Ram Raksha Stotra In Hindi Pdf / राम रक्षा स्तोत्र इन हिंदी पीडीऍफ़

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Ram Raksha Stotra In Hindi Pdf  राम रक्षा स्तोत्र इन हिंदी पीडीऍफ़

 

 

 

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राम रक्षा स्तोत्र के बारे में 

 

 

Ram Raksha Stotra In Hindi Pdf

 

 

 

जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है ‘राम रक्षा स्तोत्र’ इसके विधि पूर्वक पाठ करने से ‘राम रघुवीर’ स्वयं ही अपने भक्तो की रक्षा करते है। इसे तो प्रायः कभी किसी दिन भी पढ़ा जा सकता है। श्री राम स्वयं श्री विष्णु के अवतार होने के नाते इस स्तोत्र का पाठ गुरुवार से ही कर्ण चाहिए क्योंकि वृहस्पतिवार (गुरुवार) को भगवान विष्णु के दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त है।

 

 

 

 

इस स्तोत्र के साथ पौराणिकता भी जुडी हुई है। एक दिन भगवान शंकर ने बुध कौशिक ऋषि को यह स्तोत्र स्वप्न में सुनाया था जिसे ऋषिवर ने प्रातः होने पर लिपिबद्ध कर दिया। यह संस्कृत भाषा में मूर्तरूप दिया गया है। इसके पाठ का प्रभाव बहुत व्यापक और दोष रहित है।

 

 

1- इसके पाठ से मनुष्य के अंदर आत्मबल का विकास होता है, वह भयमुक्त हो जाता है।

 

2- इसे रोज पढ़ने से मनुष्य संस्तुति युक्त, विनम्र, ऐश्वर्यवान और विजयी और विनयशील हो जाता है।

 

3- स्तोत्र के पाठ से मंगल का कुप्रभाव समाप्त हो जाता है।

 

4- स्तोत्र के प्रभाव से व्यक्ति के चारो तरफ सुरक्षा कवच का निर्माण हो जाता है, वह व्यक्ति सदैव सुरक्षित रहता है।

 

5- यह स्तोत्र मानव की हर प्रकार से सहायता करता है। मनुष्य को समृद्धि प्राप्त होती है।

 

6- राम रक्षा स्तोत्र का नियमित पाठ करने से पवनसुत हनुमान भी प्रसन्न होते है।

 

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे, सहस्र नाम ततुल्यं राम नाम वरानने।  

 

राम के नाम का उच्चारण मात्र ही इतना मनोरम है कि इसे सहस्र नमो के समतुल्य समझा जाता है।

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

मनो धर्म की इच्छाओ का त्याग (योग में) – श्री कृष्ण कहते है – मनुष्य को चाहिए कि संकल्प तथा श्रद्धा के साथ योगाभ्यास में लगे और पथ से विचलित न हो। उसे चाहिए कि मनोधर्म से उत्पन्न समस्त इच्छाओ को वश में करे।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – योगाभ्यास करने वाले को दृढ संकल्प होना चाहिए और बिना विचलित हुए धैर्य पूर्वक अभ्यास करता रहे, अंत में उसकी सफलता निश्चित होती है। उसे यह सोचकर धैर्य पूर्वक ही इस योग मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और यदि सफलता मिलने में बिलम्ब होता है तो भी अपने उत्साह का परित्याग नहीं करना चाहिए, ऐसे दृढ अभ्यासी की सफलता सुनिश्चित रहती है। भक्तियोग के संबंध में रूप गोस्वामी का कथन है – “मनुष्य पूर्ण हार्दिक उत्साह धैर्य तथा संकल्प के साथ भक्तियोग का पूर्ण रूपेण पालन, भक्त के साथ रहकर निर्धारित कर्मो के करने तथा सत्कार्यो में पूर्णतया लगे रहने में कर सकता है।”  (उपदेशामृत 3)

 

 

 

जहां तक संकल्प की बात है उस गौरैया का आदर्श ग्रहण करे जिसके अंडे समुद्र की लहरों में मग्न ह गए थे। कहा जाता है एक गौरैया ने समुद्र तट पर अच्छे अंडे दिए थे। समुद्र ने अपनी लहरो से उन अंडो को अपने भीतर खींच लिया। इसपर गौरैया क्षुब्ध हो उठी और समुद्र को अपने अंडे लौटाने के लिए कहा लेकिन समुद्र ने उसकी प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया। अतः उस गौरैया ने सुखा डालने की ठान ली। वह अपनी नन्ही सी चोंच से समुद्र का पानी उलीचने लगी। सभी लोग उसके इस असम्भव प्रयास का उपहास करने लगे थे। गौरेया के इस कार्य की सर्वत्र चर्चा चलने लगी थी। भगवान विष्णु के विराट वाहन पक्षीराज गरुड़ ने भी यह बात सुनी। उन्हें अपनी इस नन्ही पक्षी बहन पर दया आई और वह उससे मिलने आ गए। गरुड़ उस नन्ही गौरैया के निश्चय से बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने उसकी सहायता करने का वचन दिया।

 

 

 

 

इसी प्रकार योग विशेषतया कृष्ण भावनामृत में भक्तियोग अत्यंत दुष्कर प्रतीत होता है किन्तु जिसका संकल्प दृढ रहता है तथा जो नियमो का पालन करता है भगवान उसकी सहायता निश्चित रूप से करते है क्योंकि जो खुद अपनी सहायता करते है भगवान की सहायता उसे अवश्य ही प्राप्त होती है। इसी तरह गरुड़ ने गौरैया की सहायता किया और समुद्र से कहा कि वह गौरैया के अंडे लौटा दे अन्यथा उसे (गरुड़ को) स्वयं आगे आना पड़ेगा। गरुड़ की बात सुनकर समुद्र भयभीत हो गया और उसने गौरैया के अंडे लौटा दिए इस तरह से गौरैया गरुड़ की कृपा से सुखी हो गई।

 

 

 

 

 

25- विश्वास पूर्वक बुद्धि के द्वारा समाधि – श्री कृष्ण कहते है – व्यक्ति को धीरे-धीरे क्रमशः पूर्ण विश्वास पूर्वक बुद्धि के द्वारा समाधि में स्थित होना चाहिए और इस प्रकार से मन को आत्मा में स्थित करना चाहिए तथा अन्य कुछ भी नहीं सोचना चाहिए।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – समुचित विश्वास तथा बुद्धि के द्वारा मनुष्य को धीरे-धीरे सारे इन्द्रिय कर्म बंद कर देना चाहिए यह प्रत्याहार कहलाता है। उस समय देहात्म बुद्धि में अनुरक्त होने की कोई संभावना नहीं रहती है। मन को विश्वास ध्यान तथा इन्द्रिय तृप्ति के द्वारा वश में करते हुए समाधि में स्थिर चाहिए। दूसरे शब्दों में जब तक इस शरीर का अस्तित्व है तब तक मनुष्य पदार्थ में संलग्न रहता है। उसके परमात्मा के आनंद के अतिरिक्त अन्य आनंद का चिंतन कदापि नहीं करना चाहिए। उसे इन्द्रिय तृप्ति के विषय में नहीं सोचना चाहिए।

 

 

 

 

26- मन को (चंचलता को) खींचना – श्री कृष्ण कहते है – मन अपनी चंचलता तथा अस्थिरता के कारण जहां कही विचरण करता हो मनुष्य को चाहिए कि उसे वहां से खींचे और अपने वश में कर लाए।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – मन का स्वभाव चंचल और अस्थिर होता है किन्तु स्वरुप सिद्ध योगी को अपने मन पर नियंत्रण प्राप्त करना होता है। उसपर मन का अधिकार नहीं होना चाहिए। दिव्य इन्द्रिय सुख वह होता है जिसमे इन्द्रिया हृषिकेष अर्थात भगवान इन्द्रियों के स्वामी भगवान कृष्ण की सेवा में लगी रहती है जो व्यक्ति मन तथा इन्द्रियों को वश में रखता है वह गोस्वामी या स्वामी कहलाता है। शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण की सेवा ही कृष्ण भावनामृत कहलाती है उसे कृष्ण चेतना भी कहा जाता है और जो मन के वशीभूत होता है वह गोदास अर्थात इन्द्रियों का सेवक कहलाता है। कृष्ण चेतना या कृष्ण भावनामृत से इन्द्रियों को वश में लाया जा सकता है। इन्द्रियों को पूरीतया वश में करने की यही सर्वोत्तम विधि है इससे बढ़कर बात यह है कि यह योगाभ्यास की परम सिद्धि है।

 

 

 

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