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Rashmirathi Pdf In Hindi Free / रश्मिरथी फ्री डाउनलोड

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मित्रो इस पोस्ट में हम आपको Rashmirathi Pdf In Hindi दे रहे है आप नीचे की लिंक से Rashmirathi In Hindi Pdf Free Downlaod कर सकते है।

 

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Rashmirathi Pdf In Hindi Free रश्मिरथी Poem Pdf Free Download

 

 

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Rashmirathi Pdf In Hindi Free
रश्मिरथी  PDF Download
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रश्मिरथी के बारे में 

 

 

 

रश्मिरथी में सूर्यपुत्र कर्ण की पूरी जीवनी है जिसे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने बड़े ही भाव से लिखा है। जब आप रश्मिरथी पढ़ते है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप रश्मिरथी को जी रहे हो। पूरा का पूरा चित्र आपके सम्मुख सजीव चित्रित हो जाता है।

 

 

 

रश्मिरथी में कर्ण का जन्म, दुर्योधन से मिलाप, कृष्ण से मित्रता, श्री कृष्ण की दुर्योधन को चेतावनी, कुंती कर्ण संवाद, कर्ण और श्री कृष्ण के संवाद को बड़े ही मोहक और सटीक ढंग से लिखा गया है।

 

 

 

रश्मिरथी के एक-एक शब्द आपको पूरी कविता पढ़ने को आकर्षित करते है। इसके अलावा आप परशुराम की प्रतीक्षा भी पढ़ सकते है।

 

 

 

रश्मिरथी सर्वप्रथम 1952 में प्रकाशित हुई। इसमें कुल 7 सर्ग है। नीचे रश्मिरथी के सभी सर्ग दिए जा रहे है। आप उन्हें नीचे पढ़ सकते है और pdf के रूप में डाउनलोड भी कर सकते है।

 

 

 

रश्मिरथी के बारे में और जाने 

 

 

 

 

रश्मिरथी महाभारत में कर्ण के जीवन का चित्रण है। Rashmirathi को रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने लिखा है। आप यहां से Ramdhari Singh ‘Dinkar’ Poem In Hindi Pdf  पर क्लिक करके पढ़ सकते है। रश्मिरथी रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की कालजयी कविता है। यह कविता 1952 में प्रकाशित हुई थी और यह बेहद प्रसिद्ध हुई।

 

 

 

रश्मिरथी का अर्थ होता है “सूर्य का सारथी”। रश्मिरथी में कुल 7 सर्ग है। सभी सर्गो को मिलाकर दिनकर जी ने कर्ण के जीवन को बड़ी ही खूबसूरती से चित्रित किया है। आप ऊपर की लिंक से फ्री डाउनलोड कर सकते है और नीचे रश्मिरथी के कुछ अंग दिए जा रहे है आप उन्हें जरूर से पढ़े।

 

 

 

Rashmirathi Poem in Hindi  रश्मिरथी कविता हिंदी में 

 

 

 

‘जय हो’ जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,
जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।
किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल,
सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल।

 

ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है,
दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।
क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग,
सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग।

 

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।
हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक,
वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।

 

जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी,
उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी।
सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,
निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‌भुत वीर।

 

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी,
जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी।
ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास,
अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास।

 

अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से,
कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से।
निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर,
वन्यकुसुम-सा खिला कर्ण, जग की आँखों से दूर।

 

नहीं फूलते कुसुम मात्र राजाओं के उपवन में,
अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुञ्ज-कानन में।
समझे कौन रहस्य ? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल,
गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल।

 

जलद-पटल में छिपा, किन्तु रवि कब तक रह सकता है?
युग की अवहेलना शूरमा कब तक सह सकता है?
पाकर समय एक दिन आखिर उठी जवानी जाग,
फूट पड़ी सबके समक्ष पौरुष की पहली आग।

 

रंग-भूमि में अर्जुन था जब समाँ अनोखा बाँधे,
बढ़ा भीड़-भीतर से सहसा कर्ण शरासन साधे।
कहता हुआ, ‘तालियों से क्या रहा गर्व में फूल?
अर्जुन! तेरा सुयश अभी क्षण में होता है धूल।’

 

‘तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ,
चाहे तो कुछ नयी कलाएँ भी सिखला सकता हूँ।
आँख खोल कर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार,
फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार।’

 

इस प्रकार कह लगा दिखाने कर्ण कलाएँ रण की,
सभा स्तब्ध रह गयी, गयी रह आँख टँगी जन-जन की।
मन्त्र-मुग्ध-सा मौन चतुर्दिक् जन का पारावार,
गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार।

 

फिरा कर्ण, त्यों ‘साधु-साधु’ कह उठे सकल नर-नारी,
राजवंश के नेताओं पर पड़ी विपद् अति भारी।
द्रोण, भीष्म, अर्जुन, सब फीके, सब हो रहे उदास,
एक सुयोधन बढ़ा, बोलते हुए, ‘वीर! शाबाश !’

 

द्वन्द्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा,
अर्जुन को चुप ही रहने का गुरु ने किया इशारा।
कृपाचार्य ने कहा- ‘सुनो हे वीर युवक अनजान’
भरत-वंश-अवतंस पाण्डु की अर्जुन है संतान।

 

‘क्षत्रिय है, यह राजपुत्र है, यों ही नहीं लड़ेगा,
जिस-तिस से हाथापाई में कैसे कूद पड़ेगा?
अर्जुन से लड़ना हो तो मत गहो सभा में मौन,
नाम-धाम कुछ कहो, बताओ कि तुम जाति हो कौन?’

 

‘जाति! हाय री जाति !’ कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला,
कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला
‘जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषंड,
मैं क्या जानूँ जाति ? जाति हैं ये मेरे भुजदंड।

 

‘ऊपर सिर पर कनक-छत्र, भीतर काले-के-काले,
शरमाते हैं नहीं जगत् में जाति पूछनेवाले।
सूत्रपुत्र हूँ मैं, लेकिन थे पिता पार्थ के कौन?
साहस हो तो कहो, ग्लानि से रह जाओ मत मौन।

 

‘मस्तक ऊँचा किये, जाति का नाम लिये चलते हो,
पर, अधर्ममय शोषण के बल से सुख में पलते हो।
अधम जातियों से थर-थर काँपते तुम्हारे प्राण,
छल से माँग लिया करते हो अंगूठे का दान।

 

‘पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से’
रवि-समान दीपित ललाट से और कवच-कुण्डल से,
पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प़काश,
मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास।

 

‘अर्जुन बङ़ा वीर क्षत्रिय है, तो आगे वह आवे,
क्षत्रियत्व का तेज जरा मुझको भी तो दिखलावे।
अभी छीन इस राजपुत्र के कर से तीर-कमान,
अपनी महाजाति की दूँगा मैं तुमको पहचान।’

 

कृपाचार्य ने कहा ‘ वृथा तुम क्रुद्ध हुए जाते हो,
साधारण-सी बात, उसे भी समझ नहीं पाते हो।
राजपुत्र से लड़े बिना होता हो अगर अकाज,
अर्जित करना तुम्हें चाहिये पहले कोई राज।’

 

कर्ण हतप्रभ हुआ तनिक, मन-ही-मन कुछ भरमाया,
सह न सका अन्याय, सुयोधन बढ़कर आगे आया।
बोला-‘ बड़ा पाप है करना, इस प्रकार, अपमान,
उस नर का जो दीप रहा हो सचमुच, सूर्य समान।

 

 

Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है। अतः आपसे निवेदन है कि अगर किसी भी बुक्स, नावेल के अधिकार क्षेत्र से या अन्य किसी भी प्रकार की दिक्कत है तो आप हमें [email protected] पर सूचित करें। हम निश्चित ही उस बुक को हटा लेंगे। 

 

 

 

 

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