्योतिषीय विद्यायो को सिद्ध कर ले तो निश्चय ही वह सर्वविजयी हो जायेगा। रावण संहिता लंका पति रावण द्वारा स्वरचित है, उसमे रावण की गूढ़ विद्याओ का उल्लेख है।

 

 

 

 

लंकापति रावण परम विद्वान थे। रावण ऋषि विश्रवा और राक्षस राज सुमाली की पुत्री कैकसी के पुत्र थे। रावण के पिता विश्रवा एक महान और विद्वान ऋषि थे। इस तरह से रावण पहले तो ब्राह्मण हुए और उसके बाद वे राक्षस कुल में हुए।

 

 

 

रावण भगवान श्री शिवशंकर के अनन्य भक्त थे। उनके भक्ति की चर्चाए आज भी की जाती है। रावण परम बलशाली थे। रावण को भगवान ब्रह्मा तथा अन्य देवी देवताओ से तमाम शक्तिया प्राप्त थी और इसीलिए उसे घमंड हो गया और इसी अभिमान में वह घोर अत्याचार करने लगे और जब-जब अत्याचार अपने उच्च स्तर पर पहुंचता है उसका और जिसके द्वारा अत्याचार किया जाता है उसका सर्वनाश निश्चित ही है और वही हुआ रावण का भी भगवान राम के हाथो नाश हुआ।

 

 

 

 

रावण को तमाम विद्याओ का ज्ञान था और रावण संहिता में इन्ही सब बातों का जिक्र है। रावण संहिता में “विल्वपत्र” का विशेष महत्व बताया गया है और रावण संहिता के अध्याय 4 में विल्वपत्र के बारे में विस्तार से उल्लेख है। उसमे बताया गया है कि कैसे आप विल्वपत्र से ही धन-धान्य सुख पा सकते है। इसीलिए अगर आप इस बुक को पढ़ना चाहते है तो अवश्य ही पढ़े।

 

 

 

रावण संहिता पीडीएफ डाउनलोड Asli Prachin Ravan Samhita Pdf Free Download

 

 

1- रावण संहिता पीडीएफ भाग १ 

 

2- रावण संहिता पीडीएफ भाग २ 

 

3-रावण संहिता पीडीएफ भाग ३ 

 

4-रावण संहिता पीडीएफ भाग ४ 

 

5-रावण संहिता पीडीएफ भाग ५ 

 

6- रावण वेद कथा ( रावण संहिता ) Ravan Sanhita Pdf 

 

 

 

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हमने इस पोस्ट में आपको रावण संहिता पीडीएफ के सभी भाग उपलब्ध कराए हैं। अगर आप रावण संहिता के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं तो नीचे की लिंक से Ravan Samhita खरीद सकते हैं।

 

 

 

 

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कौन था रावण?

 

 

 

क्या रावण सिर्फ खलनायक ही था? इसका जवाब है नहीं। रावण महापंडित, महाविद्वान, तेजस्वी, कुशल सेनापति, राजनीतिज्ञ और महान राजा था। मगर उसने पाप कर्म किए और इसके लिए उसे उसका फल भी मिला।

 

 

 

कहा जाता है कि जब भगवान श्री राम लंका विजय के लिए समुद्र तट पर पहुंचे तो इन्होने विजय यज्ञ करना चाहा। परन्तु यहां सबसे बड़ी दिक्कत पुरोहित की थी और बगैर पुरोहित यज्ञ संपन्न नहीं हो सकता था।

 

 

 

तब हनुमान जी ने कहा, “रावण से महान पंडित लंका में कोई नहीं है। उन्हें ही पुरोहित के रूप में लाया जाना चाहिए।”

 

 

 

इसपर राम जी ने कहा, “क्या रावण यहां आयेंगे ?”

 

 

तब हनुमान जी ने कहा, “जरूर आयेंगे क्योंकि वह ब्राह्मण है और पुरोहित के रूप में आना उनका कर्तव्य है।”

 

 

 

जब हनुमान जी लंका गए और रावण तक यह बात पहुंचाई तो रावण सहर्ष तैयार हो गए। सोचिए अपने मुख्य शत्रु की विजय यज्ञ करवाने के लिए रावण रावण सहज तैयार हो गया और दूसरा कोई रहता तो वह क्रोधित हो जाता।

 

 

 

जब रावण यज्ञ स्थल पर पहुंचा तो वह सीता जी को भी साथ ले गया क्योंकि यज्ञ में पत्नी का पति के साथ बैठना जरुरी होता है। जब यज्ञ पूर्ण हुआ तो राम जी ने कहा, “पुरोहित जी आप अपनी दक्षिणा मांगिये।”

 

 

 

इसपर रावण ने कहा, “आप इस समय वनवासी है। आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है। आप केवल यह वचन दे कि जब मेरी मृत्यु होगी तो आप मेरे समक्ष रहेंगे।”

 

 

 

इसपर राम जी मुस्कुराये और वचन दे दिया। रावण त्रिकालदर्शी था। वह चाहता तो राम जी से लंका से वापस जाने, युद्ध ना करने और फिर कभी लंका में प्रवेश ना करने का वचन ले सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे उसके अत्यंत स्वाभिमानी होने का पता चलता है।

 

 

 

 

दिव्यज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

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स्वरुप सिद्ध की पहचान – श्री कृष्ण कहते है – हे अर्जुन सुनो ! स्वरुप सिद्ध व्यक्ति से वास्तविक ज्ञान प्राप्त होने पर तुम कभी भी ऐसे मोह से ग्रसित नहीं होगे, क्योंकि इस ज्ञान के द्वारा तुम यह देख सकोगे कि सभी जीव परमात्मा के अंश स्वरुप है, अर्थात वह सब मेरे (परमात्मा ईश्वर के) है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जो व्यक्ति या गुरु परमात्मा के विषय में सही-सही व्यख्या करे वही स्वरुप सिद्ध पुरुष है। स्वरुप सिद्ध पुरुष से ज्ञान प्राप्त होने का यह परिणाम होता है कि यह ज्ञात हो जाता है कि सारे और सभी जीव भगवान कृष्ण के भिन्न अंश है। कृष्ण से पृथक अस्तित्व का भाव माया (मा – नहीं, या – यह) कहलाती है।

 

 

 

 

कृष्ण भगवान के रूप में प्रत्येक वस्तु के कारण है। ब्रह्म संहिता में स्पष्ट कहा गया है कि कृष्ण श्री भगवान है और सभी कारणों के कारण स्वरूप है। कुछ लोग सोचते है कि हमे कृष्ण से क्या लेना-देना है वह तो केवल महान ऐतिहासिक पुरुष है और परमब्रह्म तो निराकार है। वस्तुतः जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है यह निराकार ब्रह्म कृष्ण का व्यक्तिगत तेज है।

 

 

 

 

मायावादी यह समझ ही नहीं पाते कि परम का अर्थ क्या है कि एक और एक मिलकर एक ही होता है और में से घटाने पर भी एक ही बचता है। इसी प्रकार सारे जीव कृष्ण के अंश है। मायावादियों की यह मिथ्या धारणा है कि कृष्ण अपने अनेक अंशो में अपने निजी पृथक अस्तित्व को मिटा देते है। यह विचार सर्वथा भौतिक है, भौतिक जगत में हमारा अनुभव है कि यदि किसी वस्तु का विखंडन किया जाय तो उसका मूल स्वरुप अवश्य ही नष्ट हो जाता है। केवल माया के कारण ही अर्जुन ने सोचा कि उसके स्वजनों से उसका क्षणिक शारीरिक संबंध कृष्ण के शाश्वत आध्यात्मिक संबंधो से अधिक महत्वपूर्ण है।

 

 

 

 

ब्रह्म विद्या का पर्याप्त ज्ञान न होने के कारण हम माया आवृत है, इसलिए हम अपने को कृष्ण से पृथक सोचते है। यद्यपि हम कृष्ण के भिन्न अंश है किन्तु तो भी हम उनसे भिन्न नहीं है। जीवो का शारीरिक अंतर माया है अथवा वास्तविक सत्य नहीं है। हम सभी कृष्ण को प्रसन्न करने के निमित्त मात्र है।

 

 

 

 

गीता का यह सम्पूर्ण उपदेश इसी ओर लक्षित है कि कृष्ण का नित्य दास होने के कारण जीव उनसे पृथक नहीं हो सकता। कृष्ण को अपने से विलग मानना ही माया कहलाती है। किन्तु जब कोई कृष्ण भावनामृत के माध्यम से दिव्य सेवा में लग जाता है तो वह माया से तुरंत ही मुक्त हो जाता है। ऐसा ज्ञान केवल प्रामाणिक गुरु से ही प्राप्त हो सकता है और इस तरह वह इस भ्रम को दूर कर सकता है कि जीव कृष्ण के तुल्य है।

 

 

 

 

परब्रह्म के भिन्न अंश के रूप में जीवो को एक विशिष्ट उद्देश्य पूरा करना पड़ता है। उस उद्देश्य को भुलाने के कारण ही वह अनादि काल से मानव, पशु, देवता आदि देहो में स्थित है। ऐसे शारीरिक अंतर भगवान की दिव्य सेवा के विस्मरण से जनित है।

 

 

 

 

पूर्ण ज्ञान तो यह है कि परमात्मा कृष्ण समस्त जीवो के परम आश्रय है और इस आश्रय को त्याग देने पर जीव माया द्वारा मोहित होते है क्योंकि वह अपना पृथक अस्तित्व समझते।

 

 

 

 

इस तरह विभिन्न भौतिक पहचान के मानदंडों के अंतर्गत वह अपने आश्रय दाता कृष्ण को भूल जाते है। किन्तु जब ऐसे मोहग्रस्त जीव कृष्ण भावनामृत में स्थित होते है तो यह समझा जाता है कि वह मुक्ति के पथ का अनुगमन कर रहे है। जिसकी पुष्टि भागवत में (2. 10. 6) की गई है। मुक्ति का अर्थ है कृष्ण के नित्य दास रूप में (कृष्ण भावनामृत) में अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहना।

 

 

 

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