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Ramayan Pdf in Hindi Free / रामायण पीडीएफ इन हिंदी फ्री

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मित्रो इस पोस्ट में हम आपको Ramayan Pdf दे रहे है। आप नीचे की लिंक से Ramayan Pdf Hindi Free Download कर सकते है।

 

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Ramayan Pdf in Hindi Free रामायण पीडीएफ इन हिंदी फ्री 

 

 

 

 

 

Ramayan Pdf Free डाउनलोड करें। 

 

 

 

रामायण के बारे में

 

 

 

ब्रह्मा जी के कहने पर वाल्मीकि जी भगवान श्री राम के वृतांत को श्लोक बद्ध किया। रामायण की रचना ब्रह्मा जी ने भगवान श्री राम जी के जन्म से पूर्व ही कर दी थी। इसीलिए इसे वाल्मीकि रामायण के नाम से भी जाना जाता है और यही सबसे सटीक माना जाता है।

 

 

 

कही-कही इसे आदि रामायण के नाम से भी जाना जाता है। वाल्मीकि रामायण में 24 हजार श्लोक, 500 खंड और 7 कांड है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरित मानस में कुछ-कुछ भिन्नता है।

 

 

 

रामायण से जुड़े कुछ रोचक तथ्य 

 

 

 

1- हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता माने जाते है। लेकिन रामायण के अरण्यकाण्ड के चौदहवे श्लोक में सिर्फ 33 देवता बताए गए है जिसमे बारह आदित्य, आठ वसु, 11 रूद्र और दो अश्विनी कुमार है।

 

 

2- सीता हरण के समय जिन जटायु नामक गिद्ध ने रावण को रोकने का प्रयास किया, उन जटायु के पिता अरुण है और अरुण सूर्यदेव के सारथी है।

 

 

3- जब बहुत देर तक राम-रावण युद्ध हुआ और इसका कोई परिणाम नहीं निकला देख अगत्स्य मुनि ने भगवान श्री राम जी को आदित्य हृदय स्त्रोत पढ़ने को कहा और इससे राम जी ने रावण का वध किया।

 

 

 

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4- जब वनवास के समय भगवान श्रीराम जी और लक्ष्मण, सीता जी की खोज कर रहे थे, उस समय कबंध नामक राक्षस का भगवान श्रीराम और लक्ष्मण ने वध किया।

 

 

 

श्राप के कारण कबंध राक्षस बन गया था। जब भगवान श्रीराम ने उसे अग्नि में समर्पित किया तो वह श्रापमुक्त हो गया और फिर उसने ही भगवान श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा।

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

वस्तु की समुचित उपयोगिता – कृष्ण कहते है – हे पार्थ ! जो व्यक्ति यह जनता है कि आत्मा अविनासी, अजन्मा, शाश्वत तथा अव्यय है वह भला किसी को कैसे मार सकता है या किसी को कैसे मरवा सकता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – प्रत्येक वस्तु की समुचित उपयोगिता होती है और जो ज्ञानी होता है वह जानता है कि किसी वस्तु का कहां और कैसे प्रयोग किया जाय।

 

 

 

यद्यपि हत्या करने वाले व्यक्ति को न्याय संहिता के अनुसार प्राण दंड दिया जाता है। किन्तु न्यायाधीश को दोषी नहीं ठहराया जाता है क्योंकि वह न्याय संहिता के अनुसार ही दूसरे व्यक्ति पर हिंसा करने का आदेश देता है।

 

 

 

 

इसी प्रकार हिंसा की भी अपनी उपयोगिता है इसका उपयोग इसे जानने वाले पर निर्भर करता है। मनुष्यो की विधि ग्रंथ मनु संहिता में इसका समर्थन किया गया है कि हत्यारे को प्राणदंड देना चाहिए जिससे उसे अगले जीवन में अपना पाप कर्म न भोगना पड़े।

 

 

 

 

इसी प्रकार से जब कृष्ण युद्ध करने का आदेश देते है तो यह समझना चाहिए कि यह हिंसा परम न्याय के लिए किया गया युद्ध हिंसा नहीं है क्योंकि मनुष्य या दूसरे शब्दों में आत्मा को मारा नहीं जा सकता है।

 

 

 

 

अतः राजा द्वारा हत्यारे के लिए फांसी का दंड एक तरह से लाभप्रद है। अतः न्याय के लिए तथा कथित हिंसा की अनुमति है। शल्य क्रिया का प्रयोजन रोगी को मारना नही अपितु उसको स्वस्थ बनाना है। अतः कृष्ण के आदेश पर अर्जुन द्वारा किया जाने वाला युद्ध पूरे ज्ञान के साथ हो रहा है। उसमे पाप फल की संभावना नहीं है।

 

 

 

 

 

22- पुराने वस्त्रो (शरीर) का त्याग – कृष्ण कहते है – जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रो को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार से आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरो को त्यागकर नवीन भौतिक शरीर धारण करता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अणु आत्मा का दूसरे शरीर में स्थानांतरण परमात्मा की कृपा से संभव हो पाता है। परमात्मा अणु आत्मा की इच्छाओ की पूर्ति उसी प्रकार करते है जिस प्रकार एक मित्र दूसरे की इच्छा पूर्ति करता है।

 

 

 

मुंडक उपनिषद (3.1. 2) तथा श्वेताश्वर उपनिषद (4. 7) समान रूप से इसकी पुष्टि करते है। “यद्यपि दोनों पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे है किन्तु फल खाने वाला पक्षी वृक्ष के फल के भोक्ता के रूप में चिंता तथा विषाद में निमग्न है।

 

 

 

 

यदि किसी तरह वह अपने मित्र भगवान की ओर उन्मुख होता है और उनकी महिमा को जान लेता है तो वह कष्ट भोगने वाला पक्षी तुरंत समस्त चिंताओं मुक्त हो जाता है।”  अब अर्जुन ने अपना मुख अपने शाश्वत मित्र कृष्ण की ओर फेरा है और उनसे भग्वद्गीता समझ रहा है।

 

 

 

 

 

मुंडक तथा श्वेताश्वर उपनिषद में आत्मा तथा परमात्मा की उपमा दो मित्र पक्षियों से दी गई है जो एक ही वृक्ष पर बैठे है। इनमे से एक पक्षी (अणु-आत्मा) वृक्ष के फल को खा रहा है और दूसरा पक्षी (कृष्ण) अपने मित्र को देख रहा है।

 

 

 

 

कृष्ण साक्षी पक्षी है और अर्जुन फल भोक्ता पक्षी। यद्यपि दोनों निम्न मित्र (सखा) है किन्तु फिर भी एक स्वामी है दूसरा सेवक है। यद्यपि दोनों पक्षी समान गुण वाले है। किन्तु इनमे से एक भौतिक वृक्ष के फलो पर मोहित है किन्तु दूसरा पक्षी अपने मित्र के कार्य कलापो का साक्षी मात्र है।

 

 

 

 

अणु आत्मा द्वारा इस संबंध की विस्मृति ही उसके एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाने या एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का कारण है। जीव-आत्मा प्राकृत शरीर रूपी वृक्ष पर अत्यधिक संघर्ष करता है।

 

 

 

 

किन्तु वह ज्यों ही दूसरे पक्षी को परम गुरु के रूप में स्वीकार करता है जिस प्रकार अर्जुन कृष्ण का उपदेश ग्रहण करने के लिए स्वेच्छा से उनकी शरण में जाता है त्यों ही परतंत्र पक्षी तुरंत सारे शोको से विमुक्त हो जाता है

 

 

 

 

बलवेदी पर या युद्ध स्थल पर धर्म युद्ध में अपने प्राणो को अर्पित करने वाला व्यक्ति तुरंत ही शारीरिक पापो से मुक्त हो जाता है और उच्च लोक को प्राप्त होता है। अतः यहां अर्जुन का शोक करना युक्ति संगत नहीं है।

 

 

 

 

इस प्रकार वह कृष्ण से श्रवण करके भगवान की परम महिमा को समझकर शोक से मुक्त हो जाता है। यहां भगवान ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि वह अपने पितामह तथा गुरु के देहांतरण पर वृथा शोक प्रकट न करे अपितु उसे इस धर्मयुद्ध में उनके शरीर का वध करने में प्रसन्न होना चाहिए जिससे वह सब विभिन्न शरीरिक कर्म फलो से तुरंत मुक्त हो जाए।

 

 

 

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