Rama Amar Chitra Katha Hindi Pdf Free / अमर चित्र कथा Pdf Free

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Rama Amar Chitra Katha Pdf / अमर चित्र कथा पीडीऍफ़ फ्री डाउनलोड 

 

 

 

 

 

 

रामा अमर चित्र कथा पीडीएफ फ्री डाउनलोड 

 

 

Amar Chitra Katha Pdf Free Download

 

 

 

Rama Amar Chitra Katha एक बहुत ही बढियाँ किताब है। यह कॉमिक्स के रूप में दी गयी है। आप इसे जरूर पढ़ें और यह बच्चों में बेहद ही प्रसिद्ध है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

यहां अर्जुन भगवान कृष्ण से भगवत्प्राप्ति के विषय में जानने के लिए व्याकुल है और भगवान से पूछ रहा है —

 

 

1- अर्जुन ने कहा-हे भगवान ! हे पुरुषोत्तम ! ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है? सकाम कर्म क्या है? भौतिक जगत क्या है? तथा देवता क्या है? कृपा करके यह सब मुझे बताइये।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – 1- इस आठवे अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन के द्वारा पूछे गए “ब्रह्म क्या है?” आदि प्रश्नो का उत्तर देते है। अर्जुन ने यह प्रश्न कृष्ण को परमेश्वर, पुरुषोत्तम या परम पुरुष कहकर सम्बोधित किया है जिसका अर्थ यह होता है कि ये सारे प्रश्न अपने मित्र से नहीं, अपितु परम पुरुष से उन्हें परम प्रमाण मानकर पूछ रहा था जो निश्चित ही सभी प्रश्नो के उत्तर दे सकते थे।

 

 

 

भगवान कर्म, भक्ति तथा योग और शुद्ध भक्ति की भी व्याख्या करते है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि परम सत्य ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान के नाम से जाना जाता है साथ ही जीवात्मा को भी ब्रह्म कहते है। अर्जुन आत्मा के बिषय में पूछता है, जिससे शरीर आत्मा तथा मन का बोध होता है। वैदिक कोश (निरुक्त) के अनुसार आत्मा का अर्थ मन, आत्मा, शरीर तथा इन्द्रियां भी होती है।

 

 

 

 

2- अर्जुन का भगवान से यज्ञ के स्वामी के बिषय में पूछना – अर्जुन ने कहा, हे मधुसूदन ! यज्ञ का स्वामी कौन है और यह शरीर में कैसे रहता है और मृत्यु के समय भक्ति में लगे रहने वाले आपको कैसे जान पाते है?

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अर्जुन ने भगवान को मधुसूदन कहकर सम्बोधित किया क्योंकि कृष्ण ने एक बार मधु नामक असुर का वध किया था। अर्जुन एक कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति था। उसके मन में किसी भी प्रकार की शंका वाले प्रश्न नहीं उठने चाहिए थे क्योंकि किसी भी प्रकार की शंकाए असुरो के सुदृश्य ही होती है चूँकि कृष्ण असुरो को मारने में सिद्ध हस्त थे। अतः अर्जुन उन्हें मधुसूदन कहकर सम्बोधित करता है जिससे कृष्ण उसके मन में उठने वाली समस्त आसुरी समस्याओ को नष्ट कर दे।

 

 

 

 

अधियज्ञ का तात्पर्य इंद्र तथा विष्णु हो सकता है। विष्णु समस्त देवताओ में जिनमे ब्रह्मा तथा शिव सम्मिलित है, प्रधान देवता है और इंद्र प्रशासक देवताओ में प्रधान है। इंद्र तथा विष्णु की पूजा यज्ञ के द्वारा की जाती है, किन्तु अर्जुन यहां प्रश्न करता है कि वस्तुतः यज्ञ का स्वामी कौन है और किस जीव के शरीर के भीतर निवास करते है?

 

 

 

 

हम अपने जीवन में जो भी कार्य कलाप करते है उसकी परीक्षा मृत्यु के समय ही होती है। मृत्यु के समय सभी शारीरिक और मानसिक कार्य स्वतः ही रुक जाते है और मन सही दिशा में नहीं रहता है इस प्रकार शारीरिक स्थिति बिगड़ जाने हो सकता है कि मनुष्य परमेश्वर का स्मरण न कर सके। अर्जुन उन लोगो के बिषय में जो निरंतर कृष्ण भावनामृत में लगे रहते है यह जानने के लिए अत्यंत इच्छुक है कि अंत समय में उनकी क्या दशा होगी?

 

 

 

परमभक्त महाराज कुल शेखर प्रार्थना करते है कि मैं आपके चरण कमलो का चिंतन करते हुए तुरंत मर जाऊं तो मुझे विश्वास है कि आपके प्रति मेरी भक्ति पूर्ण हो जाएगी क्योंकि मैं इस समय पूर्ण स्वस्थ हूँ। अच्छा हो कि मेरी मृत्यु इसी समय हो जाए जिससे मेरा मन रूपी हंस आपके चरण कमल रूपी नाल के भीतर प्रविष्ट हो सके।” यह रूपक इसलिए प्रयुक्त किया गया है क्योंकि हंस जो एक डाल में निवास करने वाला पक्षी है, वह कमल के पुषो को कुतरने में आनंद का अनुभव करता है। इस तरह वह कमल पुष्प के भीतर प्रवेश करना चाहता है।

 

 

 

 

महाराज कुलशेखर भगवान से कहते है, इस समय मैं पूरी तरह स्वस्थ हूँ और मेरा मन भी स्वस्थ है अर्थात आपके चरण कमलो में लीन है। इस समय मृत्यु को प्राप्त होने पर मुझे विश्वास है कि मुझे आपके भक्ति की प्राप्ति होगी, अगर मुझे अपनी सहज मृत्यु की प्रतीक्षा करनी पड़ी तो मैं नहीं जानता कि क्या होगा क्योंकि उस समय मेरा शरीर कार्य करना बंद कर देगा, मेरा गला रुध जाएगा और मुझे पता नहीं कि मैं आपके नाम का जप कर पाउँगा या नहीं। अच्छा यही होगा कि मुझे तुरंत मर जाने दे। अर्जुन प्रश्न करता है कि ऐसे समय मनुष्य किस तरह कृष्ण के चरण कमलो में अपने मन को स्थिर कर सकता है?

 

 

 

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