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Rahim Ke Dohe in Hindi Pdf / रहीम के दोहे पीडीऍफ़ डाउनलोड

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Rahim Ke Dohe in Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Rahim Ke Dohe in Hindi Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Rahim Ke Dohe in Hindi Pdf / रहीम के दोहे Pdf 

 

 

 

रहीम के दोहे पीडीएफ फ्री डाउनलोड

 

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Rahim Ke Dohe in Hindi Pdf
Rahim Ke Dohe in Hindi Pdf
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Rahim Ke Dohe in Hindi

 

 

 

1- जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।। 

 

 

 

अर्थ-

उत्तम प्रकृति के ऊपर प्रकाश डालते हुए रहीम दास जी कहते है – कि जिन मनुष्य की प्रकृति (स्वभाव) उत्तम (अच्छा) होता है। उसे बुरी संगत वालो के साथ रहने से हानि नहीं पहुंचती है जैसे उत्तम प्रकृति वाले चंदन पर अनेको बुरी प्रकृति वाले सर्प लिपटे रहते है तो क्या चंदन अपना स्वभाव त्याग देता है? अर्थात चंदन अपना शीतल स्वभाव कभी नहीं त्यागता है।

 

 

 

 

2- वृक्ष कबहुँ नहि फल भखै, नदी न संचे नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।। 

 

 

 

अर्थ-

रहीम दास जी अपनी सुंदर और स्पष्ट वाणी में परमारथ के ऊपर प्रकाश डालते हुए कहते है कि सज्जन पुरुष परमार्थ के कार्य के लिए ही शरीर धारण करते है, उनका शरीर परोपकार के लिए ही रहता है। जैसे वृक्ष में फल लगने पर वह अपने लिए कभी नहीं रखता है। उसी प्रकार परोपकार के लिए ही नदियां अपने जल को सदा ही प्रवाहमान बनाये रखती है अर्थात वह अपने लिए जल का संचय कभी नहीं करती है।

 

 

 

 

3- रूठे सुजन मनाइये, जौ रूठे सौ बार। रहिमन फिर-फिर पोइए, टूटे मुक्ताहार।।  

 

 

 

अर्थ-

रहीम दास जी मोती की माला से उदाहरण देकर अपने सुंदर शब्दों में कहते है – कि जिस प्रकार से मुक्ताहार के टूटने पर उसे बार-बार पिरोया जाता है अर्थात उसके मोती के दाने इकट्ठा करके बार-बार हार बनाया जाता है क्योंकि इकट्ठे हुए मोती के दाने से हार बनाने पर उसकी सुंदरता बढ़ जाती है। उसी प्रकार से अपने सुजन अर्थात अपना हितैषी स्वजन अगर सौ बार भी रूठे तो उसे अवश्य ही मना लेना चाहिए क्योंकि वह अपना शुभ चिंतक है उसे मना लेने से खुद की शोभा बढ़ जाती है क्योंकि वह अपना हितग्राही है।

 

 

 

 

 

4- खीरा सिर ते काटिये, मलियत लौन लगाय। रहिमन करुए मुखन चाहिए यही सजाय।। 

 

 

 

 

अर्थ-

रहीम दास जी उदाहरण देकर सुंदर शब्दों में कहते है – कि जिस प्रकार से खीरा को काटने के बाद उसपर नमक लगाकर घिसा जाता है। उसी प्रकार से कटु वचन कहने वालो के लिए ऐसी ही सजा देनी चाहिए।

 

 

 

 

 

5- दोनों रहिमन एक से, जौ लौ बोलत नाहि। जान परत है काक पिक, ऋतु बसंत के माहि।। 

 

 

 

अर्थ-

रहीम दास जी अपनी सुंदर रचना के माध्यम से उदाहरण देके समझाते हुए कहते है कि – सभी मनुष्य एक समान ही दिखते है लेकिन सभी का अंतर उनके व्यवहार से ही स्पष्ट होता है जैसे कोयल और कौवा दोनों ही एक वर्ण अर्थात काले रंग के होते है लेकिन उनमे अंतर तो बसंत ऋतु के आने पर ही मालूम पड़ता है जब दोनों बोलते है। कौवे की वाणी कर्कश और कड़वी होती है जबकि कोयल अपने मधुर और मीठी बोली में गाती है। इसी तरह से इन दोनों के एक समान रहते हुए भी पहचान संभव हो जाती है।

 

 

 

 

 

6- रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय। टूटे से फिर ना जुरे, जुरे गांठ परि जाय।। 

 

 

 

अर्थ-

कविवर रहीम दास जी प्रेम को बहुत ही सुंदर ढंग से परिभाषित करते हुए अपनी सरल वाणी में कहते है – कि प्रेम एक नाजुक धागा है, उसे झटका देकर तोड़ देना कभी उचित नहीं होता है। यदि प्रेम और विश्वास एक बार टूट जाय तो उसमे गांठ पड़ना स्वाभाविक है। और जब गांठ लगाने के बाद धागा रूपी प्रेम को जोड़ा जाता है तो उसमे से मिठास रूपी विश्वास खत्म होने गांठ पड़ ही जाती है। अतः पहले से ही उसे तोड़ने से बचना चाहिए।

 

 

 

 

 

7- वे रहीम नर धन्य है, पर उपकारी अंग। बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी के संग।।

 

 

 

अर्थ-

मेंहदी के रंग का अनोखा उदाहरण देकर रहीम दास जी कहते है कि – वह मनुष्य धन्य है जो सदैव ही परोपकारी कार्यो में लगा रहता है। परोपकार का कार्य करते हुए उसका मान, सम्मान, यश तो उस मेंहदी के रंग की भांति ही सुंदर हो जाता है जैसे मेंहदी लगाने वाले व्यक्ति के हाथ पर भी, जो ‘दूसरे की मेंहदी लगाता है’ लग जाती है और उसकी सुंदरता को बढ़ा देती है। उसी प्रकार से परोपकारी का यश भी शरीर भी सुशोभित होता है।

 

 

 

 

 

8- रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर। जब नीके दिन आइहै, बनत न लगिहै देर।। 

 

 

 

अर्थ-

कविवर रहीम दास जी कहते है कि – मनुष्य को अपने सही समय का अवश्य ही इंतजार करना चाहिए, सही समय होने पर किसी का भी कार्य अच्छी तरह से सम्पन्न होता है और खराब समय में कोई भी अच्छा कार्य करना उचित नहीं है। अपने खराब समय में मनुष्य को मौन रहना चाहिए और अच्छे दिन आने पर कार्य बनने में देर नहीं लगती है।

 

 

 

 

9- निज कर क्रिया रहीम कहि, सीधी भावी के हाथ। पासे अपने हाथ में, दाव न अपने हाथ।। 

 

 

 

अर्थ-

रहीम दास जी मनुष्य के कर्म के ऊपर सुंदर ढंग से सरल भाषा में प्रकाश डालते हुए कह रहे है कि – मनुष्य को अपने कर्म सही प्रकार से करते रहना चाहिए क्योंकि उस कर्म का फल तो मनुष्य के हाथ में नहीं रहता है। जैसे चौपड़ खेलते समय पासा अपने हाथ में अवश्य रहता है लेकिन दाव लगाने में क्या आएगा यह तो अपने हाथ में नहीं रहता है।

 

 

 

 

 

10- रहिमन मनहि लगाई कै, देख लेहु किन कोय। नर को बस किरबो कहा, नारायण बस होय।।

 

 

 

अर्थ-

कविवर रहीम दास जी मनुष्य को एकाग्रचित्त होकर कार्य करने के लिए कहते है कि – अगर मनुष्य अपने अच्छे कार्य को शांत और एकाग्र भाव से करे तो उसे सफल होने से कोई रोक नहीं सकता है। उसे सफलता अवश्य ही मिलेगी, उसी प्रकार से मनुष्य अपने मन लगाकर ईश्वर की भक्ति करे तो वह ईश्वर भी मनुष्य के वश में हो जायेंगे, मनुष्य ईश्वर को अपने वश में कर सकता है।

 

 

 

 

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